- पूरे दिन गलियों से लेकर सड़कों पर फैसले पर चर्चा होती रही
- कुछ ने कहा मजबूत पैरोकारी न होने से फैसला खिलाफ आया
- फैसले को प्रयागराज हाईकोर्ट में दी जाएगी चुनौती
- ऐलान के दौरान मलियाना में हुई थी घर-घर तलाशी
- दंगे के दौरान लोग तमाम तरह के लगा रहे थे कयास
- प्रशासन ने मलियाना में भी नहीं लगाया था कर्फ्यू
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: 23 मई 1987 को मलियाना में हुए दंगे में मारे गए 72 मुस्लिमों और 100 के करीब घायलों के मामले में शनिवार को एडीजे छह की अदालत ने 39 आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया था। इसको लेकर मलियाना में रहने वाले मुसलमानों के चेहरे पर निराशा साफ दिख रही थी। पीड़ितों की तरफ से मुकदमा लड़ने वाले एडवोकेट अलाउद्दीन सिद्दकी का कहना है सारे सबूत देने के बाद भी फैसला अदालत ने आरोपियों को बरी कर दिया। अगर वादी पक्ष चाहेगा तो इस फैसले को प्रयागराज हाईकोर्ट में चुनौती दी जाएगी। मुस्लिम पक्ष का खुलकर आरोप है कि कुछ लोगों ने मजबूत पैरोकारी नहीं की नहीं तो आरोपियों को सजा जरूर मिलती।
23 मई 1987 को रमजान की 25वीं तारीख थी। शाम सात बजे प्रशासन की तरफ से ऐलान किया गया कि मलियाना में घर-घर तलाशी होगी और गिरफ्तारियां होंगी। मलियाना के लोगों को इस संदेश का अर्थ समझ में नहीं आया और लोग तमाम तरह के कयास लगाने लगे। दरअसल, 18 और 19 मई की रात से पूरे मेरठ में भयानक दंगा भड़का हुआ था और तमाम जगहों पर कर्फ्यू लगा हुआ था, लेकिन प्रशासन ने मलियाना में कर्फ्यू भी नहीं लगाया गया था। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि 23 मई की दोपहर को पड़ोस के संजय नगर में लोगों ने देशी शराब के ठेके को लूट लिया था।
इसके बाद उन्मादी भीड़ मलियाना की मुस्लिम बस्ती में घुसी और घरों में तोड़फोड़ करके लोगों को निकाल कर मारने लगी। आरोप था कि यह सब उन्मादी भीड़ ने पुलिस और पीएसी के सामने किया। एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि होली चौक पर सत्तार के परिवार के 11 सदस्यों के शव उसके घर के बाहर स्थित एक कुएं से बरामद किए गए। कुल 73 लोग मारे गए थे।

मारे गए लोगों में केवल 36 लोगों की शिनाख्त हो सकी। बाकी लोगों को प्रशासन अभी भी लापता मानता है। हालांकि उनके वारिसान को यह कहकर 20-20 हजार का मुआवजा दिया गया था कि यदि ये लोग लौटकर आ गए तो मुआवजा राशि वापस ले ली जाएगी। मौहम्मद सलीम ने बताया कि उनकी आंखों के सामने वाकया हुआ था। एक मुखबिर ने 1987 में आकर कहा था कि मलियाना में चेकिंग की जाएगी। पहले ठेका लूटा गया फिर पीएसी के जवानों ने शराब के नशे में हत्याकांड को अंजाम दिया।
रविवार को रही खास चहल-पहल
मलियाना जो आज दिख रहा है वो 36 साल पहले एक अविकसित गांव नहीं था। सभी मिलजुलकर रहा करते थे। गांव में कभी हिंदू और मुसलमानों के बीच संघर्ष नहीं होता था। 23 मार्च 1987 की घटना के बाद वक्त ने मरहम का काम किया। अब 36 साल बाद पीड़ितों के पक्ष में फैसला न आने पर मुस्लिम इलाकों में मायूसी छा गई। दोपहर को मस्जिद में नमाज पढ़ने के बाद लोग शेखान चौक पर एकत्र हो गए और मीडिया के भारे जमावड़े को देखकर चर्चाओं में व्यस्त हो गए।
गलियों में सन्नाटा बिखरा हुआ था। कुछ लोग दरवाजे के बाहर खड़े होकर समाचार पत्र पढ़ते दिखे। हिंदू बाहुल्य इलाकों में जीवन सामान्य था और लोग इस बात से खुश थे कि हत्या के आरोपों से तो मुक्ति मिली। नई पीढ़ी जिसे दंगे के बारे में पता नहीं है वो पीढ़ी के लोग भी साधारण तरीके से बोल रहे थे कि दंगे के आरोपियों को किस आधार पर बरी किया गया। मस्जिद के आसपास और एक हकीम की दुकान के पास मीडिया और अन्य लोगों की चहल-पहल होती रही। भीड़ को देखकर युवक अपनी बाइक रोककर खड़े हो जाते और 36 साल पहले के इतिहास को सुनकर उनके रोंगटे भी खड़े हो रहे थे।

