- आटा गूंथने से लेकर फूली हुई रोटी बना रही मशीन मेहनत बची
ज्ञान प्रकाश |
मेरठ: अब वो डायलाग अतीत के पन्नों में कैद हो गए जिसमें कहा जाता था कि जेल में चक्की पीसते पीसते मर जाओगे। अब जेल के बंदियों को इससे छुटकारा मिल गया है। जेल की पाकशाला में लगी रोटी बनाने की मशीन से जहां पच्चीस प्रतिशत श्रम समाप्त हो गया वहीं उच्च कोटि की स्वादिष्ट रोटी भी बंदियों को मिलने लगी है।
मशीन लगने के बाद प्रतिदिन सुबह और शाम के खाने के लिये करीब चालीस हजार रोटियां बनती है। इतनी रोटियों को बनाने के लिये मशीन को आठ घंटे लगते हैं। चौधरी चरण सिंह कारागार में इस वक्त 2500 से अधिक बंदी है और उनके सुबह और शाम के लिये भोजन की व्यवस्था करना भी चुनौतीपूर्ण है।
पहले पाकशाला में किसी बंदी की डयूटी लगना सजा से कम नहीं था लेकिन वक्त बदला और सरकार ने प्रदेश की कई जिलों में रोटी बनाने की मशीन लगवा दी गई है। इस मशीन की खासियत यह है कि अब बंदियों को आटा गूंथने की जरुरत भी नहीं पड़ रही। बंदी इस मशीन में निर्धारित मात्रा में आटा डाल देते हैं जो थोड़ी देर में आटा गूंथ देता है।
इसके बाद मशीन एक निर्धारित साइज की गोल रोटियां निकालनी शुरु कर देती है और जो मूविंग पट्टे की मदद से सिंकाई शुरु कर देती है। रोटी फूली हुई और गोल निकलती है। वरिष्ठ जेल अधीक्षक बी डी पांडेय ने बताया कि मशीन लगने से काफी राहत मिली है। अब मशीन एक घंटे में लगभग पांच हजार रोटियां बना रही है। बीस हजार रोटी सुबह और बीस हजार शाम को बनती है।
जेल मैन्युल के हिसाब से प्रति बंदी को आठ रोटी, दाल, चावल और सब्जी प्रतिदिन सुबह शाम मिलती है। इस मशीन से पाकशाला में सफाई भी काफी रहने लगी है। पहले इस पाकशाला में दर्जनों लोग काम करते थे और गर्मी से जूझना पड़ता था लेकिन अब मशीन के ऊपर पंखा भी चलता है और बंदी को राहत भी मिलती है।
अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रतिदिन पांच हजार लोगों का खाना बनाने के लिये कितना गेहूं लगता होगा और उसके लिये कितनी मशक्कत पहले करनी पड़ती थी। पाकशाला में किसकी डयूटी न लगे इसके लिये कितने पापड़ बेलने पड़ते थे लेकिन नोएडा, गाजियाबाद और मेरठ में रोटी की मशीन लगने के बाद स्थिति बदल गई है।

