हरियाणा में वोटर सूची में दस बार अलग-अलग नाम, किसने ऐसा काम का लिया दाम। कभी सीमा कभी स्वीटी कभी सरस्वती और फोटो एक वह अबला बेचारी ब्राजील की मॉडल है। चुनावी वोटर लिस्ट की यह कैसी धांधली है। वोट चोर तो कोई है। बाबा का आरोप और लोकतंत्र में रोष। इस घटना के उजागर से विपक्ष में जोश है। गोदी मीडिया को छोड़कर बाकि मीडिया इस खबर को रोप रही है। इस खबर से चुनाव आयोग को क्या सांप सूंघ गया है? जो चुप्पी का मंतर मार कर बैठ गया है। हे लोकतंत्र के रखवाले चुनाव आयोग कुछ जांच का योग करो। लोकतंत्र में विश्वास नहीं मिटना चाहिए। जब तक विश्वास है लोकतंत्र जीवित है।
जनता का विश्वास यदि टूटा तो लोकतंत्र मृतपाय: और जेड जेन क्रांति की बयार बहते देर नहीं लगती है। अभी भी समय है। सत्ता आती जाती रहेगी, लेकिन लोकतंत्र जीवित रहना चाहिए। हे संकटमोचन चुनाव आयोग अपने बाहुबल को पहचाने और चुनावी शंखनाद के बिगुल को बजाते हुए चुनावी समुद्र को लांघ जाए। बेईमानी करने वाले लोगों को उनकी सीमा बताए। देर कर दी दो लोकतंत्र कहां बचेगा?
चुनाव में माननीयों को भाषाई मर्यादा को लांघना नहीं चाहिए, वरना लेने के देने पड़ जाते हैं। अभी हाल ही में बुलडोजर बाबा जी ने यह क्या बोल दिया, महागठबंधन में तीन बंदर पप्पू, टप्पू और अप्पू हैं, जो सच बोलने, सुनने और देखने से परहेज करते हैं। अब इसके जवाब में सपा बहादुर जी ने अपने एक्स पर पोस्ट पर लिखा-जो लोग आईना देखकर आते हैं, उन्हें हर तरफ बंदर नजर आते हैं। बंदर की टोली में बैठा दिए जाएं तो अलग नजर भी नहीं आते हैं! यह तो भाषा की मर्यादा का उल्लंघन है।
लोकतंत्र में माननीयों को मर्यादित रहना जरूरी है। जबकि अमर्यादित रहना गैरजरूरी है। सब गैरजरूरी आचरण व कामों को तवज्जो दे रहे हैं। चुनाव में मुद्दा बेरोजगारी, महंगाई, स्वास्थ्य और भ्रष्टाचार हो। लेकिन इनको छोड़कर दूसरा ही अचार खिलाया जा रहा है। कोई बीस साल सत्ता में होकर भी जंगलराज को याद कर मंगलराज लाने की वकालत कर रहा है। रामराज में भी जनता परेशान है और इसके लिए सत्तर साल जिम्मेदार है। नेता समझते हैं जनता मूर्ख बेहद है और यह हद है। चुनाव में झूठ-झपाट खूब बोले जाते हैं। बिना तौले ही जनसभाओं में थोक के भाव बेचे जा रहे हैं। बेचारी ईवीएम अभी से शक की निगाह से देखी जाने लगी है।
ईवीएम दु:खी है, क्योंकि बैलट पेपर से चुनाव नहीं होगा। इससे चुनावी रिजल्ट के दिन उसकी इज्जत का वॉट लगना तय है। तय चीजों से जनता में भय है और लोकतंत्र का क्षय है। सिस्टम के पिस्टन का पेंच चुनाव आयोग को कसना होगा। सत्ता, विपक्ष और जनता के हृदय में बसना होगा। फोटो एक रूप अनेक कभी सीमा कभी स्वीटी कभी सरस्वती, वोट का खोट बहुत कुछ कहती है। बिहार चुनाव में बुराई की हार हो और सच के गले में जीत का हार हो। इसी शुभेच्छा के साथ…लोकतंत्र की जय हो!

