Saturday, March 7, 2026
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रोजगार पर गंभीरता की जरूरत

Samvad 51

AASHISH e1618057478329आजादी से लेकर वर्तमान समय तक जिन बीमारियों और समस्याओं ने हमारा पीछा नहीं छोड़ा या ये कहें कि जिन समस्याओं का हम ठोस हल खोज नहीं पाये, उस सूची में बेरोजगारी भी शामिल है। केंद्र में लगभग छह दशक कांग्रेस की सरकार ने शासन किया। बाकी समय में अन्य दलों और पिछले दस सालों से भाजपानीत एनडीए की सरकार सत्ता में है। लेकिन बेरोजगारी का मुद्दा हर सरकार के सामने बड़ी चुनौती बनकर खड़ा रहता है। सरकारें आश्वसान देती हैं, अपने—अपने हिसाब से रोजगार का प्रबंध करती है। लेकिन जितनी नौकरियां दी जाती हैं, उससे दस गुणा ज्यादा नौकरी मांगने वाले लाइन में खड़े दिखाई देते हैं। जमीनी हकीकत तो यह है कि युवाओं को रोजगार देना अब सरकारों के लिए चुनौती भरा काम होता जा रहा है।

आज देश में बेरोजगारी की मार से युवा किस कदर जूझ रहा है इसका अनुमान बीते दिनों मुंबई एयरपोर्ट पर उमड़ी बेरोजगारों की फौज से ही लगाया जा सकता है। एयरपोर्ट पर महज बीस हजार रुपए मासिक वेतन वाली नौकरी के लिए पच्चीस हजार युवा पहुंच गए जबकि महज 2200 पदों पर भर्ती होनी थी। बीती फरवरी में यूपी पुलिस में कांस्टेबल के 60 हजार 244 पदों पर सीधी भर्ती के लिए 50 लाख से ज्यादा उम्मीदवारों ने आवेदन किया। देखा जाए तो बेरोजगारी की भयावहता की ऐसी तस्वीर अकेले मुम्बई या यूपी में नहीं है। देश भर में कहीं भी सरकारी महकमों के लिए भर्ती निकाली जाती है तो आवेदन करने वालों की भीड़ ‘एक अनार सौ बीमार’ की तरह ही उमड़ पड़ती है।

बेरोजगारी की समस्या इतनी गंभीर है कि महज दसवीं पास योग्यता के लिए जो भर्ती निकाली जाती है उसमें पोस्ट ग्रेजुएट और इंजीनियरिंग व प्रबंधन का अध्ययन करने वाले युवा भी आवेदकों में शामिल होते हैं। इनमें भी कुछ किस्मत वाले ही होते हैं जो नौकरी पाने में कामयाब होते हैं। हालांकि एक पहलू यह भी है कि सरकारी नौकरियों में सीमित अवसर होने लगे हैं लेकिन उम्मीदवारों की सरकारी नौकरी पाने की चाहत बढ़ने लगी है। खासकर उत्तर भारत में सरकारी नौकरी को लेकर युवाओं में ज्यादा क्रेज है।

सरकारी नौकरी के लिए निर्धारित आयु सीमा के पार होने के भी खतरे कम नहीं। निराश-हताश युवा निजी क्षेत्र में काम तलाशता है, पर वहां भी उसे योग्यता के अनुरूप वेतन मिल जाए इसकी कोई गारंटी नहीं। बेरोजगारों के लिए सरकारें बेरोजगारी भत्ता जैसी योजनाएं भी शुरू करती हैं। हाल ही महाराष्ट्र सरकार ने भी बेरोजगारों को प्रति माह छह से दस हजार रुपए स्टाइपंड देने का ऐलान किया है, पर यह कोई स्थायी समाधान नहीं कहा जा सकता। हालत यह है कि बजट घोषणाओं में वाहवाही लूटने के लिए सरकारें युवाओं को रोजगार देने की जो घोषणाएं करती हैं उन्हें पूरा ही नहीं कर पातीं। बाद में सरकारें रोजगार और रोजगार के अवसरों का भेद होने की बात कहते हुए सफाई देने से भी नहीं चूकतीं।

