Saturday, May 25, 2024
- Advertisement -
Homeसंवादतप का अर्थ

तप का अर्थ

- Advertisement -

Amritvani 16


एक दिन स्वामी विवेकानंद जी एक नदी किनारे नाव के आने का इंतजार कर रहे थे। इतने में एक साधु उनके पास आया और उनसे पूछा, तुम यहां क्यों बैठे हुए हो? स्वामी जी ने जवाब दिया, मैं यहां नाव का इंतजार कर रहा हूं। साधु ने फिर पूछा, तुम्हारा नाम क्या है? स्वामी जी ने कहा, मैं विवेकानंद हूं। साधु ने स्वामी जी का मजाक उड़ाते हुए कहा, अच्छा! तो तुम वो विख्यात विवेकानंद हो जिसको लगता है कि विदेश में जा कर भाषण दे देने से तुम बहुत बड़े महात्मा साधु बन सकते हो। स्वामी जी ने साधु को कोई जवाब नहीं दिया।

फिर साधु ने बहुत ही घमंड के साथ, नदी के पानी के ऊपर चल कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया। कुछ दूर तक चलने के बाद साधु ने स्वामी जी कहा, क्या तुम मेरी तरह पानी पर पैदल चल सकते हो? स्वामी जी ने बहुत ही विनम्रता के साथ साधु से कहा, नि:संदेह आपके पास बहुत ही अद्भुत शक्ति है। लेकिन क्या आप मुझे यह बता सकते हो, कि आपने यह अद्भुत शक्ति कितने समय में प्राप्त की? साधु ने घमंड में जवाब दिया, मैंने बीस सालों की लंबी और कठिन तपस्या के बाद यह शक्ति प्राप्त की है।

यह देख कर स्वामी जी बहुत ही शांत स्वर में बोले, आपने अपनी जिंदगी के बीस साल ऐसी विद्या को सीखने में व्यर्थ कर दिए, जो काम एक नाव पांच मिनट में कर सकती है। आप ये बीस साल निर्धन बेसहारा गरीबों की सेवा में या देशवासियों की प्रगति में लगा सकते थे। परंतु आपने अपने बीस साल सिर्फ पांच मिनट बचाने के लिए बर्बाद कर दिए। शक्ति का सही जगह पर सही इस्तेमाल करना ही वास्तविकता में बुद्धिमानी है। साधु सिर झुकाए खड़े रह गये और स्वामी जी नाव में बैठ कर नदी के दूसरी किनारे चले गए।
                                                                                            प्रस्तुति : राजेंद्र कुमार शर्मा


janwani address 8

What’s your Reaction?
+1
0
+1
4
+1
0
+1
0
+1
0
+1
0
+1
0
- Advertisement -

Recent Comments