
कश्मीर में आतंकवाद की घटनाएं कम होने के बजाय बढ़ी हैं। फर्क सिर्फ इतना सा है कि अब इन खबरों को हमारी राष्ट्रीय मीडिया उतनी प्रमुखता से नहीं उठातीं, जितना दस वर्ष पहले उठाया करती थीं। इसके पीछे की वजह को समझना कोई खास कठिन नहीं है। अभी दो दिन पहले ही जम्मू क्षेत्र के कठुआ इलाके के पास गश्ती में जा रहे सेना के जवानों पर घात लगाकर हुए हमले में 5 सैनिकों की मृत्यु की खबर ने फिर साबित कर दिया है कि कश्मीर का मुद्दा और सीमा पार से उग्रवादियों की घुसपैठ लगातार जारी है। यहां पर एक दिलचस्प फर्क यह आया है कि पिछले दो वर्षों में आतंकवादी घटनाएं कश्मीर घाटी की बजाय अब जम्मू क्षेत्र में देखने को मिल रही हैं। कश्मीर को कवर कर रहे पत्रकारों का मानना है कि दशकों से जम्मू क्षेत्र में ये घटनाएं नहीं होती थीं, लेकिन हाल के वर्षों में यह बदलाव देखने को मिल रहा है। जम्मू-कश्मीर के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा जी के बेटे की सगाई में कथित सरकारी फंड के दुरुपयोग का मामला भी इसी के साथ दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। कश्मीर में राजनीतिक सरगर्मियां तो पहले ही धारा 370 के खात्मे और लंबे समय तक सभी प्रमुख राजनेताओं को बंदी या घरों में नजरबंद रखने के बाद से लगभग खत्म हो चुकी थी, ऐसे में कश्मीरी अवाम की लोकतांत्रिक आवाज के मुखरित होने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता। एक लंबे अरसे बाद जब केंद्र सरकार की ओर से कश्मीर में एक बार फिर से राजनीतिक प्रक्रिया बहाल किये जाने का आश्वासन दिया जा रहा है, तो वह किस बिना पर इसे 5 वर्ष पहले पूरी तरह से खत्म की थी और आज जब एक नहीं एक के बाद एक कई घटनाओं में सेना के जवान सहित आम लोगों को आतंकी निशाना बना रहे हैं, वह इसे अंजाम देने की सोच रही है?
जम्मू क्षेत्र में इस वर्ष अभी तक 23 वारदातें हो चुकी हैं। वर्ष 2023 में ऐसी 43 घटनाएं देखने को मिली थीं। अप्रैल 2024 से करीब 9 प्रमुख आतंकी घटनाएं जम्मू-कश्मीर में हो चुकी हैं। सबसे पहले, 22 अप्रैल 2024 को राजौरी के शाहदरा शरीफ इलाके में मोहम्मद रज्जाक जो कि एक सरकारी मुलाजिम थे, को आतंकियों ने अपना निशाना बनाया था। बताया जा रहा है कि उनके भाई क्षेत्रीय रक्षा दल का हिस्सा थे।
28 अप्रैल को उधमपुर के बसंतगढ़ में ग्राम सुरक्षा गार्ड मोहम्मद शरीफ पर आतंकियों ने फायरिंग कर उन्हें मार डाला था। 4 मई को पूंछ इलाके के सुनार्कोट में भारतीय वायु सेना के जवान विक्की पहाड़े को आतंकवादियों ने घात लगाकर हमले में मौत के घाट उतार डाला, जिसमें 4 अन्य जवान घायल हुए। आम चुनावों के बाद 9 जून को एक बड़ी आतंकवादी घटना तब देखने को मिली जब रेआसी में शिव खोरी मंदिर से दर्शन के बाद लौट रहे तीर्थयात्रियों की बस पर आतंकवादियों ने अंधाधुंध फायरिंग कर 9 तीर्थयात्रियों को जान से मार डाला, जबकि 42 लोग घायल थे। पांचवीं घटना 11 जून की है, जब कठुआ से सटे भदेरवाह के छतरगाला इलाके में सेना और कश्मीर पुलिस की जॉइंट पिकेट पर आतंकियों के हमले में सेना के पांच जवान और एक पुलिस अधिकारी के घायल होने की खबर आई। बाद में कठुआ के हीरानगर इलाके में भारत-पाक सीमा के पास सेना और आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में 2 आतंकवादियों सहित एक सीआरपीएफ जवान की मृत्यु हो गई थी, जबकि एक सिविलियन के घायल होने की खबर थी। छठी घटना 12 जून को डोडा जिले की है, जिसमें गंडोह तहसील में पुलिसबलों के ऊपर आतंकियों के हमले में हेड कांस्टेबल फरीद अहमद के घायल होने की खबर थी। यह घटना 26 जून की है, जिसमें डोडा जिले के गंडोह इलाके में सीनू जंगल में जेईएम के 3 आतंकवादियों को मार गिराने में सफलता प्राप्त हुई थी। 