Sunday, April 12, 2026
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गुलाबी नदी की मछलियां: आम आदमी की तकलीफ !

Ravivani 32


SUDHANSHU GUPTलगभग तीन दशक पहले की बात है। मैं एक साप्ताहिक अखबार में काम करता था। यह वह समय था, जब आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरणी दस्तक दे चुका था और उसका शुरुआती असर दिखाई देने लगा था। इसी समय पूरी संपादकीय टीम को यह समझाया गया कि अखबार में ऐसी कोई तस्वीर नहीं जानी चाहिए, जिसमें दुख, निराशा या कुरुपता दिखाई दे। यानी तस्वीरें खुशनुमा होनी चाहिए। ऐसी होनी चाहिए जिन्हें देखकर पाठक भी राहत महसूस करे-पॉजिटिव महसूस करे। जाहिर है तस्वीरों के साथ-साथ ऐसी खबरों के लिए भी जगह कम होती गई, जिनमें आम आदमी के दुख या निराशा झलकती हो।
बाद में आए न्यूज चैनलों ने तो खबरों को ‘उत्सव’ में बदल दिया। या हर उत्सव में उन्हें खबर दिखाई देने लगी। अखबारों में खुशनुमा तस्वीरें ही छापने का एक्सटेंशन यह हुआ कि साहित्य से भी आम आदमी या हाशिये पर रहने वाले आदमी गायब होता चले गए। साहित्य में भी अब खुशनुमा रचनाएं ही दिखाई देने लगीं। यह बाजार की जरूरत बन गई और बहुत से रचनाकारों ने इस जरूरत को पूरा करने का बीड़ा उठाया।

बावजूद इसके आज भी कुछ रचनाकारों की रचनाओं के केंद्र में हाशिये के लोग या हाशिये का जीवन होता है। सिनीवाली ऐसी ही रचनाकार हैं। मैंने सिनीवाली की कुछ कहानियां पढ़ी थीं, लेकिन उनकी कोई साहित्यिक छवि मेरे भीतर नहीं बन पाई थी। लेकिन उनका नया कहानी संग्रह ‘गुलाबी नदी की मछलियां’ (अंतिका प्रकाशन प्रा.लि.) पढ़ने के बाद मुझे लगा कि सिनीवाली के पास कहानियां कहने का शऊर है और वे ग्रामीण जीवन को बड़े करीब से देख और महसूस करती हैं।
सिनीवाली के पास आंचलिक परिवेश और स्थानीय मुहावरे हैं, जो उनकी कहानियों को ‘इंटेंस’ और मौलिक बनाते हैं। हाशिये का आदमी उनकी कहानियों में शिद्दत से उभरकर आता है। इस संग्रह में 9 कहानियां हैं। कई कहानियों का परिवेश आंचलिक होने के बावजूद ये आंचलिक नहीं हैं। ये मनुष्य के सुख-दुख की कहानियां हैं। जीवन की कहानियां हैं। ‘रहौं कंत होशियार’ में सिनीवाली र्इंटों का भट्ठा लगाने के लिए किसानों की जमीनों पर कब्जा करने वाले रघुवंसी बाबू के जरिये किसानों की दुर्दशा को चित्रित करती हैं। रघुवंसी बाबू किसानों से जमीनें खरीद लेते हैं और वही पैसा उनसे इस बहाने ले लेते हैं कि उन्हें हर माह ब्याज मिलेगा। कुछ किसान जमीनों के बिकने पर खुश हैं और कुछ इस बात से दुखी हैं कि अब उनकी जमीनों पर आग जलेगी और अन्न देने वाली जमीन र्इंटें देगी। पूरी ‘इंटेंसिटी’ के साथ कहानी अपने मुकाम तक पहुंचती है। सिनीवाली इस कहानी में भी, जात में लौवा और पंछी में कौवा जैसे आंचलिक मुहावरों का प्रयोग करती हैं, जो कहानी को जीवंत बना देता है।

