
महाराष्ट्र में चुनाव के बाद अजीत पवार से हाथ मिला कर भाजपा की सरकार बनाने की जल्दी में मुंह की खा चुके अमित शाह लगता है अपनी आदत के अनुसार महाराष्ट्र में भाजपा के सबसे बड़े दुश्मन शरद पवार को हिट लिस्ट में लाकर उन पर लाल निशान लगा चुके हैं किन्तु इस बार वे इस ‘दाना दुश्मन’ पर कच्चा हाथ नहीं डालना चाहते रहे होंगे क्योंकि पिछली बार शरद पवार को ‘अंडर एस्टीमेट’ कर अपना हाथ जला चुके मोदी के चाणक्य, खिचड़ी बीच से न खाकर किनारों पर उपलब्ध ठंडी खिचड़ी का एक एक ग्रास खा रहे लगते हैं।
इस तथ्य में किसी को कोई शक भी नहीं होना चाहिए कि शरद पवार महाराष्ट्र की राजनीति के एक ऐसे पुरोधा हैं जिनका भारतीय राजनीति में एक अच्छा खासा दखल भी है।
सही बात तो यह है कि अघाड़ी सरकार को बनाने का अवसर तो अमित शाह ने अपनी जल्दबाजी के चलते अजाने में उन्हें दे दिया था मगर येनकेन प्रकारेण उसे अब तक घसीट ले जाना उद्धव ठाकरे, उनके बड़बोले संजय राउत या कांग्रेस के बस की बात नहीं है। अघाड़ी सरकार इतने झटकों के बाद भी अभी तक घिसट रही है तो यह शरद पवार की तिकड़मों का असर है लेकिन अमित शाह भी कोई कम नहीं हैं। उनके सामने शरद की पूरी कुण्डली खुली पड़ी है मगर वे मजबूर हैं क्योंकि शरद पवार ने महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी इतनी सख्त पकड़ बना रखी है। वे प्रशासन के पहले घेरे से लेकर अपनी, हर दल की अन्तरंग मण्डली के सातवें घेरे में इतने सुरक्षित हैं कि उनके इन सुरक्षा घेरों में सेंध लगाये बिना शरद पवार पर ओछा हाथ डालना केवल समस्या पैदा ही नहीं करेगा अपितु जग हंसाई भी करा देगा। शायद इसीलिए अमित शाह बहुत फूंक फूंक कर कदम उठा रहे लगते हैं और इसीलिए शरद पवार के एक एक मोहरे को घेर कर उनके सुरक्षा घेरे में सेंध लगाने का प्रयास कर रहे हैं।
यूं तो अधाड़ी सरकार पर गठन के समय से ही भ्रष्टाचार और भाजपा और उसके समर्थकों के प्रति दुर्भावना के आरोप लगते रहे हैं। इसीलिए उन्होंने सबसे पहले शरद पवार के एक खास मोहरे तत्कालीन गृहमंत्री अनिल देशमुख पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते ही कुछ ढील देकर हाथ डाल दिया और आज वे सजा भुगत रहे हैं। यह राकांपा के लिए एक बहुत बड़ा झटका था जिसे मन मसोस कर शरद पवार सहन कर रहे हैं। जहां तक नवाब मलिक का प्रश्न है, उन्हें तो स्वयं ‘मल मल कर दर्द पैदा करने की’ बडबोली आदत रही है। यह, वह अर्णव गोस्वामी, परमवीर सिंह और समीर वानखेड़े के अलावा सचिन वाजे प्रकरण में भी दिखा चुके हैं।
इस तथ्य में भी कोई शक नहीं है कि महाराष्ट्र का हर जागरूक नागरिक जानता है कि प्रारम्भ से ही शरद पवार के दाऊद और उससे सहानुभूति रखने वाले राजनैतिक, सामाजिक और प्रशासनिक व्यक्तियों से हद दर्जे तक मधुर संबन्ध रहे हैं। इसी क्र म में नवाब मलिक, माजिद मेनन और अबू आजमी जो पहले समाजवादी पार्टी के मुंबई के कर्णधार माने जाते थे और किसी न किसी रूप में मुंबई धमाकों से जोड़ कर देखे जाते रहे हैं, से भी राकांपा प्रमुख के अन्तरंग संबन्ध रहे हैं और इसी कारण राजनैतिक संरक्षण पाने के लिए ही नबाव मलिक और माजिद मेनन राकांपा में आकर पार्टी का मुस्लिम चेहरा बन कर नवाब मलिक मंत्री पद और माजिद मेनन राज्य सभा सदस्य का पद पाकर सुरक्षित हो गये।
