Sunday, October 24, 2021
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क्यों ने हो दंगों की जांच की जांच

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02 सितंबर 2021 ‘बंटवारे के बाद के सबसे बुरे दंगे की जैसी जांच दिल्ली पुलिस ने की है, यह दुखदाई है। जब इतिहास पलटकर इसे देखेगा तो यह लोकतंत्र के प्रहरियों को दुख पहुंचाएगा।’ यह आदेश देते हुए दिल्ली की अदालत के एडिशनल सेशन जज  विनोद यादव ने शाह आलम (पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन के भाई), राशिद सैफी और शादाब को मामले से बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह जांच संवेदनहीन और निष्क्रिय साबित हुई है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है जैसे कॉन्सटेबल को गवाह के तौर पर प्लांट किया गया था। जज विनोद यादव ने कहा कि यह केस करदाताओं की मेहतन की कमाई की बर्बादी है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ये और कुछ नहीं बल्कि, पुलिस ने हमारी आंखों में धूल झोंकने की कोशिश की है। कोर्ट के आदेश में लिखा है-‘ऐसा लगता है जैसे पुलिस ने सिर्फ चार्ज शीट दाखिल कर के गवाहों को, तकनीकी सुबूत या असली आरोपी को ढूंढने की कोशिश किए बिना केस को हल कर दिया।’ विदित हो गत वर्ष 24 फरवरी को दंगाइयों ने भजनपुरा गली नंबर-15 में रहने वाले ओम सिंह के खजूरी खास करावल नगर रोड ई-पांच स्थित पान के खोखे को जला दिया था।

इस घटना के अगले दिन दंगाइयों ने चांद बाग क्षेत्र में मुख्य वजीराबाद रोड पर हरप्रीत सिंह की दुकान आनंद टिंबर फर्नीचर में लूटपाट के बाद आग लगा दी थी। दयालपुर थाने में दर्ज अलग-अलग मुकदमों में पुलिस ने दिल्ली दंगे के मुख्य आरोपित एवं आप के पार्षद रहे ताहिर हुसैन के भाई शाह आलम , राशिद सैफी और शादाब को आरोपित बनाया था। दोनों ही मामलों में एक-एक कांस्टेबल की गवाही दिलवाई गई। कोर्ट में जब केस चला तो पता चला कि मामले में पुलिसवालों के अलावा कोई गवाह ही नहीं है।

आरोपियों से कोई हथियार नहीं मिला है, न ही उनकी उपस्थिति को दर्शाता वीडियो फुटेज अब तक पेश किया गया। कोर्ट में सिद्ध हुआ कि पुलिस कांस्टेबलों ने झूठी गवाही दी है, वह घटनास्थल पर नहीं थे। वह मौके पर होते तो पुलिस कंट्रोल रूम को काल कर सूचना देते, लेकिन इसका कोई रिकार्ड पुलिस के पास नहीं है।

03 सितंबर 2021: दिल्ली हाईकोर्ट ने फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली हिंसा के दौरान हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल की हत्या के मामले के साथ-साथ एक डीसीपी को घायल करने के मामले में 5 आरोपियों को शुक्रवार को जमानत दे दी। जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने आदेश पारित करते हुए कहा कि अदालत की राय है कि याचिकाकर्ताओं को लंबे समय तक सलाखों के पीछे नहीं रखा जा सकता है और उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों की सत्यता का परीक्षण ट्रायल के दौरान भी किया जा सकता है।

हाईकोर्ट ने महिला सहित पांच आरोपियों को जमानत देते हुए शुक्रवार को कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध और असहमति जताने का अधिकार मौलिक है। कोर्ट ने कहा कि इस विरोध करने अधिकार का इस्तेमाल करने वालों को कैद करने के लिए इस कृत्य का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।

04 सितंबर 2021: दिल्ली की विशेष जज की आदलत में पता चला कि दंगे के दौरान शेरपुर में जीशान की दुकान जलाने के मामले में पुलिस ने दयालपुर थाने में ही दो एफआईआर दर्ज कर ली थी-एक 109/2020 और दूसरी 117/2020।