7 जुलाई को एक बार फिर से कठुआ जिले के हीरानगर इलाके में, जो भारत-पाक सीमा के समीप का इलाका है, में संतरी की पोस्ट पर तैनात एक जवान के ऊपर आतंकी हमला किया गया था, जिसमें जवान के बुरी तरह से घायल होने की खबर थी। 9 जुलाई को कठुआ के बदनोता गांव के पास जब आर्मी का एक गश्ती ट्रक गुजर रहा था तो उस पर घात लगाकर आतंकी हमला किया गया, जिसमें 5 जवानों की शहादत, जबकि अन्य 5 जवानों के घायल होने की खबर है। इन नौ घटनाओं में दो आतंकी घटनाओं पर देश का ध्यान जा पाया, जिसमें तीर्थयात्रियों की बस पर अंधाधुंध फायरिंग और 9 जुलाई के दिन 5 जवानों की निर्मम हत्या प्रमुख है।
सवाल उठता है कि जब सरकार को पता है कि ऐसी घटनाएं बारंबार हो रही हैं, जिसकी जानकारी समाचार एजेंसियों से कहीं अधिक खुफिया एजेंसियों और गृह मंत्रालय के पास मौजूद है तो जम्मू क्षेत्र में विशेष एहतियात और नाकेबंदी संभव क्यों नहीं हो पा रही है? हाल के दिनों में देश के प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह बीच-बीच में भारत के प्रतिरक्षा क्षेत्र को लेकर बढ़-चढ़ कर दावे करते रहते हैं, आम चुनाव के वक्त अक्सर पाक अधिकृत कश्मीर को वापिस भारत के कब्जे में ले लेने के दावे किये जा रहे थे, लेकिन असल वास्तविकता तो यह है कि सीमा पार से जब चाहे आतंकी प्रवेश पा रहे हैं।
देश के राजनीतिज्ञों के पास ऐसे अवसरों पर श्रद्धांजलि अर्पित करने, कड़ी निंदा और जुबानी जमाखर्च के अलावा शायद ही कभी कुछ सुनने को मिलता है। यह साफ हो चुका है कि जम्मू-कश्मीर में शांति बहाली के लिए मौजूदा केंद्र सरकार के पास अब कुछ भी नहीं बचा है। कश्मीर घाटी में जो शांति नजर आती है, उसे कहीं न कहीं भारी सैन्य दबाव और एलजी के जरिये केंद्र के प्रत्यक्ष दबाव के बल पर हासिल किया गया है। कश्मीर घाटी में भले ही पूर्व की तरह खुलकर आतंकवादी घटनाएं नहीं हो रही हैं, लेकिन चुन-चुनकर प्रवासी मजदूरों को मारने या 91 के बाद पहली बार दो-तीन वर्षों में फिर से कश्मीरी पंडितों के ऊपर हमलों की वारदात देखने को मिली थी। ऐसा जान पड़ता है कि इन घटनाओं को अंजाम देने वाले लोग खुलेआम खुद को आतंकवादी नहीं बता रहे, लेकिन मौके-बेमौके अचानक ऐसी घटनाओं को अंजाम देने में कामयाब रहे हैं, जिसके बारे में कश्मीर पुलिस या खुफिया तंत्र पूरी तरह से अनभिज्ञ बना हुआ है।
जम्मू-कश्मीर का स्थायी हल किसके पास है? आजादी के बाद से ही आरएसएस और उसके राजनीतिक संगठन ने कश्मीर को हासिल धारा 370 पर पूरे देश में वितंडा खड़ा कर रखा था। सवाल उठता है कि क्या आज कश्मीर घाटी, लेह और लद्दाख या जम्मू क्षेत्र ही केंद्र शासित दर्जे को पाकर खुश हैं? लद्दाख क्षेत्र ने तो पिछले दो-तीन वर्षों से स्पष्ट कर दिया है कि उनके साथ धोखा हुआ है। कश्मीर और वहां की अवाम के कष्टों की तो व्याख्या भी नहीं की जा सकती, लेकिन वे भी राज्य के दर्जे से नीचे की तो कल्पना भी नहीं कर सकते। जम्मू क्षेत्र के नागरिकों को भी पिछले 5 वर्षों के दौरान कई खट्टे-मीठे अनुभवों से दो-चार होना पड़ा है। घाटी में भले ही बड़े कॉरपोरेट्स ने रियल एस्टेट अपने कब्जे में करने के प्रयास किये हों, लेकिन जम्मू के लोग इस बीमारी से सबसे अधिक भयाक्रांत हैं। आज कश्मीर से अधिक जम्मू के लोगों को विशेष राज्य के दर्जे की कमी खल रही है।


