Saturday, March 14, 2026
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प्रधानमंत्री के भाषण का अर्थ

 

Samvad 6


Raju Pandayविगत दिनों प्रधानमंत्री ने लाल किले से श्री गुरु तेग बहादुर जी के 400वें प्रकाश पर्व समारोह के मौके पर देश को संबोधित किया। उनके भाषण में 26 दिसंबर को वीर बाल दिवस के रूप में मनाने के निर्णय, करतारपुर साहिब कॉरिडोर के निर्माण, गुरु गोविंद सिंह जी से जुड़े तीर्थ स्थानों पर रेल सुविधाओं के आधुनिकीकरण, स्वदेश दर्शन योजना के जरिए पंजाब में सभी प्रमुख स्थानों को जोड़कर एक तीर्थ सर्किट के निर्माण की योजना, अफगान संकट के दौरान गुरु ग्रंथ साहिब के स्वरूपों को भारत लाने और वहां से आने वाले सिखों को नागरिकता संशोधन कानून के तहत नागरिकता मिलने का सविस्तार जिक्र था। उनके भाषण में कुछ अंश ऐसे हैं, जिनका दूरगामी महत्व है और बतौर शासक देश के संचालन हेतु उनकी भावी कार्यप्रणाली एवं चिंतन प्रक्रिया के संकेत भी इनमें अंतर्निहित हैं।
उन्होंने कहा, ‘उस समय देश में मजहबी कट्टरता की आंधी आई थी। धर्म को दर्शन, विज्ञान और आत्मशोध का विषय मानने वाले हमारे हिंदुस्तान के सामने ऐसे लोग थे जिन्होंने धर्म के नाम पर हिंसा और अत्याचार की पराकाष्ठा कर दी थी। उस समय भारत को अपनी पहचान बचाने के लिए एक बड़ी उम्मीद गुरु तेगबहादुर जी के रूप में दिखी थी। औरंगजेब की आततायी सोच के सामने उस समय गुरु तेगबहादुर जी, ‘हिंद दी चादर’ बनकर, एक चट्टान बनकर खड़े हो गए थे। इतिहास गवाह है, ये वर्तमान समय गवाह है और ये लाल किला भी गवाह है कि औरंगजेब और उसके जैसे अत्याचारियों ने भले ही अनेकों सिरों को धड़ से अलग कर दिया, लेकिन हमारी आस्था को वो हमसे अलग नहीं कर सका।

कट्टर हिंदुत्व की हिमायत करने वाली ताकतें सिख धर्म को हिंदू धर्म का अंग सिद्ध करने का प्रयास करती रही हैं। सन 2000 में सरसंघचालक के सुदर्शन ने कहा था कि सिख धर्म हिंदू धर्म का एक संप्रदाय है और खालसा की स्थापना हिंदुओं को मुगलों के अत्याचार से बचाने के लिए हुई थी। वर्तमान संघ प्रमुख भी समय समय पर इसी मत का समर्थन करते रहे हैं। कट्टर हिंदुत्व समर्थकों की बहुमुखी रणनीति की यह विशेषता है कि सरकार एवं संघ के वरिष्ठ नेता संयत भाषा में अल्पसंख्यक समुदाय को वही संदेश देते हैं जो सरकार, संघ या भाजपा से असम्बद्ध समूह बहुत उग्रता से धमकी के रूप में उन तक पहुंचाते हैं।

इस प्रकरण में भी सिख धर्म को हिंदू धर्म पर आश्रित बताने के लिए एक आक्रामक अभियान पिछले दो वर्षों से अनेक पोर्टल्स और सोशल मीडिया पर चलाया जा रहा है। किसान आंदोलन के बाद इस अभियान में तेजी आई है। इसमें इस कथित झूठ का पदार्फाश किया गया है कि सिखों ने हिंदुओं की रक्षा के लिए अस्त्र उठाए थे और यह ‘खुलासा’ किया गया है कि मुगलों के अत्याचार से त्रस्त सिखों ने जब शस्त्र धारण करने का निर्णय किया तो उन्हें सैन्य प्रशिक्षण देकर पराक्रमी योद्धा बनाने वाले राजपूत राजा ही थे। इसी प्रकार यह भी बताया गया है कि सिख गुरुओं के निकट सहयोगी और संबंधी तो भीतरघात कर मुगलों से मिल जाते थे किंतु हिंदू उनके प्राणरक्षक बने रहे।

