
पीएम मोदी के 15 अगस्त 2014 के भाषण से लेकर मंगलवार के अपने 10वें भाषण तक के सफर में इस बार एक बड़ा अंतर देखने को मिला है, जिसके बारे में कल से ही आम बहस में चर्चा चल रही है। अपने भाषण में पीएम मोदी उस आत्मविश्वास के साथ नजर नहीं आए, जैसा आमतौर पर देश देखने का आदी था। उनकी हिंदी अच्छी नहीं रही है, लेकिन अपने वक्तृत्व कला और अंग्रेजी शब्दों से नए नारों और सिनर्जी से वे अपने प्रशंसकों को अभी तक लुभाते रहे हैं, लेकिन इस बार 90 मिनट से भी अधिक समय तक भाषण के दौरान कई बार उन्हें हड़बड़ी में अटपटे ढंग से वाक्य पूरा करते देखा जा सकता है। ऐसा क्यों हुआ? क्या यह विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के एकजुट होने की वजह से है? क्या यह कांग्रेस पार्टी के राहुल गांधी के नए अवतार की वजह से है, जिन्होंने पिछले एक वर्ष से लगातार अपनी छवि को भारत के सामान्य जन से जोड़ने की कोशिश की है?