Friday, May 1, 2026
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क्या वास्तव में ही मोदी बिन सून?

Samvad


dr mejar himanshu‘बिन मोदी सब सून’ का जुमला आजकल उठ रहा है या उठाया जा रहा है। यह जुमला नया नहीं है और सवाल तो ‘नेहरू के बाद कौन’ भी उठा था। हालांकि यह प्रश्न तब भी बेमानी था, क्योंकि जीवन, पानी और राजनीति अपना रास्ता ढूंढ ही लेते हैं। कांग्रेस में राष्ट्रीय स्तर के कई कद्दावर नेता उस वक्त भी थे, जब देश आजाद हुआ ही था, या नहीं भी हुआ था। तब जनमानस में कांग्रेस कोई राजनीतिक दल नहीं राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के मंच के रूप के ही दर्ज थी। इसके विपरीत भाजपा या इसके मातृ व पूर्व संगठन, कॉडर आधारित व लंबे समय से स्थापित राजनैतिक दल है। किसी न किसी नाम व स्वरूप में भाजपा आजादी के पहले से ही सत्ता में आते जाते रही है। सत्ता ज्यादातर बार इन्होंने विपरीत विचाराधारा के सहयोगियों के साथ साझा की और कई बार तो एकदम विपरीत विचारधारा वालों के साथ भी। आम धारणा के विपरीत हर कीमत पर सत्ता साधना भाजपा और इसके पितृ संगठनों को शुरू से ही आता है। आज तो भाजपा केंद्र और कई राज्यों में अपने अकेले दम पर सत्ता में है। ऐसे में ‘बिन मोदी भाजपा सून या शून्य’ के अंदाजे भी निराधार ही हैं। हां, तुलना का आधार नेहरू-कांग्रेस के बजाए इंदिरा-कांग्रेस कर दें तो समीकरण बदल जाता है।

प्रभावी विपक्ष के अभाव में नेहरू छद्मनाम से अखबारों में लेख लिखकर अपनी ही सरकार की नीतिगत आलोचना तक करने वाले, असहमति को समृद्ध करने वाले स्ट्ेटसमैन थे। वो योग्य कटु आलोचकों की नुमाइंदगी भी संसद में सुनिश्चित करने वाले लोकतंत्रवादी थे। पोखरण बम विस्फोट और पाकिस्तान के दो टुकडे कर देने वाली इंदिरा की छवि जनमानस में अद्भूत राजनीतिक इच्छाशक्ति युक्त प्रखर राष्ट्रवादी की बनी।

उनमें जनता ने ‘दुर्गा मां’ का रूप देखा। लेकिन इंदिरा पर विपक्षी दलों की सरकारें गिराने और देश के आपातकाल लगाने जैसे अलोकतांत्रिक कदमों के आरोप भी हैं। इंदिरा समक्षताओं और मिजाज से नेहरू नहीं थीं। ताउम्र भाजपा में रहे अटल जी शुरू से नेहरू से प्रभावित रहे और छिपाया भी नहीं। मोदी नेहरू से नहीं, इंदिरा से साफ प्रभावित दिखते हैं और उनके पैंतरे भी अजमाते हैं, पर स्वीकारते नहीं।

प्रखर राष्ट्रवादी इंदिरा की क्षमताओं, समझ और उपलब्धियों की लंबी लकीर की बराबरी मुश्किल है, पर उनके लंबे कार्यकाल में उन पर लगे आरोपों की बराबरी मोदी ने अपने पहले कार्यकाल के 2-4 सालों में ही कर ली थी। इंदिरा के बड़े कद के आगे पार्टी, सरकार और देश के संस्थान बौने और नतमस्तक हो गए। इंदिरा पर आरोप दरबार संस्कृति और सत्ता के केंद्रीकरण का लगा। 2014 के चुनावी अभियान में साफ था, बनने वाली भाजपा नहीं मोदी सरकार है। नाम से भी, काम से भी।

जिन्हें असहजता-असहमति थी, उन्हें पार्टी के बाहर का रास्ता दिखा दिया गया या मार्ग दर्शक मंडल पहुंचा दिया। मोदी ने भाजपा का ऐसा ही बधियाकरण किया जैसा इंदिरा के जमाने के कांग्रेस का हुआ। योग्यता-अयोग्यता से अलग, जिसने मोदी के सुर में गीत गाया वो बच गया, दल में सज गया, ना नुकर करने वाला नप गया। मोदी-शाह के आगे भाजपा बौनी हो गयी, आरएसएस भी। अब भाजपा के मोदी नहीं, मोदी की भाजपा बनी।

