Tuesday, March 17, 2026
- Advertisement -

महात्मा गांधी और अगस्त माह

21 1

1920 में यही अगस्त का महीना था, जब इस देश ने महात्मा गांधी के आह्वान पर ऐतिहासिक असहयोग आंदोलन को शुरू होते और स्वतंत्रता के लिए पहला जनांदोलन बनते देखा। शुरू होने के कोई महीने भर बाद सितंबर, 1920 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने कलकत्ता अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित करके इसे अपने आंदोलन के रूप में औपचारिक स्वीकृति दी और देशवासियों से अपील की कि वे स्कूल-कॉलेजों व न्यायालयों वगैरह, दूसरे शब्दों में कहें तो अंग्रेजों की बनाई सारी शासन व्यवस्था का बहिष्कार करें और उन्हें कोई भी कर न चुकाएं। आंदोलन चल निकला तो महात्मा ने यह उम्मीद जताने में भी देर नहीं की कि ऐसा ही रहा तो देश साल बीतते-बीतते स्वराज हासिल कर लेगा। लेकिन हम जानते हैं कि ऐसा संभव नहीं हुआ। 1922 में 4 फरवरी को संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) के गोरखपुर जिले में स्थित चौरी-चौरा में गुस्साए लोगों ने थाने में आग लगाकर वहां तैनात थानेदार और 22 सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिया, जिससे स्तब्ध महात्मा ने अचानक यह कहकर आंदोलन वापस ले लिया कि उन्हें लगता है कि देश अभी ऐसे अहिंसक आंदोलनों के लिए तैयार नहीं है और वे उसे हिंसक होने से बचाने के लिए हर एक अपमान, हर एक यातनापूर्ण बहिष्कार, यहां तक कि मौत भी सहने को तैयार हैं। उनके इस फैसले से, स्वाभाविक ही, एकबारगी देश में गहरी निराशा छा गई। लेकिन उसने इस निराशा से उबरने में ज्यादा समय नहीं लिया।

अनेक देशाभिमानी युवा, जो असहयोग आंदोलन को उम्मीद की नई किरण के रूप में देख रहे थे, जल्दी ही उसकी अचानक वापसी से उत्पन्न निराशा से छुटकारा पाकर सशस्त्र स्वतंत्रता संघर्ष के पथ पर चल पड़े और उन युवाओं से जा मिले, जिन्होंने अंग्रेजों द्वारा जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल, 1919 को अंजाम दिए गए नरसंहार के बाद ही मान लिया था कि अब देश की मुक्ति के लिए सशस्त्र संघर्ष ही एकमात्र विकल्प है।

बहरहाल, महात्मा का पक्ष समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि इस आंदोलन से पहले और उसके बीच भी उन्होंने देशवासियों को सत्य व अहिंसा के प्रति प्रेरित और उनके अनुकूल आचरण के लिए तैयार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। आंदोलन के बीच उन्होंने उस गोरखपुर जिले की यात्रा भी की थी, जिसके चौरी-चौरा में हिंसा व आगजनी के चलते उनको आंदोलन वापस ले लेना पड़ा और उसको मंजिल नहीं मिल पायी। दरअसल, गोरखपुर के कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने 17 अक्टूबर, 1920 को अपनी एक बैठक में महात्मा से वहां आने का अनुरोध करने का फैसला किया और इसके लिए अपने साथी बाबा राघव दास और कुछ अन्य को नागपुर भेजा। इन लोगों ने वहां कांग्रेस के अधिवेशन में यह अनुरोध महात्मा तक पहुंचाया तो उन्होंने उसे स्वीकार कर लिया। अनंतर, 8 फरवरी, 1921 को जवाहरलाल नेहरू सहित कई नेताओं के साथ वे गोरखपुर आए, जहां भावभीने स्वागत के बाद उन्होंने बाले मियां के मैदान में कोई डेढ़ लाख लोगों की सभा को संबोधित किया। उन दिनों कांग्रेस की सभाओं को लेकर सरकार के विरोधी रवैए और यातायात की दुश्वारियों के मद्देनजर यह बहुत बड़ी संख्या थी। गौरतलब है कि इसी सभा में महात्मा का भाषण सुनने के बाद उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने शिक्षा विभाग की अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी थी।

लोगों की इस दीवानगी को इस तरह समझा जा सकता है कि महात्मा के गोरखपुर में प्रवास की खबर पड़ोस के बस्ती जिले के आजादी के कार्यकर्ताओं तक पहुंची और उन्होंने जाना कि प्रशासन महात्मा की सभाओं को विफल करने के लिए अड़ंगों और पाबंदियों का सहारा ले रहा है, तो वे जैसे भी बने, उनको बस्ती ले आने की जुगत में लग गए। इस जुगत में उनके सहायक बने जिले के भिरिया ऋतुराज गांव के निवासी वकील अंशुमान सिंह।

