- सौर ऊर्जा के चार दशक से चल रहे प्रयोग के अंतर्गत अब नए चूल्हे का हुआ आविष्कार
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: रसोई में र्इंधन समय के साथ बदलता रहा है। अब सोलर स्टोव से बने खाने का दौर आने वाला है। इसके लिए देश के विभिन्न इलाकों में प्रयोग किया जा चुका है। यह सोलर स्टोव कुछ अरसे बाद मेरठ के बाजार में उपलब्ध होने की उम्मीद है। किसी समय रसोई में उपले और लकड़ी के र्इंधन से खाना बनाया जाता था। जिसका स्थान काफी हद तक एलपीजी ने ले लिया।
इसी का नतीजा है कि आज देश में करीब 10 करोड़ एलपीजी घरेलू गैस कनेक्शन के दावे सरकार की ओर से किए जा रहे हैं। दरअसल इंडियन आॅयल कारपोरेशन ने करीब 18 हजार रुपये की लागत से एक सोलर स्टोव हाल ही में लॉच किया है। इसमें पीवी पैनल के जरिये प्राप्त सौर ऊर्जा को केबल के जरिये थर्मल बैटरी से जोड़कर स्टोर करने का प्रयोग किया गया है। यही ऊर्जा चूल्हे यानी स्टोव को चूल्हे तक पहुंचाकर खाना बनाने के काम आती है।
अगर यह सौर चूल्हा जनता के बीच लोकप्रियता हासिल कर पाता है, तो बड़े पैमाने पर एलपीजी गैस खरीदने के लिए खर्च की जाने वाली विदेशी मुद्रा को बचाया जा सकेगा। एक अधिकारी ने बताया कि देश के विभिन्न क्षेत्रों में इसका प्रयोग सफल रहा है। आने वाले समय में यह सौर चूल्हा मेरठ के बाजार में भी उपलब्ध होने की संभावना है। इस पर सरकार की ओर से सब्सिडी दिए जाने के कयास भी लगाए जा रहे हैं।
चार दशक से जारी सौर ऊर्जा के प्रयोग का सफर
सौर ऊर्जा का प्रयोग करके खाना बनाने की दिशा में भी चार दशक से काम चल रहा है। यूपीनेडा के परियोजना प्रभारी प्रमोद भूषण शर्मा बताते हैं कि अलग अलग समय में नेडा की ओर से कई संयंत्र तैयार किए गए हैं। 1983 से प्राकृतिक ऊर्जा को लेकर एक कार्यक्रम चलाया गया जिसके अंतर्गत निर्धनों चूल्हे बनाकर देने का अभियान चलाया गया।

इसके अंतर्गत दो चूल्हे बनाये जाते थे। जिसमें गांव-गांव घर-घर जाकर चूल्हे बनाने का काम किया गया। जिसमें चिमनी निकाल दी जाती थी, ताकि धुएं से आंखों पर विपरीत प्रभाव न पड़े। इसके बाद अंगीठी लाई गई, फिर बत्ती वाले स्टोव का वितरण किया गया। इसके बाद सोलर कुकर का दौर आया, जिसमें चार पकवान एक साथ बनाए जा सकते हैं। जिसमें दाल, चावल, सब्जी आदि शामिल रहे। यह दो फुट चाकोर एक सूटकेस नुमा यंत्र बनाया गया।
जिसका काफी प्रचलन रहा। फिर समय बदला और डेढ़ मीटर व्यास का डिश टाइप सोलर कुकर तैयार किया गया। यह बड़े परिवारों के लिए काफी काम का रहा। यह सफर आगे भी जारी रहा, और मैस में सेफलर लगाया गया। कांच के टुकड़ों से बना सेफलर सौर ऊर्जा को रिफ्लेक्ट करके रसोई में भेजता है। इसकी कीमत करीब डेढ़ लाख रुपये रही।

