Sunday, March 29, 2026
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अमृत वर्षा

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एक दिन एक संत अपने प्रवचन में कह रहे थे, ‘अतीत में तुमसे जो पाप हो गए हैं, उनका प्रायश्चित करो और भविष्य में पाप न करने का संकल्प लो।’ प्रवचन समाप्त होने के बाद सभी लोग चले गए, लेकिन एक व्यक्ति वहीं रहा। वह थोड़ी देर तक तक कुछ सोचता रहा और फिर थोड़ा सकुचाते हुए संत के पास पहुंचा।

उसने संत से पूछा, ‘महाराज, मन में एक जिज्ञासा है।’ संत ने मुस्कुराकर कहा, संकोच क्यों करते हो, जो दिल में है पूछो।’ उस व्यक्ति ने कहा, ‘प्रायश्चित करने से पापों से छुटकारा कैसे पाया जा सकता है?’ संत ने उसे दूसरे दिन आने को कहा। वह व्यक्ति सही समय पर संत के पास पहुंच गया।

संत उसे एक नदी के किनारे ले गए। नदी तट पर एक गड्ढे में भरा था। उसमें से बदबू आ रही थी। इसकी वजह यह थी कि पानी सड़ रहा था। पानी में कीड़े भी चल रहे थे। कुल मिलाकर पानी अत्यंत गंदा था, जिसके पास खड़ा होना भी दूभर हो रहा था। संत उस व्यक्ति को सड़ा पानी दिखाकर बोले, ‘भइया, यह पानी देख रहे हो? बताओ यह क्यों सड़ा?’ व्यक्ति ने पानी को ध्यान से देखा और कहा, ‘स्वामी जी, प्रवाह रुकने के कारण पानी एक जगह ठहर गया है और इस कारण सड़ रहा है।’

इस पर संत ने कहा, ‘ऐसे ही सड़े हुए पानी की तरह पाप भी इकट्ठे हो जाते हैं और वे कष्ट पहुंचाते रहते हैं। जिस तरह वर्षा का पानी इस सड़े पानी को बहाकर हटा देता है और नदी को पवित्र बना देता है, उसी प्रकार प्रायश्चित रूपी अमृत वर्षा इन पापों को नष्ट कर मन को पवित्र बना देती है। इससे मन शुभ और सद्कार्यों के लिए तैयार हो जाता है। जब एक बार मन में परिवर्तन होता है, तो व्यक्ति आगे कभी गलतियां नहीं दोहराता। इसलिए प्रायश्चित से व्यक्ति का अतीत और भविष्य दोनों ही पवित्र होता है।’


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