
देश भर में पिछले दशकों के दौरान मूलभूत संरचना का ढांचा व्यापक रूप से विस्तारित किया गया है। वैसे तो कारागार का होना ही एक अच्छे समाज की निशानी नहीं है, परंतु अपराधियों को दंडित करने के लिए इसका होना भी आवश्यक है। परंतु बंदियों की निरंतर बढ़ती संख्या के अनुरूप हमारे देश में कारागारों का निर्माण नहीं हुआ है। साथ ही, क्षमता से अधिक भरी जेलों में बंद लगभग 78 प्रतिशत विचाराधीन कैदी हैं, जिन पर अपराध साबित नहीं हुआ है और न्यायालय में मामला लंबित है। कई ऐसे मामले भी हैं जिनमें आरोपियों का लंबा समय जेल में गुजर रहा है, केवल इसलिए कि उन्हें अभियोग पक्ष, जो आमतौर पर स्वयं राज्य होता है, उसकी याचिका पर जमानत नहीं मिलती। कई ऐसे मामले भी हैं जिनमें आरोपी अपने पक्ष में वकील करने में सक्षम नहीं होता है या वह अपनी जमानती रकम का इंतजाम नहीं कर पाते, परिणामस्वरूप वह जेल में ही विचाराधीन कैदी बना रहता है।