
न्याय की सर्वमान्य अवधारणा सुनिश्चित करना सत्ताओं व व्यवस्थाओं के लिए हमेशा एक बड़ी समस्या रहा है। ऐसे में क्या आश्चर्य कि इक्कीसवीं शताब्दी के तेईसवें साल में भी, खुद को लोकतांत्रिक कहने वाले देशों तक के पास न्याय की कोई सर्वमान्य लोकतांत्रिक परिभाषा नहीं है।