
बहुजनों के राजनीतिक एकीकरण और दलितों के स्वाभिमान के संघर्षों में समूचा जीवन खपा देने वाले कांशीराम को देश के दलित आंदोलन की बाबासाहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के बाद की सबसे महत्वपूर्ण शख्सियत माना जाता है-उत्तर भारत की बात करें तो वहां तो वे उसकी इकलौती-कहना चाहिए, सबसे बड़ी-प्रेरणा हुआ करते थे। उनके इस संसार को अलविदा कहने का यह अठारहवां साल है। नौ अक्टूबर, 2006 को, जब वे 72 वर्ष के थे, लंबी बीमारी के रूप में आई मौत उन्हें हमसे छीन नहीं लेती तो इस वक्त वे नब्बे साल के होते। लेकिन आज उनकी अनुपस्थिति में उनके व्यक्तित्व व कृतित्व का पुनरावलोकन करें, तो लगता है कि उन्हें संघर्षों में सक्रियता के आरंभ से ही दलित आन्दोलन में अपनी महत्वपूर्ण स्थिति का भान था। इस जिम्मेदारी का भी कि उन्हें पुरानी लकीर त्रभले ही वह बाबासाहब द्वारा ही क्यों न खींची गई होत्न पीटने के बजाय आगे की सोचना और लगातार नई जमीन तोड़ते रहकर आन्दोलन को आगे ले जाना है। इसीलिए उनके अनुयायी उन्हें उनके जीते जी ही ‘साहेब’ और ‘मान्यवर’ आदि बनाने लगे तो उन्होंने अपने और बाबासाहब के बीच का फर्क बताते हुए कहा था कि बाबासाहेब किताबें इकट्ठा किया करते थे, लेकिन मैं लोगों को इकट्ठा करता हूं।
हां, एक बार लोगों को इकट्ठा करने का काम हाथ में लेने के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। शायद इसलिए कि उनके दिल व दिमाग में साफ था कि उन्हें आगे क्या करना है। 1934 में 15 मार्च को यानी आज के ही दिन पंजाब के रोपड़ जिले के खवासपुर नामक गांव में रमदसिया नामक दलित समुदाय में पैदा होने के बाद 1957 तक उन्होंने बीएससी की पढ़ाई पूरी कर ली थी और महाराष्ट्र में पुणे स्थित डिफेंस रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट आर्गनाइजेशन (डीआरडीओ) की एक्सप्लोसिव लैब में असिस्टेंट साइंटिस्ट बन गये थे। इस लैब के प्रबन्धन ने अचानक बाबासाहब अम्बेडकर व गौतम बुद्ध की जयंतियों की छुट्टियां रद्द कर दीं तो उन्होंने इसे दलितों के लिए बहुत अपमानजनक मानकर उनकी बहाली के लिए संघर्ष छेड़ दिया और उसे सफलता की मंजिल तक पहुंचाया। आगे चलकर तो प्रतिज्ञा ही कर डाली कि न शादी करेंगे, न अपने पास सम्पत्ति रखेंगे और फुले-अम्बेडकर आंदोलन के लक्ष्य हासिल करने के लिए अपनी पूरी जिंदगी समर्पित कर देंगे।
इस प्रतिज्ञा को निभाने के लिए उन्होंने डीआरडीओ की अपनी छ: साल पुरानी नौकरी एक झटके में छोड़ दी और रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया के लिए काम करने लगे। कुछ साल बाद उसकी रीति-नीति से मोहभंग हुआ तो बैकवर्ड माइनारिटीज कम्युनिटीज इम्प्लॉइज फेडरेशन (बामसेफ) गठित कर देश भर में उसे फैलाने में लग गए। 1981 में दलित शोषित समाज संघर्ष समिति यानी डीएस-4 भी बनाई।
इसके अगले ही बरस ‘द चमचा एज’ नामक पुस्तक लिखी, जिसने उनकी राजनीतिक लाइन व रुझानों को काफी हद तक साफ कर दिया। इसमें उन्होंने लिखा कि जब-जब कोई दलित संघर्ष मनुवाद को अभूतपूर्व चुनौती देते हुए सामने आता है, तब-तब ब्राह्मणवर्चस्व वाले राजनीतिक दल, जिनमें कांग्रेस भी शामिल है, अपने दलित नेताओं को सामने लाकर आंदोलन को कमजोर करने का काम करते हैं। तब सच्चे व खरे दलित योद्धा का विरोध कराने के लिए अपने दलित नेताओं को अपना औजार, दलाल, पिट्ठूअथवा चमचा बनाया जाता है। इसलिए चमचों की मांग तभी होती है, जब खरे और सच्चे योद्धा होते हैं। ‘जब कोई लड़ाई, कोई संघर्ष और किसी योद्धा की तरफ से कोई खतरा नहीं होता, चमचों की जरूरत नहीं होती, उनकी मांग नहीं होती।’ जाहिर है कि उनके निशाने पर वे दलित नेता थे जो अपने समुदाय के हितों की हिफाजत से मुंह मोड़कर कांगे्रस और उसकी जैसी दूसरी मनुवादी पार्टियों में उनकी शर्तों पर सक्रिय रहकर अपने स्वार्थ साधते रहे। अंतत: इस मान्यता के तहत कि दलित आंदोलन राजनीतिक जमीन के बिना नहीं पनप सकता, उन्होंने 14 अप्रैल, 1984 को बहुजन समाज पार्टी बनाई और जब तक सक्रिय रह सके, उसके नारों व नैतिकताओं को अन्य पार्टियों से अलग रखा।
बीती शताब्दी के नवें दशक के उत्तरार्ध में उन्होंने देश के सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले राज्य उत्तर प्रदेश को अपनी राजनीतिक प्रयोगशाला बनाया, तो इस हद तक सफल हुए कि देश ने अपना पहला दलित महिला मुख्यमंत्री पा लिया। उन्हीं दिनों उन्होंने राजनीति का अनूठा ‘पलटीमार दर्शन’ भी सामने रखा, जिसमें सारा जोर इस पर था कि सत्ता की चाभी बहुजनों के हाथ देने के लिए वे किसी भी उपलब्ध रास्ते या साधन के उपयोग से हिचकिचाएंगे नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि जब तक जाति है, मैं अपने समुदाय के लाभ के लिए उसका उपयोग करता रहूंगा। जिन्हें इससे समस्या है, उन्हें चाहिए कि जाति व्यवस्था को ही खत्म कर दें। ‘सत्ता पाने के लिए जन आंदोलन की जरूरत होती है, उस जन आंदोलन को वोटों में परिवर्तित करना, फिर वोटों को सीटों में बदलना, सीटों को सत्ता में परिवर्तित करना और अंतिम रूप से सत्ता में, केंद्र में परिवर्तित करना। यह हमारे लिए मिशन और लक्ष्य है।’ उन्होंने साफ कह दिया था कि हम सामाजिक न्याय नहीं, सामाजिक परिवर्तन चाहते हैं। क्योंकि सामाजिक न्याय का बहुजनों के लिए कोई हासिल नहीं है। उनके अनुसार ‘सामाजिक न्याय सत्ताधीश की सदाशयता पर निर्भर करता है। कोई अच्छा सत्ताधीश आता है तो लोग सामाजिक न्याय पाकर खुश हो सकते हैं’, लेकिन बुरे सत्ताधीश के दौर में ऐसा न्याय फिर अन्याय में बदल जाता है।


