देखिए, देखिए ये तो सरासर नाइंसाफी है। मोदी जी को एक बार फिर नीरो बताया जा रहा है। और वह भी सिर्फ इसलिए कि अब जब मोदी जी आखिरकार मणिपुर जा रहे हैं, तो मणिपुर वालों से नाचकर उनका स्वागत करने के लिए कहा जा रहा है। और मणिपुर वाले इतने नाशुक्रे हैं कि एक सौ चालीस करोड़ भारतीयों के प्रधानमंत्री के आने की खुशी में नाचकर दिखाने तक में नखरे कर रहे हैं। कह रहे हैं कि मोदी जी का स्वागत तो हम करेंगे, पर अभी तो हमारी आंखों के आंसू भी नहीं सूखे हैं। हम बरसती आंखों के साथ नाचकर कैसे दिखाएं? अभी तो हमारे घाव भी नहीं भरे हैं, दर्द से टीसते घावों के साथ नाचकर कैसे दिखाएं? अभी तो हम बिछुड़े हुओं का शोक ही मना रहे हैं, शोक के बीच में खुशी का नाच-नाचकर कैसे दिखाएं। बस इत्ती सी बात का विरोधी राई का पहाड़ बनाने पर तुले हैं। कह रहे हैं कि ये तो एकदम नीरो वाले लक्षण हैं। मणिपुर अब भी जल रहा है और इन्हें स्वागत में नाच चाहिए! सवा दो साल इंतजार कराने के बाद तो राजा बाबू मणिपुर जाने के लिए तैयार हुए हैं। वह भी सिर्फ तीन घंटे के लिए। उसमें भी आधा-पौन घंटा नाच देखने में बिताएंगे। कहां सो रहे हैं मणिपुर के जेन जी वाले; अपने नेपाली हम-पीढ़ियों से कुछ तो सीखते!
हम तो कहते हैं कि मोदी जी ठीक किया, जो इतने टैम मणिपुर नहीं गए। ये मणिपुर वाले हैं ही नहीं इस काबिल कि उनके यहां शाही सवारी आए। बताइए, पहले तो डबल इंजन को ही फेल कर दिया। फेल भी ऐसा फेल कि पूछो ही मत। जब तक राज्य वाला इंजन पटरी पर रहा, उसने गाड़ी को पटरी पर नहीं रहने दिया। मोदी-शाह वाला इंजन पीछे से धक्का लगाए और बीरेन सिंह वाला इंजन गाड़ी को पटरी से उतारता जाए। आखिरकार, सेंटर वाले इंजन को राज्य वाले इंजन को ही धक्का देकर गाड़ी से अलग करना पड़ा। ऐसा तो सलूक किया इन मणिपुर वालों ने डबल इंजन सरकार के साथ। मोदी जी तो इतने गुस्सा थे कि पूछो ही मत। एक बार मुंह फेर लिया तो सवा दो साल पलट कर ही नहीं देखा। पर अब, इतनी मान-मनौवल के बाद मणिपुर जा रहे हैं, तो यह नाच का झगड़ा खड़ा हो गया। बताइए, उन्हें नीरो कहा जा रहा है। माना कि नीरो भी मोदी जी की तरह राजा था। यह भी माना कि नीरो के राज में रोम वैसे ही जल रहा था, जैसे मोदी जी के राज में मणिपुर जलता रहा है। पर क्या इतने भर से मोदी जी को नीरो कहा जा सकता है? मोदी जी को तो बांसुरी बजानी आती ही नहीं है! बिना बांसुरी के नीरो, कैसे?
सच पूछिए तो मोदी जी, मणिपुर वालों को नचाना कौन से अपने शौक के लिए चाहते थे। हर्गिज नहीं। वह तो बस परंपरा का निर्वाह कर रहे थे। मोदी जी परदेस में जहां भी जाते हैं, उनका स्वागत नाच-गाने के साथ होता है या नहीं? बस मोदी जी उसी परंपरा का तो पालन करना चाहते थे। खैर! मोदी जी अब नहीं देखेंगे मणिपुरी डांस। और प्लीज यह मत कहने लगिएगा कि मणिपुर परदेश में नहीं है। टैक्रीकली न सही, पर है तो परदेश ही। छोटी-छोटी आंखों वालों का देश। इनके भी गणेश जी की आंखें कहां खुलती होंगी। खैर!

