टेन के सफर में अचार और पापड़ भी पांच सितारा होटल के खाने का स्वाद दे जाते हैं। और अगर साथ में राजनीति पर चर्चा छिड़ जाए, तो समझिए सफर सचमुच यादगार। मोहन ने पापड़ का टुकड़ा तोड़ते हुए कहा—हमारे देश की राजनीति भी अचार और पापड़ जैसी ही है। फर्क बस इतना है कि अचार बरसों तक टिकता है, पापड़ मिनटों में टूट जाता है…और राजनीति? वो तो हर रोज नए ठेके, नए स्वाद और नई सजावट के साथ जनता की थाली में आ धमकती है। कैसे? मोनू ने पूछा।
मोहन ने समझाया, देखो, राजनीतिक दलों की सभाएं अचार बनाने जैसी ही होती हैं। पहले नेताओं को मसालेदार भाषणों में डुबोया जाता है, फिर उन्हें जनता की भीड़ के तेल में डालकर लंबे समय तक संभालकर रखा जाता है। जो नेता जितना खट्टा-मीठा हो, उतना ही बिकाऊ। फर्क बस इतना है कि अचार खाने में मजा देता है, और राजनीति पेट में अम्लता व दिमाग में जलन। अब तक चुप बैठे हमारे घसीटे चच्चा कहां मानने वाले थे। वे बोले—बेटा, राजनीति में सबसे अहम हुनर पापड़ बेलने का है। कोई उम्मीदवार जितना ज्यादा चुनाव से पहले पापड़ बेल सके—मतलब हाथ जोड़ना, झूठे वादे करना, भावनाओं पर आटा छानना और कुरकुरे नारे तलकर परोसना—उसकी सफलता उतनी ही तय। चच्चा अब पूरे जोश में बोले—और अचार की राजनीति देखो! चुनाव से पहले नेता जनता से मीठी-मीठी बातें करते हैं, बिलकुल आम का अचार। जीतने के बाद वही आम खट्टा नींबू बन जाता है। विपक्ष हरी मिर्च के अचार जैसा—बिना बात तीखा और हर समय जलन फैलाने वाला। मसाले इतने डाल दिए जाते हैं कि असली मुद्दों का स्वाद ही दब जाता है।
टीवी चैनल भी इस अचार-पापड़ महोत्सव में नमकीन दुकानदार से कम नहीं। सुबह से रात तक बहस का तड़का, सर्वे का मसाला और एक्सपर्ट की प्याज डालकर दर्शकों को परोसते रहते हैं। जनता चैनल बदलती है मानो थाली में अचार बदल रही हो—पर नतीजा हर जगह एक-सा, गैस ही गैस। सरकारें बीच-बीच में विकास के नाम पर पापड़ बेलती हैं। कभी स्मार्ट सिटी का, कभी डिजिटल इंडिया का, कभी पांच ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी का। लेकिन जैसे कच्चे पापड़ चूल्हे पर फट जाते हैं, वैसे ही इनके वादे पहले ही झोंके में चटक जाते हैं।
चच्चा ने अचार का चटकारा लेते हुए निष्कर्ष निकाला—बेटा, राजनीति में अचार जितना पुराना, उतना स्वादिष्ट माना जाता है। पचास साल से सत्ता में बैठे नेता जनता की आदत बन जाते हैं। और नए नेता? बिना तेल का अचार—जल्दी खराब, तुरंत बदबू। असलियत ये है कि राजनीति ने जनता को रसोई का अभ्यास करा दिया है। हर चुनाव में हम सोचते हैं कि इस बार अचार मीठा होगा और पापड़ कुरकुरा, लेकिन हर बार मिलता वही खट्टापन और अधपकापन। पेट भरता नहीं, जलन और बढ़ जाती है। देख लो बेटा, चच्चा ने तीखी डकार लेते हुए कहा, अचार-पापड़ खाने से गैस होती है, पर राजनीति खाने से जनता बेहोश हो जाती है।