सिख समुदाय के सामने विकल्प स्पष्ट हैं जैसा प्रधानमंत्री और संघ प्रमुख के कथन बहुत सूक्ष्मता से इंगित करते हैं कि सिख मुसलमानों को अपना पारंपरिक शत्रु मान लें। वे अपनी धर्म परंपरा के एक आख्यान विशेष को-जिसके अनुसार गुरु तेगबहादुर को औरंगजेब के आदेश पर कश्मीरी पंडितों की धार्मिक स्वतंत्रता का समर्थन करने के लिए मृत्युदंड दिया गया था-अपने भावी आचरण के लिए मार्गदर्शक बना लें और उन सहस्रों घटनाओं की अनदेखी कर दें जब मुसलमान सिखों के सहायक और रक्षक बने थे। यदि सिख ऐसा करते हैं तो कट्टर हिंदुत्व समर्थक शक्तियां उन्हें हिंदुओं के रक्षक के रूप में महिमामण्डित करेंगी लेकिन सिख धर्म की स्वतंत्र पहचान उनसे छीन ली जाएगी।

किंतु यदि सिख हमारी समावेशी और उदार परम्परा का पालन करने की गलती करते हैं और गुरुग्राम की गुरुद्वारा परिषद की भांति गुरुद्वारा परिसर जुमे की नमाज के लिए उपलब्ध करा देते हैं या अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह की भांति कश्मीरी महिलाओं पर अशोभनीय टिप्पणी करने वाले कट्टर हिंदुत्व समर्थकों को चेतावनी देकर सिख समुदाय से कश्मीरी महिलाओं के सम्मान की रक्षा का आह्वान करते हैं तब कट्टर हिंदुत्व समर्थकों की दूसरी टोली सामने आती है। यह वही टोली है जिसने किसान आंदोलन को पाकिस्तान परस्त और खालिस्तान समर्थक कहने की शरारत की थी और जो सोशल मीडिया पर सिख मुस्लिम संबंधों के ऐतिहासिक उदाहरणों को इस तरह पेश करती है कि उनसे सिखों की राष्ट्र भक्ति पर संदेह हो।

गुरु गोबिंद सिंह (1666-1708) और औरंगजेब के मध्य आजीवन संघर्ष चला। गुरु गोबिंद सिंह ने फारसी भाषा में एक कविता औरंगजेब को भेजी, जिसमें उसकी कठोर निंदा भी थी और उसे कड़ी चेतावनी भी दी गई थी। औरंगजेब ने उन्हें आपसी बातचीत के जरिए कोई हल निकालने के लिए अपने पास बुलाया किंतु दोनों की मुलाकात हो पाती इससे पहले ही औरंगजेब की मृत्यु हो गई। अगले बादशाह बहादुर शाह प्रथम का रवैया गुरु गोबिंद सिंह के प्रति नरम और दोस्ताना था और आपसी रिश्तों में सुधार की उम्मीद जगी थी किंतु गुरु गोबिंद सिंह की मृत्यु हो गई और साथ ही गुरु परंपरा का अंत भी।

जसविंदर कौर बिंद्रा जैसे लेखकों के अनुसार बहादुर शाह ने गुरु गोबिंद सिंह के मित्र और फारसी भाषा के कवि नंदलाल के जरिए गुरु से मदद की याचना की थी। गुरु गोबिंद सिंह उसकी सहायता के लिए तैयार हो गए। बहादुर शाह ने उनसे यह वादा किया था कि सत्ता पर काबिज होते ही वह उनके साथ हुए जुल्मों का न्याय करेगा। गुरु गोबिंद सिंह ने भाई धर्म सिंह के अगुवाई में 200-250 योद्धा सिखों की एक टुकड़ी बहादुर शाह की सहायता के लिए भेजी। बहादुर शाह युद्ध में विजयी होकर सत्तासीन हुआ। इसके बाद उसके आमंत्रण पर गुरु गोविंद सिंह माता साहिब कौर के साथ आगरा भी गए एवं उन्होंने बहादुर शाह का आतिथ्य स्वीकार किया।

यह विवेचन इसलिए किया गया है कि आम पाठक यह समझ सकें कि संदर्भों से कटा हुआ सरलीकृत इतिहास कितना भ्रामक और उत्तेजक हो सकता है, विशेषकर तब जब उसमें धार्मिक भावनाओं का तड़का लगा हुआ हो। जिस इतिहास को लेकर हम मरने मारने पर उतारू हैं वह या तो शासकों( मुगल, राजपूत, सिख आदि आदि) के दरबारी विद्वानों द्वारा लिखे गए चाटुकारिता प्रधान और अतिरंजनापूर्ण वृत्तांतों के रूप में है या धर्म परंपरा में वर्णित कथाओं एवं आख्यानों के रूप में है, जिनमें आस्था और भावना को प्रधानता दी गई है और जिनमें कल्पना का अपरिहार्य मिश्रण है।


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