Wednesday, May 25, 2022
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नींबू की उत्पादन तकनीक

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भारत में आम तथा केले के बाद नींबू प्रजाति के फलों का तीसरा स्थान है इसमें सर्दी तथा गर्मी सहन करने की क्षमता होने के कारण नींबू प्रजाति का कोई न कोई फल लगभग सभी प्रांतों में उगाया जाता है। नींबू संपूर्ण भारत में उगाया जाता है। नींबू प्रजाति के फलों की दो श्रेणियां हैं-खट्टी जातियां तथा मीठी जातियां।

खट्टी जातियों में नींबू गलगल रंगपुर लेमन, कर्ना खट्टा इत्यादि फल आते हैं।
मीठी जातियों में संतरा, मौसम्बी, ग्रेपफ्रूट चकोतरा इत्यादि फल आते हैं।
इन फलों में विटामिन ए, बी, सी और खनिज पदार्थ प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। नींबू प्रजाति के फल विटामिन ‘सी’ के प्रमुख स्त्रोत है।

जलवायु

नींबू की खेती उष्ण से शीतोष्ण जलवायु तक सफलतापूर्वक की जा सकती हैं। शुष्क एवं अर्धशुष्क क्षेत्र जहां पानी की सुविधा हो, इसकी खेती के लिए उत्तम रहते हैं। इसकी सफल बागवानी के लिए उपयुक्त तापक्रम 16 से 32 डिग्री से. है। राजस्थान के उन भागों में जहां पाला कम पड़ता है तथा वातावरण नम व जाड़े की ऋतु लंबी होती है, वहां इसकी खेती सफलतापूर्वक की जाती हैं।

भूमि

नींबू की खेती सभी प्रकार की मृदाओं में की जा सकती है किंतु उपजाऊ दोमट भूमि सर्वोत्तम मानी गयी है। भूमि जीवांश युक्त व 2 मीटर गहरी होनी चाहिए। अधिक रेतीली व चिकनी मिट्टी इसके लिए उपयुक्त नहीं रहती है। भूमि में जल निकास की उचित व्यवस्था हो।

उन्नत किस्में

भारत मे उगाई जाने वाली विभिन्न किस्मों में कागजी नींबू, पाती नींबू, कागजी कलां, बारहमासी नींबू, इंदौर सीडलैस, पन्त लेमन -1 आदि प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त कई नई किस्में जैसे विक्रम, प्रमालिनी, सईशर्बती तथा जयदेवी आदि विकसित की गई हैं, जो अधिक उपज तथा उत्तम गुणवत्ता वाली हैं।

प्रवर्धन

नींबू का प्रवर्धन निम्न विधियों से किया जाता है

बीज द्वारा: नींबू के प्रवर्धन की यह सबसे सरल विधि है। नींबू के बीज में बहुभ्रूणता होने के कारण एक बीज से तीन-चार पौधे निकलने की संभावना रहती है। बीज जुलाई-अगस्त के माह में भूमि से 10 सेमी. ऊंची उठी क्यारियों में बोना चाहिए। उगने के 6 माह के बाद दूसरी क्यारियों में 10 से 15 सेमी. के अंतर पर या पॉलीथिन की थैलियों में स्थानान्तरित कर दें। लगभग 9 माह के बाद पौधे खेत में रोपने योग्य हो जाते हैं।

गूटी दाब द्वारा : गूटी के लिए ऐसी शाखा का चुनाव करते हैं जो एक वर्ष पुरानी हो व लगभग एक सेमी. मोटी हो। जुलाई-अगस्त के महीने में चुनी गई शाखा पर 4 सेमी लंबाई में छल्ले के आकार में छाल उतार दी जाती है, ध्यान रहे की छाल पूरी तरह हट जाए व काष्ठ को कोई हानि न पहुंचे। कटे हुए भाग को नम मॉस से ढक कर ऊपर से पॉलीथिन का टुकड़ा लपेट दिया जाता है।

लगभग 20 से 25 दिन बाद कटाव के ऊपर वाले भाग से जड़े आ जाती है। इस प्रकार तैयार गूटी को जड़ सहित पैतृक वृक्ष से काट कर अलग करके नर्सरी में पॉलीथिन की थैलियों में लगाकर अर्ध छायादार जगह पर रख देते हैं। गूूटी में जड़ों के शीघ्र के तथा अच्छे फुटान के लिए लेनोलीन के साथ आईबीए (500-1500 पीपीएम) का लेप कटाव के ऊपर वाले भाग पर लगाने की अनुशंसा की जाती है।

पौध रोपण

नींबू के पौधे लगाने के लिए मई-जून के महीने मे 75७75७75 सेमी. आकार के गड्डे 6७6 मीटर की दूरी पर खोदे जाते है। उक्त गड्ढों को 10-15 दिन खुला छोड़ने के बाद प्रत्येक गड्ढे में 20 किलोग्राम गोबर की खाद, किलोग्राम सुपर फास्फेट तथा 50 से 100 ग्राम मिथायल पैराथियान पाउडर मिट्टी के साथ मिलाकर पुन: भर देना चाहिए। जुलाई-अगस्त माह में तैयार गड्ढों में पौधे लगाना उपयुक्त रहता हैं पौधा रोपण के तुरंत बाद सिंचाई अवश्य करें।
देशी खाद, सुपर फास्फेट तथा म्यूरेट आॅफ पोटाश की पूरी मात्रा व यूरिया की आधी मात्रा फूल आने के 6 सप्ताह पूर्व दें। यूरिया की शेष आधी मात्रा फल बनने पर दें।