सिनीवाली के पास राजनीतिक नजर है और दर्शन है। ‘करतब बायस’ में सिनीवाली चुनाव प्रचार के बाद किस तरह वोटों की खरीद फरोख्त होती है, इसे पूरी परिवेश के साथ चित्रित करती हैं। गांव यहां भी है। और गांवों में चुनावी राजनीति भी है। स्टायर है, व्यंग्य है और परिवेश है। ‘अपने लोग’ कहानी गांव और शहर के बीच पुल-सा बनाती दिखाई देती है। या सिनीवाली की लेखकीय इच्छा है कि गांव शहर जैसे हो जाएं या शहरी सुविधा गांवों तक पहुंच जाएं। ‘अपने लोग’ कहानी में गांव का एक युवक शहर आकर दरबान की नौकरी करने लगता है। लेकिन शहरी सपने और आकांक्षाएं उसे वापस गांव जाने पर मजबूर कर देते हैं। गांव में परिवार की खराब आर्थिक स्थितियां यहां भी युवक को चैन से जीने नहीं देतीं।
दोस्तोव्स्की ने एक बार कहा था, संकीर्ण दीवारें हमारे विचारों को भी संकीर्ण बना देती हैं। यह संकीर्णता उस वक्त दिखाई देती है जब युवक के मन में अपने ही पिता को मारने का विचार पैदा होता है। सिनीवाली अपनी कहानियों को आदर्श और नैतिकता से बचाती हैं। शायद यही वजह है कि उनकी कहानियां सहज और मानवीय लगती हैं। एक तरफ वह स्त्री मन के भय (अतिथि) दिखाती हैं तो दूसरी तरफ पारिवारिक बंटवारा भी उनके लेखन का विषय बनता है (बंटवारा)। गांवों में सारी समस्याओं के साथ लड़के की शादी में देर होना और उससे उपजी समस्याएं (दूल्हा बाबू) भी दिखाई देती हैं। ‘इत्रदान’ में भी गांव की खुशबू महसूस की जा सकती है। ‘अधजली’ कहानी गांव में ही स्त्री जीवन की त्रासदियों का आख्यान है।
लेकिन इस संग्रह की सबसे सशक्त कहानी है शीर्षक कहानी ‘गुलाबी नदी की मछलियां’। यूं इसे प्रेम कहानी भी कहा जा सकता है। लौंगिया और तिरुपति की प्रेम कहानी। इस प्रेम कहानी को बुनने के लिए सिनीवाली परिवेश को जापान या कश्मीर नहीं ले जाती। बल्कि ये प्रेम कहानी भय के माहौल में जन्म लेती है। जीवन के अंधेरों के बीच। बिहार में फिरौती का धंधा एक समय जोरों पर था। नवअपराधी पैसा वसूल करने के लिए एक युवक का अपहरण कर लेता है। लौंगिया अपनी दादी के साथ रहती है। और जब तब तिरुपति को खाने देने उसकी कोठरी में जाती है। एक दिन वह पाती है, वह जिस तरह कमरे में गई थी…उस तरह लौट नहीं पाई। एक दिन लौंगिया अपने पिता से यह सुन लेती है कि लड़के को (तिरुपति) मार दिया जाएगा। मृत्यु के इस माहौल में प्रेम जन्मता है। लगभग उसी तरह जिस तरह चेक उपन्यास रोमियो जूलियट और अंधेरा (लेखक यान ओत्चेनाशेक) में दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान नायक-नायिका के बीच प्रेम उपजता है। दरअसल इन परिस्थितियों में प्रेम हो जाना बढ़ते अंधेरों के बीच का उजला पक्ष है।

सिनीवाल की कहानी ‘गुलाबी नदी की मछलियां’ की सबसे खूबसूरत बात यह है कि पूरी कहानी में कहीं प्रेम शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है। इसके बावजूद दोनों के बीच प्रेम होता दिखाई पड़ता है। सिर्फ इतना ही नहीं यह प्रेम गहरा होता जाता है। लौंगिया तिरुपति को कैद से आजाद करने का रास्ता खोल देती है। तिरुपति लौंगिया का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहता है, कैद से मुझे आजाद कर रही हो…और कभी नहीं खुलने वाले बंधन में बांध रही हो…लौंगिया मैं तुम्हें लेने आऊंगा…। लौंगिया उसे आने के लिए मना करती है और कहती है, मिलने आना…अपनी लौंगिया से…सपने में। यह कहानी प्रेम को एक दुनिया से सपनों की दुनिया तक ले जाती है। यही प्रेम कहानी की ताकत होती है, होनी चाहिए। सिनीवाली इस प्रेम कहानी को बाजारू प्रेम कहानी होने से भी निरंतर बचाती है। युवा लेखकों को इस कहानी से यह सीखना चाहिए कि कहानी में जो कहा नहीं गया, उसका प्रभाव लंबे समय तक रहता है-‘खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी इसकी धार। जो उबरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार।’

सिनीवाली का यह संग्रह निश्चित रूप से पठनीय और संग्रहणीय है। इसे पढ़ा जाना चाहिए। यह अकारण नहीं है कि सिनीवाली की कहानियां पाठक को बेचैन करती हैं। ‘डिस्टर्ब’ करती हैं। ये ऐसी कहानियां नहीं हैं जिन्हें पढ़कर रख दिया जाए। ये आम आदमी की तकलीफों की कहानियां हैं।


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