
शिक्षा व्यक्ति को संस्कारित कर उसे समाज व राष्ट्र की प्रगति का भागीदार बनाती है। यह एक ऐसा माध्यम है जो समाज की जड़ता व रूढ़ियों को तोड़कर उसमें क्रांतिकारी परिवर्तन लाती है। चूंकि शिक्षा सामाजिक परिवर्तन व प्रगति का सबसे बड़ा माध्यम है इसलिए बदलते दौर में शिक्षा नीति में भी समय की आवश्यकतानुसार बदलाव होते रहे हैं। भारत में 1966 तथा 1986 में शिक्षा नीति के बाद 29 जुलाई, 2020 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू की गई है। इस शिक्षा नीति का आधार भारतीय परंपरा और विरासत है तो विजन भारत को वैश्विक ज्ञान का महाशक्ति बनाने पर है। शिक्षा सिर्फ साक्षर ही नहीं बनाती बल्कि व्यक्ति की संपूर्ण क्षमता का विकास भी करती है। यही शिक्षा राष्ट्र की प्रगति का आधार भी बनती है।
नई शिक्षा नीति बच्चों में संवैधानिक मूल्यों के प्रति निष्ठा तथा भारतीय परंपरा और विरासत के प्रति जागरूक भी करती है। कहते हैं कि जिसका अतीत नहीं होता उसका भविष्य भी नहीं होता है। औपनिवेशिक दृष्टिकोण से भारत की परंपरा और विरासत की नकारात्मक छवि गढ़ी गई। जिस छवि को आज भी तथाकथित प्रगतिशीलता के नाम पर ढोया जा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति इस मिथक को तोड़ते हुए ‘प्राचीन और सनातन भारतीय ज्ञान और विचार की समृद्ध परंपरा के आलोक में’ तैयार की गई है। इसमें बच्चों में समस्या-समाधान, तार्किक व रचनात्मक सोच तथा विविध विषयों के बीच अंतसंर्बंधों को देख पाने व नया सोच पाने में सक्षम बनाने पर जोर है।
यह शिक्षा नीति भारत की समृद्ध विविधता और संस्कृति के प्रति सम्मान के साथ ही देश की स्थानीय और वैश्विक संदर्भों को बेहद महत्वपूर्ण मानती है। चूंकि हर बच्चें में कोई न कोई विशेष क्षमता होती है। इसलिए उस क्षमता की पहचान करते हुए उसे विकसित होने का पूरा मौका मिलना चाहिए। इस नीति का उद्देश्य ‘ऐसे उत्पादक लोगों को तैयार करना है जोकि अपने संविधान द्वारा परिकल्पित-समावेशी और बहुलतावादी समाज के निर्माण में बेहतर तरीके से योगदान करें’। यानी कि शिक्षा नीति बच्चों में रचनात्मक और तार्किक सोच को बढ़ावा देने के साथ उनमें नैतिकता, मानवीय और संवैधानिक मूल्यों तथा जीवन कौशल के टूल्स को बढ़ावा देती है। इतना ही नहीं इसमें जहां रटंत पद्धति की जगह बच्चों की अवधारणात्मक समझ पर जोर है तो वहीं कोचिंग संस्कृत को हतोत्साहित करते हुए सीखने के सतत मूल्यांकन पर बल दिया गया है।
किसी भी समाज और राष्ट्र का विकास उसके नागरिकों के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। इसलिए शिक्षा में खेल और फिटनेस को भी आवश्यक माना गया है। इस राष्ट्रीय शिक्षा नीति का विजन भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाना है। इसके लिए छात्रों में भारतीय होने के गर्व के साथ ही वैश्विक कल्याण के लिए प्रतिबद्ध होने का भाव भी होना चाहिए ताकि वे सही मायने में वैश्विक नागरिक बन सके। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृ भाषा में विज्ञान सहित सभी विषयों में उच्चतर गुणवत्ता वाली पाठ्यपुस्तकों को उपलब्ध कराने पर विशेष जोर दिया गया है। भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी में कोर्स के अलावा कोरियाई, जापानी, थाई, फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश, पुर्तगाली और रूसी भाषाओं को माध्यमिक स्तर पर अध्ययन के लिए उपलब्ध कराने की सिफारिश की गई है। ये बहुत अच्छी सिफारिश है।
शिक्षकों के लिए समाज में ‘उच्चतर दर्जा और सम्मान के भाव को पुनर्जीवित’ करने की आवश्यकता बताई गई है। इसके लिए उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहे शिक्षकों की पदोन्नति और वेतन वृद्धि की भी सिफारिश की गई है। शिक्षकों का प्रशिक्षण भी इस तरह का होना चाहिए जिसमें वे छात्रों से सिर्फ शिक्षक के रूप में हीं नहीं बल्कि संरक्षक तथा मार्गदर्शक के रूप में भी जुड़े रहें। शैक्षिक संस्कृति को इस रूप में सशक्त बनाने पर बल है जिससे छात्र ऐसे नागरिक बने जो विविधता के प्रति सम्मान और संवेदनशील तो बने ही साथ ही अपने से कमजोर नागरिकों के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी समझें। इसके लिए स्कूल के पाठ्यक्रम में पूर्वाग्रह और रूढ़िवादिता को हटाकर सभी समुदायों के लिए प्रासंगिक सामग्री को शामिल करने की बात कही गई है। इस शिक्षा नीति का मानना है कि ‘बच्चों में अपने सांस्कृतिक इतिहास, कला, भाषा एवं परंपरा की भावना और ज्ञान के विकास के द्वारा ही एक सकारात्मक सांस्कृतिक पहचान और आत्मसम्मान बच्चों में निर्मित किया जा सकता है’।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में विद्यार्थियों के समग्र विकास पर जोर है। उन्हें भारतीयता के भाव से परिचित कराते हुए 21वीं सदी के कौशल विकसित करने में सक्षम बनाने की सिफारिश की गई है। जिससे कि भारत आने वाले समय में अनुसंधान का नवाचार का नेतृत्व कर सके और भारत एक बार फिर विश्व गुरु की भूमिका का निर्वहन कर सके। जरूरत है इतने बड़े और व्यापक विजन को धारण करने वाली राष्ट्रीय शिक्षा नीति का क्रियान्वयन जमीनी स्तर पर हो।


