
मैंने अज्ञेय को नहीं देखा, रघुवीर सहाय और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना को भी नहीं देखा, कृष्णा सोबती और नरेश सक्सेना को भी मैं नहीं देख पाया, पत्रकारिता में रहने के बावजूद राजेन्द्र माथुर और राजकुमार केसवानी से भी कभी नहीं मिला, श्रीकांत वर्मा, नेत्रसिंह रावत और चंद्रकांत देवताले से भी कभी मुलाकात नहीं हुई। मन में हमेशा एक टीस-सी रही, इन सबसे न मिल पाने की। लेकिन वरिष्ठ कवि, कहानीकार, व्यंग्यकार विष्णु नागर को मैंने देखा है। उनके संस्मरणों की दूसरी पुस्तक-‘राह इनकी एक थी’ (संभावना प्रकाशन) के बहाने अब इन सबको देख पाया हूं। केवल इनको ही नहीं, बल्कि उस समय को भी देख पाया, जिसे विष्णु नागर ने संस्मरणों के बहाने साकार किया है।