- उर्मिला, हाईप्रोफाइल फैमिली शौक खेतीबाड़ी का, विदेशों तक भेज रही तैयार उत्पाद
गयूर अली खां |
मेरठ/किठौर: बदलते युग में कृषि का तौर तरीका भी बदल गया। कम मेहनत और निरंतर उन्नत उपज के चक्कर में किसान भले ही रासायनिक कृषि प्रणाली अपना चुका हो मगर खाद्यान्न फसलों की गुणवत्ता और उपभोग के लिहाज से कृषि जगत में जैविक कृषि का अपना अलग मुकाम है। यही वजह है कि निजि प्रयोग के लिए अधिकांश लोग आज भी जैविक रूप से तैयार फसलों की मांग और प्रषंसा करते दिखते है।
नारी स्वावलंबन की प्रेरणास्त्रोत बनी मेरठ के माछरा अर्न्तगत हाईप्रोफाइल फैमिली की एक महिला ने पति के सपने का साकार कर न सिर्फ जैविक खेती को अपना शौक और पेशा बनाया बल्कि जैविक रूप से तैयार फसलों को वह निजि तौर पर इस्तेमाल के साथ-साथ कृषि यूनिवर्सिटीज और विदेशों को निर्यात भी कर रही है।

माछरा के गोविंदपुरी निवासी महेंद्र वशिष्ठ रुड़की जलनिगम में एक्जीक्यूटिव इंजीनियर थे। उनका बेटा अतुल एचपीसीएल दिल्ली में इंजीनियर और बेटी स्मिता शांतिकुंज यूनिवर्सिटी हरिद्धार में रजिस्टार है। महेंद्र के छोटे भाई जीके शर्मा जज और एक भाई गैल कंपनी में प्रबंधक है।
बचपन से ही खेती के शौकीन महेंद्र ने सेवानिवृति के बाद गांव में पैतृक कृषि भूमि पर जैविक खेती का मन बनाया। उन्होंने यह इच्छा पत्नी उर्मिला वशिष्ठ से जाहिर की। मगर सेवनिवृत्ति के बाद भी जीवन की व्यस्तता जैविक खेती का मौका पाए बिना ही उन्हें दुनिया से विदा होना पड़ा।

पति की मौत के बाद शुरू की कवायद
महेंद्र वशिष्ठ की मौत के बाद उनकी विधवा उर्मिला ने पति का सपना साकार करने के लिए 2015 में इकलौते बेटे अतुल के घर दिल्ली से गांव लौटकर जैविक कृषि का बीड़ा उठाया। इसके लिए उर्मिला ने बेटे से एक एकड़ कृषि भूमि खरीदवाकर उस पर जैविक कृषि शुरु की।
उर्मिला ने बताया कि करीब पांच वर्षों से वह इस भूमि पर गेहूं, धान, सरसों, आलू, अरवी के अलावा अलसी, सैंठ, करोंदा, धनिया, सौंफ, हल्दी, लहसुन की फसलें उगाती हैं। कई तरह के अचार भी तैयार करती हैं। वह रासायनिक उर्वरकों का जरा भी प्रयोग नही करतीं। बल्कि गाजियाबाद नेहरु कमलानगर स्थित जैविक खाद भंडार से खाद लाती हैं। फसल के अवशेषों को खेतों में गलाने के लिए गुड़ के घोल और डी-कंपोजर प्रयोग करती हैं।
पहाड़ों में प्रशिक्षण लेकर बन गई फौलाद
72 वर्षीय उर्मिला से जब उनके प्रेरणास्त्रोत और फौलादी इरादों पर बात की गई तो उन्होंने बताया कि रुड़की में पति की सर्विस के दौरान वह शांतिकुंज हरिद्वार के गायत्री परिवार के संपर्क में आईं। यह परिवार नारी को स्वावलंबन के साथ जीवन यापन के सहज तरीकों का प्रशिक्षण देता है। गायत्री परिवार से प्रेरित होकर उन्होंने प्रशिक्षण शिविरों में व्यक्तित्व परिष्कार, जड़ी बूटियों से उपचार, ध्यान, जैसे कई रचनात्मक कोर्सेज किए। बस यहीं से उनके इरादे फौलादी होते चले गए।
यूनिविर्सिटी से लेकर विदेशों तक निर्यात
उर्मिला ने बताया कि सही ढंग से की जाए तो जैविक और रासायनिक विधि से की गई कृषि में फसल उत्पादन को लेकर कोई खास फर्क नहीं। फसल की पैदावार दोनों विधियों से लगभग बराबर होती है। मगर शुद्धता का अंतर है। बताया कि अपने वर्षभर के उपभोग का खाद्यान्न रखकर शेष को वह शांतिकुंज यूनिवर्सिटी, मोदीपुरम, कृषि विश्वविद्यालय को बेच देती हैं।
कई बार, विदेशों में बसे उनके रिश्तेदार, संबंधी भी ले जाते हैं। बकौल, उर्मिला उनका पीजीएस में रजिस्टेशन हो चुका है। शांतिकुंज और मोदीपुरम विवि में वह कई बार सम्मानित हुईं। गत 23 दिसंबर को किसान सम्मान दिवस पर कृषि विज्ञान संस्थान हस्तिनापुर ने भी उनको सम्मानित किया था।

