
नरेंद्र मोदी को मुस्लिम आबादी के समर्थन की जरूरत क्यों पड़ी? 2014 और 2019 में मोदी तो मुस्लिम आबादी के समर्थन के बिना चुनाव जीत चुके हैं। मोदी की चुनावी रणनीति में ऐसी झलक मिलती है। इसके तत्व और झलक भाजपा की प्रत्याशियों की आई पहली सूची में छिपे हुए हैं। भाजपा ने वैसे नेताओं से दूरी बनायी है और उन्हें लोकसभा प्रत्याशी बनाने से परहेज किया है, जिनकी छबि कट्टरपंथियों की बनी है। उदाहरण के लिए दो नाम प्रमुखता से लिए जा सकते हैं। एक नाम प्रज्ञा ठाकुर का है जो आतंक की सूची में थी और दूसरा नाम प्रवेश वर्मा का है। प्रवेश वर्मा मुस्लिमों के खिलाफ कभी-कभार बोलकर सनसनी जरूर पैदा करते थे। नरेंद्र मोदी की नसीहत थी कि सनसनी फैलाने और जिम्मेदारी से हटकर बयानबाजी से परहेज करें। प्रज्ञा ठाकुर इस नसीहत का खुलम-खुला अवहेलना करती थीं और न केवल असहज बल्कि अतिरंजित बयानबाजी भी करती थीं। साक्षी महाराज और गिरिराज सिंह जैसे फायरब्रॉन्ड नेता भी न चाहते हुए मोदी की नसीहत को स्वीकार करने के लिए तैयार रहने में ही अपनी भलाई समझी थी। साक्षी महाराज और गिरिराज सिंह की बयानबाजी तो होती थी, पर एक दायरे में होती थी। इसका सुखद परिणाम भी इन्हें मिला। भाजपा ने गिरिराज सिंह और साक्षी महाराज का टिकट नहीं काटा। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि अन्य कदम ऐसे हैं जो मुस्लिम वर्ग को आकर्षित करने वाले हैं। लोकसभा चुनावों में केरल से मुस्लिम वर्ग को प्रतिनिधित्व दिया है। केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान मोदी के लिए मुस्लिम वर्ग में छबि सुधारने की हस्ती हैं।
प्रश्न यह है कि नरेंद्र मोदी की इस मुस्लिम नीति का प्रतिफल क्या होगा? कहीं घाटे का सौदा तो नहीं बनेगी यह मुस्लिम नीति। अब तक तो मुस्लिम आबादी भाजपा को अपना अतिरंजित दुश्मन मानती है। नरेंद्र मोदी को चार सौ सीटें जीतना है, इतना बड़ा लक्ष्य है, पहाड़ जैसा लक्ष्य है। फिर अतिरिक्ति जनसमर्थन की जरूरत तो होगी। इसके लिए मुस्लिम वर्ग का भी समर्थन चाहिए।
सभ्य और लोकतांत्रिक देश की सरकार के सामने बहुत सारी अहर्ताएं भी होती हैं। संविधान, वैश्विक नियामकों की संहिताएं और वैश्विक समझौतों की संहिताएं भी सभ्य और लोकतांत्रिक देश की सरकार के लिए दृष्टि सरीखी होती हैं। इसलिए असमानता और भेदभाव की छूट नहीं मिलती हैं। मुस्लिम वर्ग, मुस्लिम नेता, क्षेत्रीय दल, जातिवादी पार्टियां और तथाकथित सेक्युलर पार्टियां चाहे जितना शोर मचा लें और भाजपा को अति मुस्लिम विरोधी घोषित कर दें, फिर भी नरेंद्र मोदी की कुछ नहीं बल्कि कई नीतियां ऐसी हैं, जो मुस्लिमो से भेदभाव नहीं करती हैं। मुस्लिमों को समान रूप से प्रतिनिधित्व करती हैं और मुस्लिमों को समान अवसर देती हैं। ऐसी एक नीति नहीं है, बल्कि अनेक हैं। नरेंद्र मोदी सरकार का घोषित नारा क्या है? नरेंद्र मोदी का घोषित नारा सबका साथ और सबका विकास है। क्या सबका साथ और सबके विकास के दायरे से मुस्लिम आबादी अलग है? अब मोदी की विकास नीतियां देख लीजिए।
