
कर्नाटक के मतदाताओं ने वहां के विधानसभा चुनाव में जो फैसला सुनाया है, स्वाभाविक ही, उसके कई विश्लेषण किए जाएंगे। लेकिन इस सिलसिले में सबसे मौजूं बात यह है कि भाजपा के हिंदुत्व की जो गुदगुदी कभी मतदाताओं के एक बड़े हिस्से को इस हद तक हंसाती थी कि वे अपने सारे दु:ख-दर्द भूलकर उसकी झोली में आ गिरते और हर तरह की एंटीइन्कम्बैंसी से अभय कर देते थे, अब वह उन्हें इतनी रुलाने लगी है कि वे उसकी बिना पर भी भाजपा को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं। उसकी सरकारों के नाकारापने के साथ तो एकदम से नहीं। इसलिए उन्होंने हिंदुत्व को अपने कुशासन व भ्रष्टाचार का कवच बनाने की उसकी कोशिशों को सिरे से नकार दिया है। यह लगभग वैसा ही है जैसे 2014 में देशवासियों ने खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाली पार्टियों की इस उम्मीद को धराशायी कर दिया था कि वे उनकी तमाम मनमानियां सहकर भी सांप्रदायिक भाजपा को सत्ता में आने से रोके रखेंगे।