सोने पर सुहागा यह कि नवाब मलिक को राकांपा का राष्ट्रीय प्रवक्ता पद भी सौंप दिया गया जिससे वे और मुखर होकर गलतियों पर गलतियाँ करते रहे और अमित शाह की हिट लिस्ट में सीढ़ियां चढ़ते रहे। नवाब मलिक अपने बडबोलेपन के चलते न्यायालय की नजर में भी चढ़ते रहे और कई चेतावनियों के साथ माफी मांगने और जमानत लेने तक से नवाजे गये।
इस बार जब मलिक ईडी के जाल में फंसे तो ज्यादा अक्लमंदी दिखाने के चक्कर में ईडी के सवालों से बचने के लिए अस्पताल में भर्ती हो गये। सोचा तो यह था कि इस बीच न्यायालय से जमानत करा लेंगे मगर ईडी ने जब एम्स के डाक्टरों को लाने की धमकी दी तो जेजे अस्पताल के डाक्टरों ने घबरा कर इन्हें क्लीन चिट देकर ईडी को सौंप दिया और फिर ये उसी घेरे में आ गये।
यहाँ यह भी स्मरणीय है कि ईडी द्वारा बिना स?मन पूछताछ का आरोप लगाने वाले बड़बोले नवाब मलिक अर्णव गोस्वामी की मुंबई पुलिस द्वारा केवल शक के आधार पर बिना वारंट बदतमीजी के साथ की गयी गिरफ्तारी की बात थी तो मलिक ने वाह वाही की थी। अब जब वही नुस्खा इन पर आजमाया गया तो बवाल मचाने की कोशिशें की गयीं। आम चर्चा यह भी है कि शायद शिवसेना के एक मात्र मुस्लिम चेहरे मंत्री अब्दुल सत्तार को जिन पर अफजल गुरु की माफी अपील पर हस्ताक्षर करने के आरोप पहले से हैं, औरंगाबाद के सम्मेलन में ओवैसी की पार्टी के विधायक से गलबहियाँ करने और ‘हमारा झंडा ही तो भगवा है, मन तो हमारा हरा है’ कहने के आरोपों से घिरे अब्दुल सत्तार भी अमित शाह के रडार पर आ चुके हैं?
इस संबंध में विशेष उल्लेखनीय यह भी है कि अनिल देशमुख के प्रकरण में ज्यादा प्रतिरोध न करने वाले शरद पवार की नवाब मलिक की गिरफ्तारी पर तुरंत विकराल प्रतिक्रि या सामने आयी और ताबड़तोड़ मीटिंगों पर मीटिंगें और धरने प्रदर्शन सामने आने लगे। इस प्रकरण में परंपराओं से हट कर नवाब मलिक का इस्तीफा भी लेने से इनकार कर देना भी क्या अजीब नहीं लगता?
शरद पवार की इन प्रतिक्रि याओं से यह लगता है कि उनकी समझ में आ चुका है कि इस बार केंद्र के निशाने पर वे हैं क्योंकि उनके पार्टी सदस्यों, पारिवारिक जनों और संवैधानिक पदधारियों पर ताबड़तोड़ हमले उन्हें सजग कर गये हैं कि इस बार घुमा फिरा कर वार उन पर किया जा रहा है। इसलिए वे बार बार शिवसेना के प्रवक्ता और सामना के कार्यकारी संपादक संजय राउत के माध्यम से केंद्र को रोज धमकियां जारी करा रहे हैं।
केवल इतना ही नहीं, इस बार वे धमकियों पर ही नहीं रुक रहे हैं। कुछ विशेष कदम उठाने के लिए उन्होंने वर्तमान पुलिस कमिश्नर मुंबई को हटा कर संजय पाण्डेय, आर्थिक अपराधों के विशेषज्ञ जो अब तक हाशिये पर पड़े थे और केवल चार महीने बाद ही रिटायर होने वाले हैं, को केंद्र की चालों का अनुगमन करते हुए मुंबई कमिश्नर के पद पर बैठा कर केंद्र को एक चेतावनी भी जारी कर दी है कि अगर ‘तुम डाल डाल हो तो हम भी पात पात’ हैं मगर इस कदम को उठा कर उद्धव-शरद पवार और संजय राउत की तिकड़ी यह भूल गयी है कि संजय पाण्डेय की छवि एक ईमानदार अफसर की है और शायद वे बिना प्रमाण कोई भी भूल कर अपनी छवि नहीं बिगाड़ेंगे। वैसे तो सब कुछ भविष्य के हाथ है।
राज सक्सेना