आवास योजना, मु्फ्त राशन योजना, आयुष्मान भारत की मु्फ्त स्वास्थ्य योजना, स्वच्छ जल योजना, उज्जवला योजना आदि में कोई भेदभाव होता है क्या? क्या कभी किसी को मुस्लिम होने के कारण आवास योजना, राशन योजना, आयुष्मान भारत योजना से वंचित किया गया है? सच तो यही है कि ये सभी योजनाएं अन्य आबादी के साथ ही साथ मुस्लिम आबादी के लिए भी भाग्यशाली और जीवनरक्षक साबित हो रही हैं। मुस्लिम आबादी इन सभी योजनाओं का उपभोग भी आसानी से कर रही है। इन सभी योजनाओं के संबंध में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का एक बयान बहुत ही प्रचारित हुआ था। उनका बयान था कि सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने में मुस्लिम समुदाय काफी आगे रही है और जनसंख्या के अनुपात में काफी ज्यादा लाभ मुस्लिम आबादी ने उठाया है। अगर कोई चाकचौबंद सर्वे हो जाए तो फिर इन सभी योजनाओं में मुस्लिम वर्ग की हिस्सेदारी का सही पता चल जाएगा और यह भी साफ हो जाएगा कि मजहब के आधार पर इन सभी योजनाओं में कोई भेदभाव नहीं है। मुस्लिम आबादी की सबसे ज्यादा चिंता सीएए को लेकर रही है।
यह कहें कि नरेंद्र्र मोदी सरकार के खिलाफ सीएए को लेकर मुस्लिम आबादी को उकसाया गया, विद्रोह की स्थिति उत्पन्न करायी गयी और गृह युद्ध की विकट स्थिति भी खड़ी की गयी। दंगे भी हुए। दिल्ली सहित कई शहरों ही नहीं बल्कि कस्बों में भी दंगे हुए। विदेशों में भारत की छवि हुई। जबकि सीएए नागरिकता देने का कानून हैं, नागरिकता छीनने का कानून नहीं है। वैसे लोगों को नागरिकता देने का प्रावधान है जो कट्टरपंथी मुस्लिम देशों से पीड़ित होकर भारत आए हैं और जिन्हें उनके देश में कत्लेआम किया गया, समान अवसर से वंचित किया गया था। दंगे, विद्रोह और देश को अस्थिर करने की साजिश और प्रदर्शन के बाद भी नरेंद्र मोदी की सरकार ने मुस्लिम उत्पीड़िन की नीति नहीं अपनायी बल्कि उदार नीति पर चली, संवाद से मुस्लिम आबादी की आशंका को दूर करने की कोशिश की गयी। अब मुस्लिम मौलाना भी कहने लगे हैं कि सीएए से मुसलमानों को डरने की आवश्यकता नहीं है।
खाडी मुस्लिम देशों में भारतीय मुस्लिम बड़ी संख्या में रोजगार और कामगार के क्षेत्र में सक्रिय हैं। ये भारत के लिए विदेशी मुद्रा और रोजगार के क्षेत्र में अहम भूमिका निभाते हैं। नरेंद्र मोदी की सरकार ने मुस्लिम देशों में काम करने वाले भारतीय मुसलमानों के लिए कभी भी आंखें नहीं चुरायी हैं। जब भी ये संकट में पड़े हैं, तब भारत सरकार ने उन्हें संकट से बाहर निकालने का प्रयास किया है। परदेश में संकटग्रस्त स्थिति में रहने वाले भारतीयों को निकालने में नरेंद्र मोदी की सरकार ने अपनी पूरी ताकत झोकी है। आज सऊदी अरब, कतर और संयुक्त राज्य अमीरात आदि देशों में रहने वाले मुस्लिम सहित सभी भारतीय नागरिक नरेंद्र मोदी सरकार पर गर्व करते हैं। उनकी वैश्विक छवि से उन्हें सम्मान मिलता है। मोदी ने खाड़ी के मुस्लिम देशों से मित्रता करने और व्यापार की प्रागढता बढ़ाने की हर संभव कोशिश की है।
मुस्लिम वर्ग और भाजपा के कट्टरपंथी तबके के लिए भी मोदी का संदेश है। भाजपा अपने नेताओं और समर्थको को लक्ष्मण रेखा से बाहर जाने की स्वीकृति नहीं दे रही है। वहीं मुस्लिम आबादी से भी उनकी इच्छा है कि कट्टरपंथ से मुक्त होकर विकास और उन्नति के रास्ते पर चलें। बिना मुस्लिम समर्थन से ही नरेंद्र मोदी 20ृ14 और 2019 में अपनी सरकार बना चुके हैं। इसलिए मुस्लिम वर्ग को भी पूर्वाग्रह और अहंकार छोड़कर सोचना चाहिए। मुस्लिम वर्ग एक सूत्र में बंध कर भाजपा का विरोध करता है तो फिर इसके खिलाफ हिंदुओं में जागरूकता आती है और हिंदू भी अपनी गोलबंदी दिखाते हैं। यह अच्छी बात है कि नरेंद्र मोदी ने मुस्लिम आबादी को भी अपने साथ लेकर चलने की नीति अपनायी है।


