Monday, April 13, 2026
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सड़क पर पार्किंग: सिस्टम मौन, रोके कौन ?

  • रसूखदार व्यापारियों, रेहड़ी ठेले वालों के रोड पर अतिक्रमण से लगता है जाम

जनवाणी संवाददाता |

किठौर: जाम ज्यादातर शहरों की प्रमुख समस्या है पर जब मुख्य व वैकल्पिक मार्गों पर खुलेआम अतिक्रमण, अवैध पार्किंग होने लगे और जिम्मेदार सिस्टम जानबूझकर चुप्पी साधे रहे तो ये समस्या और विकराल हो जाती है। यही चल रहा है तारीख-ओ-तहजीब के कस्बे किठौर, शाहजहांपुर में। यहां दोनों कस्बों के दामन पर जाम का बदनुमा दाग साफ नजर आता है पर बड़ा सवाल है कि इसे रोके कौन?

किठौर और शाहजहांपुर दोनों ऐतिहासिक कस्बे हैं। किवंदति है मथुरा से हस्तिनापुर जाते समय श्रीकृष्ण किठौर के भूतेश्वरनाथ मंदिर में ठहरते थे। प्रारंभ में ये कृष्ण ठौर था जो बाद में किठौर हो गया। यहां का राजनीतिक इतिहास भी लंबा है। शाहजहांपुर के बारे में कहा जाता है कि एक बार मुगल बादशाह शाहजहां ने इस बस्ती में कयाम (रात्री विश्राम) किया था। उन्हें ये बस्ती पसंद आई और उन्होंने खुश होकर इसका नाम शाहजहांपुर रख दिया। पठान बाहुल्य होने के कारण इसे तहजीब का कस्बा भी कहा जाता है। बहरहाल दोनों कस्बों में जाम बहुत बड़ी समस्या है।

किठौर में मेरठ-गढ़ रोड, मवाना रोड पर जहां रसूखदार व्यापारी लोहा, रोड़ी, डस्ट, पत्थर, हार्डवेयर, किराने के सामान से अतिक्रमण किए रहते हैं, वहीं रोड के दोनों ओर खड़े ठेले, रेहड़ी वाले भी पीछे नही हैं। श्यामपुर रोड पर ई-रिक्शा, टैंपू व तांगे वाले अवैध स्टैंड बनाए हुए हैं तो मुख्यबाजार में फव्वारा चौक से काफी दूर तक दुकानदारों ने सड़क पर अतिक्रमण के साथ अवैध पार्किंग का अड्डा बना रखा है। रही कसर यहां भी ठेले, रेहड़ी वाले पूरी कर देते हैं। वाहन तो दूर दिन में यहां पैदल चलना भी दुश्वार रहता है। शाहजहांपुर की बात करें तो सामान्य दिनों में यहां सुबह मंडी के समय जाम लगता है

मगर बागवानी खासतौर पर आम, लीची, नाशपाती, आड़ू, की फसलें आते ही यहां का जाम झमेला बन जाता है। क्योंकि उपरोक्त फल यहां से दूसरे राज्यों को निर्यात किए जाते हैं लिहाजा सुबह में सब्जीमंडी और दोपहर से देर शाम तक फलों के लदान के लिए खड़े वाहनों से पूरा रोड घिरा रहता है। बागवानी के सीजन में तो यहां के वैकल्पिक डिभाई, महलवाला, नित्यानंदपुर मार्गों पर भी जाम लगा रहता है। रोड पर अतिक्रमण में यहां के दुकानदार भी पीछे नही। लेकिन सिस्टम दोनों कस्बों के मशक्कत भरे इस नजारे को मूक बना ऐसे देख रहा है जैसे जनसमस्या से उसे कोई सरोकार ही न हो।

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