Wednesday, March 25, 2026
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चने की फसल के लिए मुख्य बातें

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चने की फसल के लिए अधिक जुताइयों की आवश्यकता नहीं होती है खेत को तैयार करते समय कल्टीवेटर से 2.3 जुताइंयां कर खेत को समतल बनाने के लिए पाटा लगाएं। पाटा लगाने से नमी संरक्षित रहती है।

उपलब्धतानुसार गोबर की सड़ी खाद या कम्पोस्ट खाद 10.20 टन/ हेक्टयर की दर से खेत की तैयारी के समय डालनी चाहिए ताकि खेत में पोषक तत्वो के साथ उसकी जलधारण क्षमता भी बढ़ सके।

किस्में

मध्य क्षेत्र के लिए संस्तुत चने की उन्नतशील प्रजातियां का चयन करें जैसे पूसा-209, पूसा-212, पूसा-244, पूसा-256, पूसा-372, जे.जी.-11, जे.जी.-11, जे.जी.-24, जे.जी.-62, जे.जी.-315, जे.जी.-322, सूर्या (डब्लू सी.जी.2), अवरोधी, राधे, के.डब्लू.आर.-108, के.जी.डी.-1168 (उकठा रोधी (पी. 209, पी. 212, पी. 261, गौरव आदि किस्मों की बुवाई करनी चाहिए। काबुली चने की पूसा 1053, जे.जी.के.-1, के.एल. के.-2, एल. 550 आदि किस्में उकटारोधी तथा अधिक पैदावार देने वाली है।

बुवाई का समय

बुआई अक्टूबर के द्वितीय पखवाड़ें में करें। देर से बुआई करने पर फसल की पैदावार पर विपरीत प्रभाव पडता है़। यदि किसी कारणवश बुवाई मे देरी होती है तो शीघ्र पकने वाली कम अवधि की किस्म जैसे जे.जी.11, पूसा.372 आदि का चुनाव करें। किस्मों के अनुसार लाइन से लाइन की दूरी 30.45 से.मी. रखी जा सकती है। समय से बुआई करने पर बीज की दर 70.80 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर तथा देरी से बुवाई में बीज की मात्रा बढ़ाकर 90 कि.ग्रा.प्रति हेक्टेयर डालें। याद रखें खाद व बीज मिलाकर ना बोयें तथा खाद व बीज के डालने मे कम से कम 5 से.मी. की दूरी अवश्य रखें। इसके लिए उर्वरको को बीज से लगभग 5 से.मी. गहरा अथवा साइड में डाला जा सकता है।

बीज उपचार

बुवाई से पूर्व बीज की बीमारियों से सुरक्षा हेतु 2 ग्राम बैविस्टिन 1 ग्राम थाइरम प्रति किलोग्राम बीज से उपचारित करके बोएं।

उर्वरक

यदि खेत मे दीमक की सम्भावना हो तो बीज को कीटनाशी जैसे क्लोरोपाइरीफॉस की 5 मिलीलीटर मात्रा प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करना चाहिए। बीज को नत्रजन तथा फास्फोरस की उपलब्धता बढ़ाने वाले जैव उर्वरकों से भी अवश्य उपचारित करना चाहिए। चने की फसल में बुवाई के समय 15.20 किग्रा, नत्रजन 60.80 किलोग्राम स्फुर (फास्फोरस) तथा 30.40 किलोग्राम पोटाश (पाशुज) प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिए।

खरपतवार प्रंबधन

चना की फसल कम उचाई की होने के कारण खरपतवारों से अधिक प्रभावित होती है। इनके नियत्रंण के लिये दो बार पहली बुवाई 25.30 दिन बाद व दूसरी बार 55.60 दिन बाद खुरपी से निराई करनी चाहिए। इसके लिए लाईनों मे ह्यहोझ् या अन्य किसी कृषि यंत्र का प्रयोग करके भी इन्हे नियंत्रित किया जा सकता है। खरपतवारनाशियों जैसे एक किलोग्राम सक्रिय तत्व फ्लूक्लोरेलिन (बैसालिन) प्रति हेक्टेयर बुवाई पूर्व मिट्टी मे मिलाकर अथवा 0.75 से 1.0 किलोग्राम सक्रिय तत्व पेन्डीमेथेलिन प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के बाद अंकुरण पूर्व छिड़काव द्वारा खरपतवारो ंका नियंत्रण करें।

सिंचाई

चने की खेती मुख्य रुप से बारानी क्षेत्रों में की जाती है तथा सिंचाई की आवश्यकता नहीं है। लेकिन जहां सिंचाई की सुविधा है तो हल्की मृदाओं में पलेवा करके ही चने की बुवाई करें ताकि सुनिश्चित अंकुरण हो। भारी मृदाओं में बुवाई के समय यदि खेत में नमी कम है तो बुवाई के बाद सिंचाई कर दें। इसके बाद आवश्यकतानुसार पहली सिंचाई 45.50 दिन बाद तथा दूसरी फली बनते समय करें। फूल आते समय कभी भी सिंचाई नही करें।

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