Sunday, May 31, 2026
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कोढ़ है समाज में फैलती नफरत

Samvad


snehveer pundir 1समाज में लगातार बढ़ता वैमनस्य गंभीर चिंता का विषय है। हर रोज बढ़ने वाले जातीय और धार्मिक संगठनों की संख्या इन हालात को बिगाड़ने में आग में घी का काम कर रही है। अभी पिछले दिनों मुजफ्फरनगर के एक गांव खुब्बापुर के एक स्कूल की घटना ने पूरे देश की मीडिया और सोशल मीडिया में हलचल मचा दी है। इस घटना में एक स्कूल की शिक्षिका एक मुस्लिम बच्चे को अन्य बच्चों से पिटवाती हैं। शिक्षिका उस बच्चे के लिए कहती दिखाई देती हैं कि यह बच्चा मुस्लिम है और वह मुस्लिम बच्चों को कहीं अन्यत्र चले जाने को कह चुकी हैं। इस घटना के तूल पकड़ने के बाद शिक्षिका के विरुद्ध मुकद्दमा दर्ज किया जा चुका है तथा स्कूल पर सील लगाकर उसके अन्य बच्चों को अन्य स्कूल में ट्रान्सफर भी कर दिया गया है। राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, मुजफ्फरनगर को इस पूरे मामले की जांच आरंभ करने और शिक्षिका के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के लिए निदेशित किया है। अधिकारी को एक सप्ताह के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट सबमिट करने के लिए निर्देश भी दिए गए हैं।
इस घटना के बाद स्थानीय राजनीति सक्रिय हो गई और उनके द्वारा बच्चों को गले लगवाकर मामले को खत्म करने की घोषणा कर दी। हालांकि पिटने वाले और पीटने वाले बच्चों के बीच में न ही कोई झगड़ा था और न ही कोई आपसी विवाद। फिर भी उन बच्चों को गले मिलवाकर समाज के लोगों ने अपनी तरफ से इस माहौल को खत्म करने की ही कोशिश की, भले ही इस कोशिश में उन बच्चों की पहचान उजागर हो गई।

यह भी निश्चित रूप से माना जा सकता है कि उस उम्र के उन बच्चों के बीच में अभी तक वह नफरत शायद पैदा भी नहीं हो पाई हो जो उनके अंदर समाज के ऐसे नकारात्मक लोग पैदा करने की लगातार कोशिश कर रहे हैं। उन्हें शायद अभी तक इस घटना की गंभीरता का भी अंदाजा नहीं होगा। हां, यह जरुर माना जा सकता है कि ऐसे शिक्षक से शिक्षा पा रहे बच्चे जल्दी ही ऐसी नफरत से भर जाएंगे और एक नफरत भरे समाज का ही निर्माण करेंगे।

यह घटना कुछ मौलिक सवाल पैदा करती है जो पूरे समाज के लिए एक खतरे की घंटी की तरह है। राजनीतिक फायदों के लिए पैदा की गई यह आपसी घृणा और विद्वेष अगर शिक्षक के मन में भी घर कर गई है तो समाज के बाकि वर्गों की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। हालाँकि गंभीर बात यह है कि यह केवल एक शिक्षक का मामला नहीं है बल्कि समाज में नफरत इस कदर फैल चुकी है कि देश और समाज की प्रगति के लिए नई पीढ़ियों को दिशा देने वाला शिक्षक वर्ग का एक बड़ा हिस्सा भी इसकी चपेट से बच नहीं पाया है।

ऐसा भी नहीं है कि यह नफरत और विद्वेष केवल धार्मिक स्तर तक ही सीमित हो, इस नफरत और घृणा की बानगी आये दिन होने वाले जातीय संघर्षों में भी देखने को मिलती रहती है। सोशल मीडिया पर एक सरसरी सी दृष्टि डालने से ही देश के विभिन्न वर्गों, जातियों और धर्मों के बीच पनप रही है, बल्कि कहा जाए तो समाज में संक्रमण की तरह फैल चुकी यह आपसी नफरत किसी भी समय विस्फोटक रूप ले सकती है। सहारनपुर में हो चुकी जातीय हिंसा हो या मेवात में होने वाला धार्मिक दंगा हो या मणिपुर का ताजा संघर्ष हो, यह देश के विभिन्न वर्गों के बीच पनप रही आपसी नफरत और घृणा की बानगी भर हैं। यह सभी घटनाएं किसी भी सभी समाज के लिए एक गंभीर चुनौती पैदा कर रही हैं।

