
रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर पीओके (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर) के निवासियों का आह्नान करते हुए कहा है कि चूंकि पाकिस्तान आपको विदेशी मानता है, इसलिए आप भारत का हिस्सा बनें। गौर करें तो रक्षामंत्री राजनाथ सिंह का यह आह्नान ढेर सारे निहितार्थों को समेटे हुए है। किसी से छिपा नहीं है कि यहां के लोगों के हालात गुलामों से भी बदतर है और वे भारत में विलय को तैयार हैं। पीओके के लोगों का कहना भी है कि वे वास्तविक रुप से वे भारत के ही हिस्सा हैं लेकिन पाकिस्तान ने जबरन उनपर कब्जा कर रखा है। देखा भी जा रहा है कि पीओके के नागरिक पाकिस्तानी सेना के अत्याचार से ऊब चुके हैं और अब बगावत के लिए तैयार हैं। उनका हौसला इसलिए भी बुलंद है कि गुलाम कश्मीर को वापस लेने के लिए भारत मन बना लिया है।
उधर, पीओके के नागरिक पाकिस्तानी सेना के बढ़ते अत्याचार और दमन के खिलाफ ‘करो या मरो’ के लिए कमर कस लिए हैं। स्थानीय नागरिकों द्वारा पाकिस्तानी सेना के खिलाफ लगातार पाकिस्तानी फौजियों कश्मीर छोड़ों का आंदोलन चलाया जा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी पीओके के राजनीतिक कार्यकर्ता जेनेवा में पाकिस्तानी सरकार के खिलाफ धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। उनकी मानें तो पाकिस्तान की सेना पीओके में मानवाधिकार का उलंघन कर रही है और प्राकृतिक संसाधनों को लूट रही है। पीओके में बढ़ते अत्याचार और मानव अधिकारों को लेकर हो रहे प्रदर्शन से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की फजीहत बढ़ रही है। इससे बचने के लिए कभी उसके प्रधानमंत्री मुजफ्फराबाद का दौरा करते देखे जाते हैं तो कभी भारत के खिलाफ अनर्गल प्रलाप कर दुनिया का ध्यान बंटाते हैं। लेकिन सच्चाई यहीं है कि उसके हाथ से अब पीओके सरक रहा है।
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर यानी पीओके यह मूल कश्मीर का वह भाग है जिस पर पाकिस्तान ने 1947 में हमला कर जबरदस्ती अधिकार कर लिया था। जबकि असल में यह क्षेत्र भारत का है। 26 अक्टुबर, 1947 को कश्मीर के राजा हरि सिंह ने पाकिस्तानी कबायली आक्रमणकारियों से बचाने के लिए भारत सरकार से सैनिक सहायता की मांग की और कश्मीर को भारत में सम्मिलित करने की प्रार्थना की। भारत सरकार ने उनके प्रस्ताव को स्वीकार लिया और 6 फरवरी, 1954 को कश्मीर की संविधान सभा ने एक प्रस्ताव के जरिए जम्मू-कश्मीर राज्य का विलय भारत में होने की पुष्टि की। भारत सरकार ने भारतीय संविधान में संशोधन कर 14 मई, 1954 को अनुच्छेद 370 के अंतरगत जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिया और 26 जनवरी, 1957 को जम्मू-कश्मीर का संविधान लागू हो गया। पीओके की सीमाएं पाकिस्तानी पंजाब एवं उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत से पश्चिम में, उत्तर-पश्चिम में अफगानिस्तान के वाखान गलियारे से, चीन के जिनजियांग उइगर स्वायत क्षेत्र से उत्तर और भारतीय कश्मीर से पूर्व में लगती है। इस क्षेत्र के पूर्व कश्मीर राज्य के कुछ भाग ट्रांसकराकोरम ट्रैक्ट को पाकिस्तान द्वारा चीन को दे दिया गया है तथा शेष क्षेत्र को दो भागों (उत्तरी क्षेत्र एवं आजाद क्षेत्र) में विलय कर दिया गया।
इसी मसले पर 1947 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ और पाकिस्तान को करारी शिकस्त मिली। भारत ही नहीं बल्कि संयुक्त राष्ट्र सहित समेत अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा भी इस क्षेत्र को पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) ही कहा जाता है। भारत सरकार ने भारतीय संविधान में संशोधन कर 14 मई, 1954 को अनुच्छेद 370 के अंतरगत जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दे दिया और 26 जनवरी, 1957 को जम्मू-कश्मीर का संविधान लागू हो गया। कश्मीर समस्या का निपटारा 1947 में ही हो गया होता जब भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सैनिकों को रौंदते हुए अपनी बढ़त बना ली थी। लेकिन तत्कालीन जवाहरलाल नेहरू की सरकार की ढुलमुल नीति और अदूरदर्शिता के कारण कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा भारत के हाथ से निकल गया। दरअसल नेहरू ने 31 दिसंबर 1947 को संयुक्त राष्ट्र संघ से अपील कर डाली कि वह पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी लूटेरों को भारत पर आक्रमण करने से रोके। नेहरू की इस गुहार से भारतीय सेना के हाथ बंध गए और 1 जनवरी 1949 को भारत-पाकिस्तान के मध्य युद्ध विराम की घोषणा हो गई। युद्ध विराम हो जाने के बाद पाकिस्तान कश्मीर के 32000 वर्गमील क्षेत्रफल पर कुंडली मारकर बैठ गया और इस क्षेत्र को आजाद कश्मीर का नाम दे दिया।
पाकिस्तान कश्मीर के जिस हिस्से को आजाद कश्मीर कहता है वह असल में गुलाम कश्मीर है और यहां नाम भर की सरकार है। असल कब्जा तो पाकिस्तान की सेना की है। पाकिस्तान सेना की मदद से यहां के सामाजिक स्वरूप को योजनाबद्ध तरीके से बदला जा रहा है। दुनिया को यह पता है कि यहां पाक सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आइएसआइ अपने खतरनाक मंसूबों को अंजाम देने के लिए आतंकियों को प्रशिक्षित कर रही है। पाकिस्तान की विदेश नीति का मुख्य लक्ष्य किसी भी तरह जम्मू-कश्मीर को हड़पना है। उसकी परराष्ट्र नीति का मूल प्रेरणा स्रोत भारत का भय और उसके निवारण के लिए मित्रों की खोज करना है। इसीलिए वह बार-बार अंतर्राष्ट्रीय मंचों के जरिए पाकिस्तान ने यह तय कर रखा है कि जो भारत का मित्र है वह उसका शत्रु है। और जो भारत का शत्रु है वह उसका मित्र है। लेकिन आज की तारीख में उसके शत्रुओं की संख्या मित्रों से अधिक है। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के हटने के बाद अब वह इस मसले पर भारत के खिलाफ दुष्प्रचार कर अपने चीन सरीखे मित्रों के जरिए भारत के खिलाफ मोर्चा खोलता रहता है।


