Sunday, May 17, 2026
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मनुष्य के जीवन की सार्थकता 


बालकृष्ण भट्ट 

हमारे जीवन की सार्थकता क्या है और कैसे होती है इस पर जुदे-जुदे लोगों के जुदे-जुदे विचार और उद्देश्य हैं, अधिकतर इसका उद्देश्य समाज पर निर्भर है अर्थात हम जिस समाज में जैसे लोगों के बीच रहते हैं उनके साथ जैसा बर्ताव रखते हैं उसी के अनुसार हमारे जीवन की सार्थकता समझी जाती है। यद्यपि कवियों ने मनुष्य जन्म की सार्थकता को अपनी-अपनी उक्ति के अनुसार कुछ और ढंग से ढुलका लाए हैं जैसे भारवि ने कहा है-

स पुमानर्थवज्जन्मा यस्य नाम्नि पुरस्थिते।

नान्याड़्गुलि समभ्येति संख्याया मुद्यताड़्गुलि :

पुरुष वह है जिसमें पुरुषार्थ का अंकुर हो; सार्थक जन्म वही पुरुष है कि जिसके पौरुषेय गुणों की गणना में जो उंगुली उसके नाम पर उठे वही फिर दूसरे के नाम पर नहीं-अर्थात जो किसी प्रकार के गुण में एकता प्राप्त किए हैं संसार में उसके बराबरी का दूसरा मनुष्य न हो। इस तरह की बहुतेरी कवियों की कल्पनाएं पाई जाती हैं किंतु यहां इन कल्पनाओं से हमारा प्रयोजन नहीं है जिसे हम जीवन की सार्थकता कहेंगे वह बात ही निराली है। समाज के बर्ताव के अनुसार सफल इसे अलबत्ता कहेंगे जैसा-

यस्य दानजितं मित्रं शत्रवो युधि निर्जिता:

अन्नपानजिता दारा सफलं तस्य जीवितम।।

जिसने समय-समय धन दे मित्रों को अपने काबू में कर लिया, जिसने शत्रुओं को संग्राम में जीता, भांति-भांति के गहने और कपड़ों से जिसने अपनी स्त्री का संतोष किया उसी का जीवन सफल है। बस यही सफल जीवन की इयत्ता या ओर-छोर है, तात्पर्य यह कि जिसने स्वार्थ-साधन को भरपूर समझा वही यहां सफल जन्मा है। विलायत में जब तक अपने देश या जाति के लिए कोई ऐसी बात न कर गुजरा जिसमें सर्व साधारण का कुछ उपकार है तब तक जीवन की सफलता नहीं कही जा सकती क्योंकि इतना तो जानवर भी कर लेते हैं-अपने बच्चों को पालना पोसना वे भी भरपूर जानते हैं, जो उनके शत्रु हैं उनसे लड़ना, जो उसके साथ भलाई करते हैं उन्हें उपकार पहुँचने का ज्ञान उन्हें भी रहता है, वरन कुत्ते और घोड़े आदि कई एक पशुओं में कृतज्ञता और स्वामि भक्ति मनुष्यों से भी अधिक पाई जाती है तब मनुष्य और जानवर में क्या अंतर रहा।

इससे निश्चय होता है कि जन्म की सफलता का ज्ञान केवल समाज पर निर्भर है जिस काम को या जिस बात को समाज के लोग पसन्द करते हों और भला सझते हों उस ओर हमारी प्रवृत्ति का होना ही जीवन की सफलता है। जैसा इस गुलामी की हालत में पढ़-लिख सौ-पचास की नौकरी पाय अपनी जिंदगी दूसरे के अधीन कर देना ही जन्म की सफलता है। जिन्होंने दूसरे की सेवा में अपने को दूसरे के हाथ बेच डाला है उनकी फिर आजादगी कहाँ सैकड़ों वर्ष से गुलामी में रहते पुश्तहा-पुश्त बीत गए स्वच्छंदता या आजादगी की कदर हमारे मन से उठी गई। इस हीरे की परख के जौहरी इंग्लैंड तथा यूरोप और अमेरिका के देशों में पैदा होने लगे या अब इस समय जापान को इसकी कदर का ज्ञान होने लगा है।