धर्मिक संघर्ष अभी तक केवल शहरी समाज को ही प्रमुखतया प्रभावित करते थे और ग्रामीण अंचल इस सबसे अलग आपसी प्यार और सौहार्द के माहौल में नजर आता था। लेकिन आपसी नफरत के इस राक्षस ने अब उस ग्रामीण समाज को भी अपनी चपेट में ले लिया है, जिन में पीढ़ी दर पीढ़ी लोग एक साथ रहते आए हैं। हालात यहां तक पहुंच चुके हैं कि देश के महापुरुषों को भी जातीय और धार्मिक आधार पर पहचान देने की कोशिश की जाने लगी है, बल्कि दे दी गई है। ऐसा माहौल खड़ा हो गया है कि लगता है अगर किसी महापुरुष की जाति अगर उसे सम्मान नहीं देगी तो शायद वह महापुरुष सम्मान के लायक ही नहीं रहेगा।

सड़कों पर आए दिन जातीय आधार पर अपने अपने महापुरुषों के नाम पर निकलने वाली शौर्य और शोभा यात्राएं इस नफरत की आग में घी का काम कर रही हैं। हालांकि हम सभी यह अच्छे से जानते हैं कि किसी भी महापुरुष को जातीय स्तर तक समेटना उनका अपमान ही है। इतने प्रयासों के बाद भी देश के ऐसे तमाम महापुरुष हैं, जिन्हें अभी तक भी जातियों तक समेटना संभव नहीं हो पाया है। महात्मा गांधी आज तक भी इस देश में केवल वैश्य वर्ग तक ना ही सिमट पाए हैं और ना ही यह संभव हो सकता हैं।

हम सब जानते हैं कि शहीद भगतसिंह को केवल सिखों के महापुरुष के रूप में स्थापित करने का कोई भी प्रयास हास्यास्पद ही सिद्ध होगा। क्या हम सुभाषचन्द्र बोस का सम्मान उनकी जाति देखकर करते हैं या उनके देश के लिए किए गए त्याग, बलिदान और उनके शौर्य के लिए करते हैं? क्या हमारे लिए खान अब्दुल गफ्फार खान इसलिए कम सम्मान के लायक हो सकते हैं क्योंकि वह मुस्लिम थे? हम जानते हैं ऐसा बिलकुल नहीं हो सकता। यह नफरत अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए राजनीति के खिलाडी पैदा करते रहते हैं, जिसे समझने की आवश्यकता है।

समाज में पनप रही इस मानसिकता को भी समझने की भी आवश्यकता है कि हम सबने यह मानना शुरू कर दिया है कि हमारा इस देश में चाहे कोई योगदान नहीं हो, लेकिन अगर हमारे महापुरुष महान हैं तो हम भी खुद को महानता की श्रेणी में समझना शुरू कर देते हैं। जरूरत इस बात की है कि हम खुद एक अच्छे नागरिक और इंसान बने ना कि महापुरुषों से खुद को जोड़कर ही अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लें। स्वाभाविक ही है कि नफरत का यह जहर, जो धार्मिक स्तर पर समाज में हर तरफ फैल चुका है, यह केवल यहीं रुकने वाला नहीं था, बल्कि यह इससे भी आगे बढ़ना तय था।

यह समझने की आवश्यकता है कि इस देश का एक साझा अतीत है। यहां के धर्म और जातियां आपस में ऐसे गुथे हुए हैं कि उनको अलग कर पाना संभव नहीं है। यह भी अच्छी प्रकार से समझना होगा कि महापुरुष भी देश की विरासत की तरह साझे ही हैं। उन्हें किसी जाति या धर्म में बांटकर देखना उनका महत्व कम करने का ही प्रयास है और ऐसा कोई भी प्रयास निंदनीय ही माना जाएगा।


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