भारत की कुल आबादी करीब 143 करोड़ है, लेकिन 2024 तक कुल कार्यबल 64.33 करोड़ है। यह आंकड़ा 2023 में 59.67 करोड़ था। एक साल में 4.67 करोड़ कार्यबल की बढ़ोतरी हुई है। इतने हाथों में नौकरी, रोजगार या दिहाड़ी उपलब्ध है। सरकारी प्रवक्ताओं की ओर से भी यह दावा किया जाता रहा है कि 2017-मार्च 2024 के दौरान 6.2 करोड़ नौकरीपेशा ‘कर्मचारी भविष्य निधि संगठन’ (ईपीएफओ) से जुड़े हैं। जाहिर है कि इतने लोगों को सरकारी, अर्द्धसरकारी और निजी क्षेत्र में नौकरियां मिली होंगी! ईपीएफओ की निरंतरता पर भी सवाल किए जाते रहे हैं। 2021 से अब तक करीब 7.8 करोड़ रोजगार का सृजन किया जा चुका है। रोजगार के आंकड़े तैयार करने में भी भ्रष्टाचार किया जाता है। मसलन-कृषि में करीब 6 करोड़ रोजगार ऐसे हैं, जहां महिला अपने पति का हाथ बंटाने खेत पर जाती है। उसे ‘स्वतंत्र रोजगार’ नहीं मान सकते, क्योंकि उसका कुछ भी मानदेय या वेतन अथवा दिहाड़ी तय नहीं है।

बेशक भारत में निजी क्षेत्र का बहुत विस्तार हुआ है। विदेशी कंपनियां आई हैं और उन्होंने उत्पादन के प्लांट स्थापित किए हैं। जाहिर है कि उनमें भारतीय ही प्राथमिकता के स्तर पर काम कर रहे हैं। देश में करीब 3 लाख स्टार्टअप कार्यरत हैं। उनमें भी रोजगार के अवसर हैं। प्रधानमंत्री ने इस पद पर आने से पहले देश की जनता से वायदा किया था कि यदि उनकी सरकार आई, तो 2 करोड़ रोजगार हर साल पैदा करेंगे। उस वायदे में ह्यरोजगारह्ण के मायने नौकरी भी होंगे। बेशक इतने व्यापक देश में प्रत्येक पात्र नागरिक को सरकारी नौकरी मुहैया नहीं कराई जा सकती, लेकिन निजी क्षेत्र में नौकरी भी उतनी ही मूल्यवान और महत्वपूर्ण है।

लोकसभा चुनाव में प्रमुख मुद्दा बने बेरोजगारी की समस्या से निपटने पर मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल के पहले बजट में पूरा जोर दिया गया है। इसकी अहमियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट भाषण में रोजगार शब्द का इस्तेमाल 57 बार किया। इस बार बजट में युवाओं के लिए रोजगार और स्किल डेवलपमेंट के लिए 2 लाख करोड़ रुपये आवंटित किया गया है। प्रधानमंत्री रोजगार और कौशल प्रशिक्षण पैकेज के तहत निजी कंपनियों के लिए तीन तरह के प्रोत्साहन की घोषणा की गई है। पहले प्रोत्साहन पैकेज के तहत निजी कंपनी में पहली बार नौकरी पाने वाले युवा की पहले महीने के वेतन का भुगतान सरकार की ओर से किया जाएगा। इसके लिए शर्त यह है कि उस युवा का वेतन प्रति महीना एक लाख रुपये से कम होना चाहिए।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट पेश करते हुए रोजगार के मौकों के लिए 5 स्कीम का ऐलान किया है। रोजगार के लिए सरकार ने 2 लाख करोड़ रुपए के पैकेज का भी ऐलान किया है। बजट घोषणा के अनुसार, 20 लाख युवाओं को रोजगार के लिए ट्रेनिंग दी जाएगी। इसके अलावा रोजगार देने पर सरकार इंसेंटिव देगी और रोजगार देने पर सरकार इंसेंटिव की 3 स्कीम लाई जाएंगी। पीएम योजना के तहत 3 चरणों में इंसेंटिव दी जाएगी, इंडस्ट्री के साथ मिलकर वर्किंग हॉस्टल बनाएंगे। बहरहाल, देश भर में बेकाबू होती बेरोजगारी की समस्या पर नियंत्रण पाना सरकारों के लिए गंभीर चुनौती है। केन्द्र व राज्य की सरकारों को युवाओं को लुभाने के इरादे से की जाने वाली रोजगार देने की घोषणाओं को अमलीजामा तो पहनाना ही होगा, यह भी ध्यान रखना होगा कि पात्र लोगों को समय पर अवसर मिलें। साथ ही युवाओं के कौशल विकास पर भी ध्यान दिया जाए।

इस बार के बजट में सरकार की सबसे प्रमुख प्राथमिकता रोजगार सृजन ही माना जा रहा। केंद्र सरकार को उम्मीद है कि निजी क्षेत्र के रोजगार और नौकरी में इजाफे को लेकर सकारात्मक कदम बजट में उठाए गए हैं। इससे निजी कंपनियां ज्यादा से ज्यादा लोगों को नौकरियां देने के लिए प्रोत्साहित होंगी। हालांकि, यह देखना दिलचस्प होगा कि रोजगार सृजन के लिए बजट के इस दृष्टिकोण का परिणाम क्या निकलता है।

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