
हम संसार के सबसे युवतर देशों में एक हैं। अगले डेढ़ दशक के बीच विकसित और अमीर देशों की कामकाजी जनसंख्या में चार प्रतिशत तक गिरावट आएगी, वहीं अपने देश में उत्पादक आयुवर्ग के लोगों की संख्या में बीस से पच्चीस प्रतिशत बढ़ोत्तरी होगी। यह हमारे लिए एक बड़ा अवसर हो सकता है, बशर्ते युवा आवश्यक कौशल और ज्ञान से इसका सही इस्तेमाल कर सकें। मोदी सरकार का कौशल पर खास फोकस है। इसके लिए एक नए कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय का गठन किया गया है। कौशल विकास की नीति के अंतर्गत आईटीआई जैसे संस्थानों का आधुनिकीकरण किया जा रहा है। इस सम्बन्ध में कई दूसरे देश भी हमें अपना सहयोग दे रहे हैं।
शिक्षा देश के विकास की नींव होती है, विशेषकर प्राथमिक शिक्षा! शिक्षा से हम उपलब्ध अवसर का लाभ लेने में समर्थ होते हैं। इसलिए स्वतंत्रता के पश्चात शिक्षा सरकारों के केन्द्रीय चिंतन में उपस्थित रही है। समय-समय पर शिक्षा को सशक्त और गुणवत्तापूर्ण बनने के लिए कई समितियों और आयोगों का गठन किया जा चुका है। किन्तु आर्थिक कारणों या फिर मतभेद की वजह से इनके सुझावों पर यथोचित अमल नहीं हुआ। परिणामत: शिक्षा जमीनी स्तर पर सशक्त नहीं बन पायी, बल्कि एक विरोधाभाष की स्थिति बनती चली गई। आज की तारीख में आइसीटी यानी इनफार्मेशन कम्यूनिकेशन एंड टेक्नोलॉजी, की विशेषज्ञता में भारतीय युवाओं की वैश्विक धाक है। आईआईटी के होनहार बच्चे अपनी प्रखर मेधा और उपलब्धियों की बदौलत निरंतर लाइम लाइट में रहते हैं। इसके विपरीत हर साल आने वाली एनुअल स्टेटस आॅफ एजुकेशन की रिपोर्ट बताती है कि देश में पढ़ाई-लिखाई का बुनियादी स्तर हताश करने वाला है। कक्षा 8 के बच्चे अंग्रेजी के सामान्य वाक्य पढ़ने में लड़खड़ा जाते हैं। बच्चों में गणित अब भी हौवा बना हुआ है । कक्षा 5 के 25 प्रतिशत बच्चे दूसरी कक्षा की हिन्दी भाषा की किताब नहीं पढ़ पाते हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में यह धुर कंट्रास्ट वाली स्थिति आखिर क्यों? यह सिर्फ बुद्धिलब्धि का खेल नहीं है। बच्चों में बुद्धिलब्धि का स्तर अधिक या कम हो सकता है, किन्तु धनाढ्य या निर्धन वर्ग अथवा ग्रामीण या शहरी क्षेत्र के बच्चों में इसके कम या अधिक होने की बात गलत है। सुपीरियर श्रेणी यानी 110+बुद्धिलब्धि का बच्चा जो सफलता प्राप्त कर सकता है, वह लक्ष्य परिश्रम करके औसत श्रेणी यानी 90+ बुद्धिलब्धि वाला बच्चा भी हासिल कर सकता है। संपूर्ण बच्चों का 70 प्रतिशत बच्चे इसी संवर्ग के होते हैं। उचित शैक्षिक निर्देशन, प्रेरणा और प्रोत्साहन से इन्हें सफलता की ऊंची मंजिल तक पहुंचाया जा सकता है। यही नहीं हो पा रहा है, जिसके कारण निम्न वर्ग के शहरी, ग्रामीण और सुदूर पिछड़े क्षेत्र के बच्चे बड़ी उपलब्धियां प्राप्त करने से बँचित रह जाते हैं। इसका नतीजा यह है कि जो जन सांख्यकीय अवसर देश के पक्ष में है, उसका सम्पूर्ण उपयोग नहीं हो पा रहा है।
उद्यमिता के राष्ट्रीय विमर्श में प्राथमिक शिक्षा और कौशल विकास के अन्तर्सम्बन्धों पर फोकस आवश्यक है। प्राथमिक शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण बनाए बिना युवाओं के कौशल संवर्द्धन का लक्ष्य नहीं प्राप्त हो सकता है। इसलिए शिक्षा में निवेश और ढांचागत बदलाव पर ध्यान देना होगा। उद्यमिता के क्षेत्र में चीन आगे बढ़ा तो इसके पीछे शिक्षा में उसका भारी-भरकम निवेश है। सन 1997 से चीन ने शिक्षा में पहले की तुलना में तीन गुना अधिक खर्च करना शुरू किया था।
शिक्षा में निवेश यहां भी बढ़ा है। बच्चों के लिए मुफ़्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू है। छात्रों को मुफ़्त किताबें, गणवेश, मीनू के अनुसार मध्यान भोजन दिया जा रहा है। टीवी पर शैक्षिक कार्यक्रम के साथ उन्हें कम्प्यूटर की शिक्षा देने का भी प्रयास चल रहा है। कोशिशें अच्छी हैं, किन्तु कमियां अभी बहुत हैं। अभी सारे बच्चे स्कूल में नामांकित नहीं हैं। श्रमिक वर्ग के कुछ बच्चे स्कूल के बजाय घर में छोटे भाई-बहनों की देखभाल करते या बकरियां चराते दिख जाते हैं। प्राथमिक शिक्षा में पाठ्यक्रम की एकरूपता पर ध्यान नहीं दिया गया है। यहाँ शिक्षा के कई तरह के स्कूल हैं-परिषदीय विद्यालय, नगरपालिका के स्कूल, शिशुमन्दिर, मदरसा, मिशनरी कान्वेंट, गैर मिशनरी कान्वेंट, नवोदय विद्यालय आदि! इनके पाठ्यक्रम और व्यवस्थाएं अलग हैं। वास्तव में पाठ्यक्रम छात्रों में मूल्यों का विकास करता है। देश के बच्चे अगर तीन-चार व्यवस्थाओं और पाठ्यक्रम के जरिए पढ़ाए जाएंगे तो उनकी दृष्टि, जीवन मूल्य, राष्ट्रीय चेतना और व्यवहार में भी भिन्नता होगी। ऐसी स्थिति में सारे बच्चे समान भाव से राष्ट्रनिर्माण, सामाजिक बदलाव, उद्यमिता संवर्द्धन में एक स्तर पर कैसे खड़े हो सकेंगे? बात उद्यमिता की हो या कोई और, प्राथमिक शिक्षा को बुनियाद में रखकर ही होनी चाहिए।

