राजेंद्र बज
आमतौर पर प्राकृतिक आपदा तथा आपराधिक हादसा होने पर राजनीतिक सक्रियता सामान्य से कई गुना बढ़ जाती है। शासन-प्रशासन प्राथमिकता के आधार पर विषम परिस्थितियों को नियंत्रित करने की दिशा में विशेष रूप से सक्रिय हो जाता है। कालांतर में जब तक और कोई हादसा तथा आपदा न आए, तब तक मीडिया भी अपनी भूमिका का तत्परतापूर्वक निर्वहन करने के प्रति विशेष रूप से दृढ़ संकल्पित नजर नहीं आता है। दरअसल सीधी सी बात यह है कि किसी लकीर को तब तक चिंता का विषय माना जाता है, जब तक कि अन्य कोई बड़ी लकीर न खींची गई हो।
यह सिलसिला काफी हद तक सहज स्वाभाविक प्रतीत होता है। लेकिन कुल मिलाकर राजनीतिक तथा सामाजिक जागृति का परिस्थितियों पर निर्भर हो जाना, गहन चिंता का विषय है। समस्याओं के जाल का जंजाल, हर एक समस्या के संपूर्ण निदान तक न पहुंचना राजनीतिक तथा सामाजिक परिवेश में अनेकों विकृतियों को जन्म देता है। वास्तव में घटना विशेष के घटित हो जाने के उपरांत उस घटना की पुनरावृत्ति न हो, इस संदर्भ में विशेष प्रयास किए जाने की नितांत आवश्यकता है। समय-समय पर सुर्खियां बनती तमाम घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में उसके दोहराव को कारगर तरीके से रोकना अत्यंत आवश्यक है।
अन्यथा कालांतर में राजनीतिक तथा सामाजिक विकृतियों का सैलाब हमारी गौरवशाली संस्कृति को तार-तार कर सकता है। राजनीतिक सक्रियता भी लाभ हानि के गणित पर निर्भर हो जाना, निश्चित ही गंभीर चिंता का विषय है। यकीनन हम विकसित भारत की परिकल्पना को साकार करने के लिए अपने अपने कर्म को वरीयता देते हैं। लेकिन शासन-प्रशासन के साथ-साथ हमारी भी यह जिम्मेदारी है कि सुशासन की स्थापना हेतु हम भी अपने स्तर पर अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करें। इस दिशा में राजनीतिक इच्छाशक्ति का जागृत हो जाना निश्चित ही अपेक्षित परिणाम दे सकता है।
शासन-प्रशासन के साथ-साथ नागरिकों की संवेदनशील मनोवृत्ति को और अधिक विकसित करने की दिशा में सम्मिलित प्रयास अवश्य किए जाना चाहिए। बेहतर हो यदि राजनीतिक तथा सामाजिक नेतृत्व इस दिशा में अपनी जिम्मेदारियों को भलीभांति समझ कर स्वस्थ समाज की संरचना के सूत्रधार बने। वास्तव में रामराज्य की परिकल्पना को साकार करने की दिशा में स्वस्थ समाज की संरचना एक आवश्यक शर्त के रूप में परिभाषित की जा सकती है। प्राय: देखा गया है कि विषम परिस्थितियां निर्मित हो जाने के पश्चात विभिन्न राजनीतिक दल ‘राजनीतिक लाभ’ का विचार कर अपनी भूमिका सुनिश्चित किया करते हैं।
ऐसे में विकृतियों का निदान तो नहीं होता किंतु कोई भी अमानवीय से अमानवीय मामला भी तुच्छ राजनीति की भेंट चढ़ा जाया करता है। सामाजिक जनजीवन को ऐसी राजनीतिक नकारात्मकता की भारी कीमत चुकाने को बाध्य होना पड़ता है। समस्या दर समस्या, समस्याओं का सैलाब लाकर हमारी तीव्र से तीव्रतम होती जा रही विकास गति को मंथर कर देती है। परिणामस्वरूप स्थिति कुछ ऐसी हो जाती है कि हम दो कदम आगे चले लेकिन चार कदम पीछे हो गए। दरअसल इस स्थिति को बदलने हेतु राजनीतिक तथा सामाजिक नेतृत्व को दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देना चाहिए।
राजनीतिक तथा सामाजिक जनजीवन में उच्चस्तरीय आदर्शों का ऐतिहासिक पाठ पढ़ लेने से कुछ नहीं होगा अपितु हमें सामाजिक तथा राष्ट्रीय स्तर पर आदर्शों के पाठ को आत्मसात करने की आवश्यकता होगी। ऐसा होने पर ही हम इस धरा पर स्वराज्य की स्थापना करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। बेहतर हो यदि सामाजिक तथा राजनीतिक क्षेत्र की विडंबनाओं से पार पाने जाने के प्रयास ईमानदारी के साथ किया जाए। यह निश्चित है कि अतीत के आदर्शों को वर्तमान में अपनाकर ही हम स्वर्णिम भविष्य की आधारशिला रख सकते हैं। वास्तव में आदर्शों का ऐतिहासिक हो जाना और भावी इतिहास से विलुप्त हो जाना भी चिंताजनक ही तो है।
सामाजिक परिस्थितियां, राष्ट्र के मूल चरित्र को रेखांकित करने में प्रबल रूप से सहायक सिद्ध होती है। इस दृष्टि से अपराधों की अधिकता, कानून और व्यवस्था की लचर स्थिति को बयां करती है और सभ्य समाज की संरचना में बाधक होकर समूचे देश को पतन के गर्त की ओर ले जाती है। समय रहते इस दिशा में राजनीतिक तथा सामाजिक नेतृत्व द्वारा संज्ञान लिया जाना अत्यंत जरूरी है। राजनीतिज्ञ, हर घटना-दुर्घटना में राजनीति न करें और सामाजिक नेतृत्व, सामाजिक विकृतियों का त्वरित समाधान करने के प्रति तत्पर रहें।
ऐसा होने पर ही हम यह दावा कर सकेंगे कि हम सुनहरे कल की ओर बढ़ रहे हैं। दरअसल राजनीतिक तथा सामाजिक परिवेश में शुचिता तथा पवित्रता को स्थापित करने की दिशा में आपकी और हमारी जिम्मेदारी भी कोई कम नहीं है। समय आ गया है कि हम परस्पर दोषारोपण की मनोवृति से बचें और अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को समझकर अपने राजनीतिक एवं सामाजिक उत्तरदायित्व को बखूबी निभाने की दिशा में आगे आएं।

