Saturday, March 7, 2026
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बांग्लादेश में सैनिक शासन संभव

SAMVAD

DR NK SOMANIसरकारी नौकरियों में स्वतंत्रा सेनानियों के परिवारों को आरक्षण दिए जाने का बांग्लादेश उच्च न्यायालय का फैसला अंतत: प्रधामंत्री शेख हसीना व उनकी सरकार के लिए संकट का सबब बन गया है। आरक्षण के विरोध में सड़क पर उतरे छात्रों का गुस्सा इस कदर बढ़ गया है कि शेख हसीना को पीएम पद से इस्तीफा देकर देश छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। प्रदर्शनकारी छात्रों ने पीएम आवास पर कब्जा कर लिया है। हसीना की पार्टी अवामी लीग के मुख्यालय में आग लगा दी है। इतना ही नहीं बांग्लादेश के संस्थापक बंगबंधु शेख मुजीबुरहमान की मूर्तियों को भी नुससान पहुंचाया गया। हसीना के इस्तीफे के बाद बांग्लादेश की सत्ता सेना के पास आ गई है। हालांकि, सेना प्रमुख जनरल वकार-उज-जमान ने जल्द से जल्द अंतरिम सरकार के निर्माण की बात कही है। उन्होंने प्रदर्शनकारियों से भी शांति की अपील करते हुए उन्हें विश्वास दिलाया कि हिंसा में मारे गए लोगों के साथ न्याय होगा।

बांग्लादेश में सारा उपद्रव जून के मध्य में उस वक्त शुरू हुआ जब बांग्लादेश उच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट का एक अंग) ने 2018 में सरकार द्वारा लिए गए उस फैसले को पलट दिया था जिसमें सरकारी नौकरियों में स्वतंत्रता सेनानियों के वशंजों के लिए दिए जाने वाले 30 प्रतिशत आरक्षण को समाप्त किया गया था। कोर्ट के आदेश के बाद देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। हालांकि, हसीना सरकार की अपील के बाद सर्वोच्च अदालत ने उच्च न्यायलय के आदेश को निलंबित कर दिया। बांग्लादेश की आजादी के एक साल बाद 1972 में बांग्लादेश की सरकार ने स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों के लिए सरकारी नौकरियों में 30 फीसदी आरक्षण देने का प्रावधान किया था। 2018 में जब इसे खत्म किया गया उस वक्त सरकारी नौकरियों में अलग-अलग वर्गो के लिए 56 प्रतिशत आरक्षण था।

हालांकि, हिंसक आंदोलन के बीच 21 जुलाई को बांग्लादेश के शीर्ष न्यायालय ने सरकारी नौकरियों में आरक्षण का कोटा काफी हद खत्म कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार अब केवल पांच फीसदी नौकरियां स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों के लिए व दो फीसदी नौकरियां अल्पसंख्यकों व दिव्यागों के लिए आरक्षित होंगी। शेष पदों पर भर्ती योग्यता के आधार पर होगी। न्यायालय के निर्णय के बाद 93 फीसदी भर्तियां अनारक्षित कोटे से होना तय था।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद एक बारगी लग रहा था कि विरोध प्रदर्शन खत्म हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। प्रदर्शनकारी व छात्र संगठन प्रदर्शनों के दौरान जान गंवाने वालों को न्याय दिए जाने की मांग पर अड़ गए। वे इस बात से भी क्षुब्ध थे कि प्रधानमंत्री उनकी मांगों पर विचार करने के बजाए उन्हें रजाकारों (गद्दारों ) का वंशज तथा आतंकवादी कह रही है। हसीना के बयान पर छात्र भड़क गए और विरोध तेज कर दिया। प्रदर्शनकारियों और सरकार के बीच झड़प में 14 पुलिस अधिकारियों सहित 94 लोगों की मौत हो गई। जून में प्रदर्शन शुरू होने के बाद एक ही दिन में मरने वालों की यह अब तक की सबसे बड़ी संख्या थी।

ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि नौरिकयों में आरक्षण के मुद्दे को लेकर शुरू हुआ आंदोलन देखते ही देखते हसीना के पद छोड़ने की मांग पर कैसे केंद्रित हो गया । कहीं ऐसा तो नहीं कि छात्रों के विरोध प्रदर्शन की आड़ में राष्ट्र विरोधी तत्वों को खेलने का अवसर प्राप्त हो गया हो। आंदोलन की आड़ में जिस तरह बंगबंधु मुजीर्बुरहमान की मुर्तियों को तोड़ा गया है, उससे देखते हुए साजिश के तार पाकिस्तान से जुड़ते हुए भी दिखाई दे रहे हंै। पूरे घटनाक्रम में भारत सहित अंतरराष्ट्रीय समुदाय को जो सवाल सबसे अधिक परेशान कर रहा है वह यह है कि क्या बांग्लादेश की सत्ता सेना के हाथों मे आ जाएगी। हालांकि सेना ने कहा कि एक दो दिन में अंतरिम सरकार चुन ली जाएगी। लेकिन इतिहास इस बात का भी गवाह रहा है कि सेना को सत्ता का स्वाद एक बार लग जाता है तो फिर उससे छुटकारा पाना मुश्किल होता है।

देश की प्रमख विपक्षी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट (बीएनपी) की नेता खालिदा जिया (80) स्वास्थ्य के चलते लंबे समय से राष्ट्रीय राजनीति से गायब हैं। उनके पार्टी के एक नेता और उनके प्रमुख सहयोगी यहां तक कह चुके हैं कि कभी भी उनका इंतकाल हो सकता है। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि अतंरिम सरकार का नेतृत्व कौन करेगा। हालांकि खालिदा के बेटे और बीएनपी के चेयरमैन तारिक रहमान का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए चल रहा है। लेकिन रहमान के नाम पर दूसरी पार्टियां सहमत होंगी, इसकी संभावना भी कम ही है। एक अहम सवाल यह भी है कि साझा सरकार में अवामी लीग की क्या भूमिका होगी। अगर उसे सरकार में शामिल नहीं किया जाता है तो क्या देश के भीतर स्थिरता बहाल हो पाएगी। थोड़ी देर के लिए यह मान भी लिया जाए कि अवामी लीग को साझा सरकार में शामिल किया जा सकता है तो क्या देश की नाराज अवाम को यह स्वीकार होगा। इसके अलावा नए चुनावों की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है।

अंगुलियां अमेरिका की तरफ भी उठती हुर्इं दिख रही हैं। जिस तरह से शेख हसीना के शासनकाल में रूस व चीन ने बांग्लादेश में अपना प्रभाव बढ़ाया है, उससे अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के पेशानी पर बल पड़ने लगे हैं। सिंतबर में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की ढाका यात्रा के बाद से बांग्लादेश के प्रति अमेरिका और अधिक संजीदा हो गया है। 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता के बाद यह पहला अवसर था, जब रूस के किसी विदेश मंत्री का ढाका दौरा हुआ है। इतना ही नहीं अमेरिका-बांग्लादेश तनाव के बीच थोड़े समय पहले रूसी नौसेना के प्रशांत बेड़े का एक युद्धपोत बंगाल की खाड़ी में बांग्लादेश के चटगांव बंदरगाह पर पहुंचा। इन सब घटनाओं से अमेरिका की चिंता बढ़नी ही थी। चीन के साथ भी बांग्लादेश के आर्थिक रिश्ते मजबूत हुए हैं। बांग्लादेश चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का भी हिस्सा है। शेख हसीना अमेरिका पर सत्ता परिर्वतन की कोशिश करने का आरोप भी लगा चुकी हैं।

भारत के बांग्लादेश के साथ हमेशा से अच्छे संबंध रहे हंै। 1996 से 2001 तक और फिर 2009 से लगातार भारत को बांग्लादेश की सुरक्षा एजेंसियों से सहयोग मिला है। भारत ने अपनी जी-20 की अध्यक्षता के दौरान बांग्लादेश को सदस्य न होने के बावजूद उसे अतिथि देश के रूप में आमंत्रित किया। हसीना सरकार ने भी अपने देश में भारत विरोधी गतिविधियों पर लगाम लगाने के प्रयास किए हैं। यही वजह है कि भारत हसीना सरकार के साथ है। बीएनपी पाक समर्थित पार्टी, है जिसको अमेरिका का समर्थन हासिल है। चुनाव के दौरान भी कुछ दल ओर समूह भारत के विरोध में बोलते रहे हैं। अगर ऐसे समूह सत्ता में आते हैं तो दोनों देशों के संबंधों के समक्ष एक चुनौती पैदा हो सकती है। यही वजह है कि बांग्लादेश के घटनाक्रम पर भारत नजर रखे हुए है।

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