सिंचाई

वर्षा ऋतु में प्राय: सिंचाई की आवश्यकता नही पड़ती है। नींबू में सर्दी में 25 दिन के अंतराल पर व गर्मी मे 15 दिन के अंतराल में सिंचाई करें। फूल खिलने के समय सिंचाई नहीं करनी चाहिए अन्यथा फूल झड़ने की सम्भावना रहती है।
कटाई-छंटाई

साधारणत: नींबू में किसी विशेष कटाई-छंटाई की आवश्यकता नहीं पड़ती हैं, परंतु वर्ष में एक बार रोग ग्रसित, सूखी व एक दूसरे में फंसी शाखाओं की कटाई-छंटाई करना चाहिए। इसके अतिरिक्त प्रारम्भिक अवस्था में निश्चित आकार प्राप्त करने के लिये कटाई-छंटाई करें।

उपज एवं भंडारण

नींबू का पौधा 3-4 वर्ष की आयु के बाद फल देने योग्य हो जाता है। फलों की तुड़ाई पूर्ण परिपक्व अवस्था में करनी चाहिए। नींबू का रंग हल्का पीला हो जावे तब उन्हें तोड़ लेना चाहिए। पूर्ण विकसित पौधे से लगभग 1000 से 1200 फल प्रति पौधा व औसतन 50-75 किग्रा. प्रति पौधा उपज प्राप्त होती है। नींबू के फलों को 8-10 डिग्री सेल्सियस तापक्रम व 85-90 प्रतिशत आपेक्षिक आर्द्रता पर 3-6 सप्ताह तक भंडारित किया जा सकता है।

कीट

नींबू वर्गीय फलों को नुकसान पहुंचाने वाले विभिन्न कीटों में निम्नलिखित कीट प्रमुख हैं-

नींबू की तितली : तितली की लटें पत्तियों को खा कर नुकसान पहुंचाती है। इससे पौधों की वृद्धि रुक जाती है। इसके नियंत्रण के लिए लटों को पौधों से पकड़ कर मिट्टी के तेल में डालना चाहिए। क्विनालफास 25 ईसी का 1.5 मिली./लीटर पानी मैं गोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।
फल चूषक : कीट फलों से रस चूस कर नुकसान करता है। प्रभावित फल पीला पडकर सूख जाता है और गुणवत्ता भी कम हो जाती है। इस कीट के नियंत्रण के लिए मैलाथियॉन 50 ईसी 1 मिली/लीटर पानी का घोल का छिड़काव करना चाहिए। कीट को आकर्षित करने के लिए प्रलोभक का भी उपयोग करना चाहिए। प्रलोभक में 100 ग्राम शक्कर के 1 लीटर घोल में 10 मिली. मेलाथियान मिलाया जाता है।
लीफ माइनर : यह कीट वर्षा ऋतु में नुकसान पहुंचाता है। यह पत्तियों की निचली सतह को क्षतिग्रस्त कर पत्तियों में सुरंग बनाता है। इस कीट के नियंत्रण हेतु मिथाइल डिमेटॉन 25 ईसी या क्विनालफास 25 ईसी का 1.5 मिली/लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।
मूलग्रंथी (सूत्रकृमि) : यह नींबू प्रजाति के फलों की जड़ों को नुकसान पहुंचाता है। इसके प्रकोप से फल छोटे व कम लगते हैं। पत्तियां पीली पड़ कर टहनियां सूखने लगती हैं। इसके नियंत्रण के लिए कार्बोफ्यूरॉन 3 जी 20 ग्राम/पौधा देना चाहिए।

नींबू वर्गीय फलों को प्रभावित करने वाली निम्नलिखित व्याधियां

नींबू का केंकर : यह रोग जेंथोमोनास सिट्राई नामक जीवाणु द्वारा होता है। रोग से प्रभावित पत्तियों, फलों व टहनियों पर भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते है। फलों पर पीले, खुरदरे धब्बे बन जाने से गुणवत्ता प्रभावित होती है। कागजी नींबू इससे ज्यादा प्रभावित होते है। केंकर की रोकथाम के लिए 20 ग्राम एग्रोमाइसीन अथवा 8 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन को 10 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। नये रोग रहित पौधों का चुनाव करें तथा पौधों पर रोपण से पूर्व बोर्डो मिश्रण का छिड़काव करें।

गमोसिस : यह तना सड़न रोग है, जिसमें तने से भूमि के पास व टहनियों के ग्रसित भाग से गोंद जैसा पदार्थ निकलता है। इस गोंद से छाल प्रभावित होकर नष्ट हो जाती है। रोग के अधिक प्रकोप से पौधा नष्ट हो जाता है। रोग के नियंत्रण के लिए छाल से गोंद हटाकर ब्लाईटॉक्स-50 0.3 प्रतिशत का छिड़काव करना चाहिए। इस दवा का छिड़काव पौधों पर भी किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त बाग का उचित प्रबंधन भी रोग से बचाव करता है।

सूखा रोग (डाई बैक): इस रोग में टहनियां ऊपर से नीचे की तरफ सूख कर भूरी हो जाती हैं। पत्तियों पर भूरे बेंगनी धब्बे बनने से सूख कर गिर जाती हैं। इससे उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा पौधा नष्ट हो जाता है। नियंत्रण के लिए रोगी भाग को काट कर अलग करना चाहिए एवं मेन्कोजेब 2 ग्राम/लीटर पानी का घोल का छिड़काव करना चाहिए। इसके अतिरिक्त फरवरी व अप्रैल माह में सूक्ष्म तत्वों का पौधों पर छिड़काव करना चाहिए।

दुर्गाशंकर मीणा, जयराज सिंह गौड़, डॉ. मूलाराम


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