सत्ता शीर्ष पर कांग्रेस इस कदर दरबारी और बौनी हुई कि एक पार्टी अध्यक्ष ने उस जमाने में भक्ति भाव में ‘इंदिरा इज इंडिया’ तक कह डाला था। उसी तर्ज पर भाजपा के भक्त नेता मोदी को पूरे देश का बाप बता दिए हैं। कांग्रेस की बरबादी के बीज इंदिरा के प्रचंड सत्ताकाल में पड़े थे।

भाजपा के अब पड़ रहे हैं। कहा जाता था कांग्रेस को राज चलाना अच्छा आता है और भाजपा को विपक्ष की भूमिका निभाना। महंगाई, बेरोजगारी, बिकती राष्ट्रीय संपत्तियों आदि को देखें तो मोदी सरकार फेल है। भारत जोड़ों की राहुल गांधी की निजी यात्रा के सीमित प्रयास के अलावा, मोदी सरकार को इतनी भारी विफलताओं के बावजूद, विपक्ष समग्रता से भाजपा को घेरने में विफल रहा।

यह भी देश के लिए शुभ नहीं कि एक निकम्मा सत्ता पक्ष दल बल, संसाधन, जोड़तोड़, कार्यपालिका, न्यायपालिका, मीडिया आदि संस्थानों की तोड़मरोड़ से सिर्फ इसलिए सत्ता में बना रहे, क्योंकि विपक्ष कारगार नहीं। आज देश वायदाफरामोश, विफल सरकार और लचर विपक्ष से अभिशप्त है। सरकारों, संस्थानों, दलों, संगठनों, देश आदि का निष्पक्षता और सामूहिकता त्याग कर किसी व्यक्ति, जोड़ी, दरबार मंडली पर आश्रित हो जाना प्रजातंत्र को पंगु कर देता है और लोकतंत्र की जड़ें सूख जाती हैं।

भारतीय जनतंत्र की यात्रा ने 2014 में मोदी में देश की समस्याओं का समाधान देखा। उन्हें 30 साल बाद पूर्ण बहुमत की सरकार का आशीर्वाद मिला। 2019 में सरकार दोहराई भी गई। वो ऐतिहासिक हो सकते थे, पर उन्होंने जमीनी मुद्दोें को छोड़, लोक लुभावन मामलों, जुमलों को चुना और सिर्फ ब्रांड मोदी चमकाने में ही निवेश किया। इस पैंतरेबाजी से सरकारें बन सकती हैं, देश नहीं। नतीजा सामने है। मूल समस्याओं और 2014 के चुनावी वायदों का मोदी अब जिक्र भी नहीं करते। आज उनका विकल्पहीनता की बात करना सत्ता में बने रहने की राजनीतिक योजना से ज्यादा कुछ नहीं।

देश छोडिए, भाजपा में ही संतुलित, गरिमापूर्ण, सौम्य-शिष्ट राजनाथ सिंह और अर्नगल वाचालता से कोसों दूर, परिणाम व विकास केंद्रित बेहद कामकाजी गडकरी सरीखे नेता उपलब्ध हैं। आज सामाजिक, राजनीतिक विभाजन और संवदेनाहीन भक्तिकाल में भले अजीब लगे, पर इस देश में ही नाम पर सहमति, सब तय होने पर भी प्रधानमंत्री पद न लेने, बहुमत व निवेदन के बावजूद पद छोड़ने या इस्तीफा देने, या एक दुर्घटना के कारण नैतिक आधार पर मंत्री पद त्यागपत्र दे देने की परम्परा-उदाहरण हैं।

अनियमित तरीके से एक चुनावी सभा को बिजली कनेक्शन देने या एक राज्य कर्मचारी के किसी दल के चुनावी काम में सक्रियता साबित होने पर, जनता के उबल पड़ने और न्यायालय के सर्वोच्च पद पर आसीन इंदिरा जैसी नेता के विरूद्ध फैसला देने के स्वस्थ व जीवंत प्रजातंत्र के उदाहरण हैं। मोदी या जोड़ी पर एकदम निर्भर भाजपा जरूर या शायद उनके बगैर अनाथ हो सकती है पर ‘बिन मोदी सब सून’ का यह सुनियोजित प्रायोजित अलाप इस जादुई देश में जुमलेबाजी से ज्यादा कुछ नहीं। हां, वीर प्रसुता, रत्न गर्भा इस देश की धरती का अपमान जरूर है।


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