दिनांक 20 जून, 2020: दिल्ली की एक अदालत में फैसल को जमानत देने वाले जज विनोद यादव ने कहा कि इस मामले के गवाहों के बयानों में अंतर है और मामले में नियुक्त जांच अधिकारी ने खामियों को पूरा करने के लिए पूरक बयान दर्ज कर दिया है। अदालत ने अपने आदेश में कहा, ‘जांच अधिकारी ने इन लोगों में से किसी से भी बात नहीं की और सिर्फ़ आरोपों के अलावा कोई भी ठोस सबूत नहीं है, जिसके दम पर यह साबित किया जा सके कि फैसल ने इन लोगों से दिल्ली दंगों के बारे में बात की थी।’

दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाके में सीएए के खिलाफ शुरू हुए प्रदर्शनों का अंत शर्मनाक दंगों के रूप में हुआ। 23 फरवरी से 26 फरवरी 2020 के बीच हुए दंगों में 53 लोगों की मौत हो गई। इस दंगे में 40 मुसलमान और 13 हिंदू मारे गए थे। दिल्ली पुलिस ने दंगों से जुड़ी कुल 751 एफआईआर दर्ज की,जिनमें से 400 मामलों को सुलझाने का दावा पुलिस का है। पुलिस कहती है कि 349 मामलों में चार्जशीट दाखिल की गई है। 102 सप्लीमेंट्री चार्जशीट भी दाखिल की गई हैं।

303 मामलों की चार्जशीट पर अदालत ने संज्ञान लिया है। दिल्ली दंगों में शामिल कुल 1825 लोग गिरफ्तार किए गए. जिनमें 869 हिंदू समुदाय और 956 मुस्लिम थे। इस दंगे से जुड़े 18 लोगों पर यूएपीए लगाया गया और इनमें से 16 मुस्लिम हैं, ।

दो हिंदू-नताशा और देवांगना को भी मुस्लिम पक्ष की तरफ से ही फंसाया गया।
सबसे भयानक तो वे दस से अधिक एफआईआर हैं जिनमें लोनी के विधायक नंदकिशोर गूजर, पूर्व विधायक जगदीश प्रधान, मोहन नर्सिंग होम के सुनील, कपिल मिश्रा आदि को सरे आम दंगा करते, लोगों की हत्या करते, माल-असबाब जलाने के आरोप हैं। यमुना विहार के मोहम्मद इलियास और  मोहम्मद जामी रिजवी ,चांदबाग की रुबीना बानो बानो, प्रेम विहार निवासी सलीम सहित कई लोगों की रिपोर्ट पर पुलिस थाने की पावती के ठप्पे तो लगे हैं लेकिन उनकी जांच का कोई कदम उठाया नहीं गया।

इसी तारतम्य में हाई कोर्ट के जज श्री मुरलीधरन द्वारा कुछ वीडियो देख कर दिए गए जांच के आदेश और फिर जज साहब का तबादला हो जाना और उसके बाद उनके द्वारा दिए गए जांच के आदेश पर कार्यवाही ना होना वास्तव में न्याय होने पर शक खड़ा करता है।

दंगे मानवता के नाम पर कलंक हैं। धर्म, भाषा, मान्यताओं, रंग जैसी विषमताओं के साथ मत-विभाजन होना स्वाभाविक है। एकबारगी लगता हो कि दंगे महज किसी कौम या फिरके को नुकसान पहुंचाते हैं, असल में इससे नुकसान पूरे देश के विकास, विश्वास और व्यवसाय को होता है।

जरूरत इस बात की है कि दंगों के असली कारण, साजिश को सामने लाया जाए तथा मैदान में लड़ने वालों की जगह उन लोगों को कानून का कड़ा पाठ पढ़ाया जाए जो घर में बैठ कर अपने निजी स्वार्थ के चलते लोगों को भड़काते हैं व देश के विकास को पटरी से नीचे लुढ़काते हैं। इसी लिए आज जरूरी हो गया है कि दिल्ली दंगों की जांच की जांच किसी निष्पक्ष  एजेंसी से करवाई जाए, यदि हाई कोर्ट के किसी वर्तमान जज इसकी अगुआई करें तो बहुत उम्मीदें बंधती हैं।


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