प्रसंगवश, महात्मा इसके बाद कभी गोरखपुर नहीं आ पाए, लेकिन आठ वर्षों बाद 08 अक्टूबर, 1929 को सविनय अवज्ञा आंदोलन की (जो 1930 में 12 मार्च को शुरू हुआ) तैयारियों के दौर में फिर बस्ती आए तो भी लोगों में उनके प्रति कुछ कम दीवानगी नहीं दिखी। अगले दिन 09 अक्टूबर को जिले के हथियागढ़ रेहार के मैदान में उन्होंने एक विशाल सभा को संबोधित किया तो जिले की जनता की ओर से उनको पांच हजार रुपयों की थैली भेंट की गई। बताते हैं कि महात्मा की इस यात्रा की पूरी व्यवस्था जिले के ओड़वारे गांव के निवासी उनके अनुयायी किसान सीताराम शुक्ल ने की थी। इसके लिए शुक्ल ने गांव की अपनी खेती की सारी जमीन बेच दी थी। इस बिक्री से उन्हें कुल मिलाकर अठारह हजार रुपये हासिल हुए थे और उन्होंने सारे के सारे सभा के लिए जरूरी इंतजामों में लगा दिए।

वे रेलवे स्टेशन पहुंचे तो मनकापुर के राजा राघवेंद्र प्रताप सिंह ने उन्हें अपने राजमहल में लाने के लिए अपनी राजसी बग्घी भेज रखी थी। महात्मा ने उनको निराश नहीं किया और राजमहल चले गए तो राजा ने उन्हें स्वतंत्रता संघर्ष के लिए चार हजार रुपयों की थैली भेंट की। लेकिन राजसी पोशाक में अपने बच्चों को उनका आशीर्वाद दिलाने ले आए, तो महात्मा ने छूटते ही कहा, ‘राजा साहब, यह राजसी ठाठ छोड़े बगैर न अंग्रेजों से लड़ाई हो सकेगी, न ही आजादी का कोई मतलब होगा।’ उनकी बात का असर हुआ और राजा तन-मन दोनों से इतने गांधीवादी हो गए कि उनकी प्रजा उन्हें ‘गांधी राजा’ कहने लगी। मनकापुर से ग्यारह अक्टूबर को महात्मा बाराबंकी पहुंच गए। इसी दिन ‘यंग इंडिया’ और ‘नवजीवन’ में उनकी दो अलग-अलग टिप्पणियां छपीं। ‘यंग इंडिया’ में उन्होंने लिखा था कि कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को नए सदस्यों के संपर्क में रहना, उनसे मेलजोल बढ़ाना, उनके सुख-दुख में हाथ बंटाना और उन्हें खादी का महत्व बताना चाहिए। बस्ती निवासी देश के वरिष्ठ पत्रकार और लेखक अरुण कुमार त्रिपाठी बताते हैं कि असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलनों के लम्बे दौर में गोरखपुर, बस्ती और आसपास के जिलों में महात्मा के बारे में अनेक चित्र-विचित्र व चमत्कारिक बातें प्रचारित होती रहती थीं, जिनका कोई ओर-छोर पता नहीं चलता था।

इन बातों ने महात्मा को मिथ बना डाला था। कभी कहीं कोई कहता था कि महात्मा कलकत्ता और मुल्तान में एक साथ देखे जाते हैं तो कभी कहीं कोई यह कि वे जिस अन्न को छू देते हैं, वह चार गुना हो जाता है। महिलाएं उन्हें अपने हाथों से अपने गले के हार उतारकर दे देती थीं तो संन्यासी अपनी कंठी। कोई उनको अपने हाथ से बुनी चादर भेंट कर देता था तो कोई बाघ की छाल। 1925 में बस्ती के जोगिया उदयपुर में जन्मे प्रभु दयाल विद्यार्थी पर तो एक बाजार में ठक्कर बापा से सुनी महात्मा की शिक्षाओं का इतना गहरा असर हुआ कि वे दस साल की उम्र में ही घर बार छोड़कर उनके वर्धा स्थित सेवाग्राम जा पहुंचे। अनंतर, उन्होंने ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में हिस्सा लिया और महात्मा के कहने पर पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर जेल में तन्हाई की सजा समेत अनेक यातनाएं भोगीं।

spot_imgspot_img

Subscribe

Related articles

Bihar News: कॉल पर दी धमकी, फिर पुलिस से भिड़ंत, STF जवान शहीद, दो अपराधी मारे गए

जनवाणी ब्यूरो | नई दिल्ली: पूर्वी चंपारण जिले के चकिया...

UP: गोरखपुर में भाजपा नेता की बेरहमी से हत्या, इलाके में दहशत

जनवाणी ब्यूरो | नई दिल्ली: गोरखपुर के चिलुआताल थाना क्षेत्र...

UP: मुरादाबाद में दर्दनाक सड़क हादसा, ट्रैक्टर-ट्रॉली से टकराई कार, चार युवकों की मौत

जनवाणी ब्यूरो । नई दिल्ली: भरी ट्रैक्टर-ट्रॉली में जा घुसी।...

सिलेंडर बिन जलाए रोटी बनाने की कला

मैं हफ्ते में एक दिन आफिस जाने वाला हर...
spot_imgspot_img