सब कुछ जो अपने वश का है सुख है जो दूसरे के अधीन है वही दु:ख है। सुख-दु:ख का सर्वोत्तम लक्षण यही निश्चय किया गया है। सो अब इस समय दस-बीस की नौकरी भी ऐसी सोने की खेती हो रही है कि हमारे नव-युवक इसके लिए तरस रहे हैं। बड़े से बड़ा इम्तिहान पास कर अर्जी हाथ में लिए बगलें मारे फिरते हैं और दुरदुराए जाते हैं। उसमें भी वर्तमान समय के कर्मचारियों की कुछ ऐसी पालिसी हो रही है कि सौ रुपये से जियादह की नौकरी नेटिवों को न दी जाय-सेना विक्रीत काया इस नौकरी में भी वह समय अब दूर गया जब दो एक जुमले अंगरेजी के लिखने और बोल लेने ही मात्र से सैकड़ों रुपये महीने की नौकरी सुलभ थी।

आजादगी के अनन्य भक्त कोई-कोई नव युवक स्वच्छंद जीवन (इंडिपेंडेंट) की धुन बांधे हुए कोई आजाद पेशा किया चाहते हैं तो पास पूंजी नहीं कि हौसले के माफिक कुछ कर दिखाएं। कंपनी प्रणबंधगोष्ठी की चाल अपने यहां न ठहरी कि उन्हें कहीं से सहारा मिलता। हमारा ऐसा सर्वस्व हरण होता जाता है कि न तो धन रहा न कोई जीविका बच रही है कि ये लोग अपना हौसला पूरा करते। जिनके पास रुपया है वे रुपयों के सूद के घाटे का परता पहले फैला लेंगे तो टेंटा ढीला करेंगे। यों चाहें रुपया रखा रह जाय एक पैसा ब्याज न आवे पर रुपया कहीं लगाने के समय ब्याज का परता जरूर फैला लेंगे। जिन बेचारों ने हिम्मत बांध कुछ रुपया कहने सुनने से लगाया भी तो पीछे उन्होंने ऐसा गच्चा खाया कि चित्त हो गए। उन्हें कोई ऐसा दियानतदार आदमी न मिला कि उनका उत्साह बढ़ता और मिल कर हम कोई काम करना नहीं जानते यह कलंक हमसे दूर हटता। मां होती तो मौसी को कौन झींखता, हम मिलता जानते होते तो वर्तमान दास्यभाव की दशा को क्यों पहुंचते।

इस जीवन के सफलता के अनेक और दूसरे-दूसरे उदाहरण हैं। संसार को मिथ्या मानने वाले अहंब्रह्मास्मि की धनु बांधे हुए स्वभाववादी जीवन की सफलता इसी में मानते हैं कि हमें बोध हो जाय कि हमीं ब्रह्म हैं और जगत के सब काम आपसे आप होते जाते हैं कोई इसका प्रेरक नहीं है। पाप और पुण्य भला और बुरा दोनों एक-से हैं-चित में ऐसा पूरा-पूरा भास हो जाए तो बस हम जीवन मुक्त हो गए। अब हमें कुछ करना धरना न रहा। सब ओर से अकर्मण्य हो बैठे और आगे बढ़ो तो मन को नाश कर डालो, क्योंकि सब उत्साह और आगे को तरक्की करने का मूल कारण मन में न रहेगा तो बुराई का काम चाहे न भी रुके पर भलाई तो तुम से कभी होगी ही नहीं और यह सब भी तभी तक जब तक अपनी जरा भी किसी तरह की हानि नहीं है बस केवल जवानी जमाखर्च मात्र रहे आत्म त्याग के उसूल कहीं छू भी न जाए कसौटी के समय चट्ट फिसल कर चारों खाने चित्त गिर पड़ा करो-ऐसा ही सेवक भक्त अपने प्रभु की सेवा में लीन होना ही जीवन की सफलता मानता है।

सभ्य समाज के मुखिया हमारे बाबू लोगों में सफल जीवन का सूत्र साहब बनना है जब तक कहीं पर किसी अंश में भी हम हिंदुस्तानी हैं इसकी याद बनी रहेगी, तब तक उनके सफल जीवन की त्रुटि दूर होने वाली नहीं। इससे वे सब-सब स्वांग लाते हैं क्या करें लाचार हैं अपना चमड़ा गोरा नहीं कर सकते। अस्तु, ये कई एक नमूने सफल जीवन के दिखाए इन सबों में सफल जीवन किसी का भी नहीं है वरन सफल जीवन उसी पुरुष का कहा जाएगा जिसने अपने देश तथा अपने देश बांधव के लिए कुछ कर दिखाया है जो आत्म-सुखरत न हो खुदगरजी से दूर हटा है, इस तरह के उदार भाव का उन्मूलन हुए यहां बहुत दिन हुए।


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