
प्रशांत किशोर इन दिनों मुस्लिम अवाम के साथ अलग से बैठक कर रहे हैं। इन बैठकों में वे मुसलमानों को समीकरण समझाते हैं कि कैसे 20 प्रतिशत मुसलमान और 40 प्रतिशत नॉन-भाजपा हिंदू अगर मिल जाए, तो जनसुराज की ताकत 60 फीसदी तक पहुंच जाएगी। तब न मुसलमानों को डरने की जरूरत होगी और न किसी के लालटेन का केरोसिन बन कर जलने की। ऐसी ही एक हालिया बैठक बिहार के पूर्वी चंपारण में हुई, जहां इन पंक्तियों का लेखक भी प्रशांत किशोर के इस अनोखे समीकरण मेकिंग प्रोसेस का गवाह था। बहरहाल, बात कुल जमा यही थी कि जैसे 30 साल तक एक पार्टी का भय दिखा कर दूसरी पार्टियों ने मुसलमानों का वोट लिया, ठीक उसी तर्ज पर प्रशांत किशोर चाहते है कि आप हमारे साथ आइये, आपको किसी से डरने की जरूरत नहीं हैं। यानी, एक तरह से वे मुसलमानों को अपना नया रहनुमा चुनने को कहते है, जो न जाने किस गारंटी कार्ड के आधार पर यह कह रहा है कि हम तुम्हारी यह हालत नहीं करेंगे, जो बाकियों ने किया? हालांकि, उक्त बैठक में प्रशांत किशोर यह कहते नजर आए कि दलितों के बाद सबसे बुरी हालत मुसलमानों की हैं। फिर भी, उन्होंने मुसलमानों के मसाइलों पर बात नहीं की। बस, 40 प्लस 20 फीसदी यानी 60 फीसदी का समीकरण बनाते-समझाते हुए अपना भाषण समाप्त कर गए।
हिंदुस्तान के मुसलमानों के मसाइल क्या है? यह किसी प्रशांत किशोर या ओवैसी से जानने की जरूरत नहीं है। इसके लिए बकायदा भारत सरकार ने एक कमेटी और एक आयोग बनाया था। सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा कमीशन। सच्चर कमेटी ने मुसलमानों की समस्या का डायग्नोसिस किया था। वहीं रंगनाथ मिश्रा कमीशन ने इन समस्याओं का समाधान बताया हैं। ये समाधान है धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को 10 फीसदी आरक्षण समेत अन्य आर्थिक और शैक्षिक सहायता देना। साथ ही, रंगनाथ मिश्रा कमीशन ने संविधान से 1950 का राष्ट्रपति अध्यादेश को हटाने की भी सिफारिश की थी। इसी अध्यादेश के कारण सिर्फ हिंदू समुदाय को शेड्यूल कास्ट का स्टेट्स मिल सकता है। हालांकि, बाद में इसमें संशोधन कर के सिख दलितों और नव बौद्धों को भी शेड्यूल कास्ट स्टेट्स दिया गया।
मुसलमानों में जाति नहीं होती। लेकिन, हालिया बिहार कास्ट सर्वे में जो आंकड़े जारी किए गए, उनमें बहुत स्पष्ट रूप से सवर्ण और पसमांदा मुस्लिम को क्लासिफाइड किया गया है। मुसलमानों में करीब 80 फीसदी पसमांदा है। सवर्ण मुसलमान 10 फीसदी ईडब्लूएस आरक्षण का फायदा लेते हैं। ओबीसी कोटे से भी मुसलमानों को आरक्षण मिलता है। कुछ राज्यों जैसे कारगिल, लक्षद्वीप में उन्हें एसटी कोटे से भी आरक्षण मिलता है। अब, ऐसे में रंगनाथ मिश्रा कमीशन ने जो सिफारिश की है कि मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक-शैक्षणिक दुर्दशा को देखते हुए उन्हें शेड्यूल कास्ट स्टेट्स दिया जाए और अलग से 10 फीसदी आरक्षण भी दिया जाए, तो इसमें आनाकानी क्यों? 1950 का राष्ट्रपति अध्यादेश जरूर कानूनी रूप से ऐसा करने से रोकता है।
तो क्या प्रशांत किशोर को पता है कि रंगनाथ मिश्रा कमीशन की रिपोर्ट इस वक्त कहां है और किस हाल में है? क्या उन्हें जानकारी है कि साल 2009 के शीतकालीन सत्र में जब यह रिपोर्ट मीडिया में लीक हुई, तब जा कर मनमोहन सिंह सरकार ने इसे संसद के पटल पर रखा था? लेकिन, 16 साल बीत गए। क्या हुआ उस रिपोर्ट का। भाजपा का स्टैंड इस पर क्लियर है। लेकिन, कांग्रेस, राजद या नए रहनुमा प्रशांत किशोर का इस पर क्या स्टैंड है? क्या उनका स्टैंड जानने का अधिकार बिहार के मुसलमानों का नहीं है? आखिर वे आपकी किस बात पर भरोसा करें? आप भी तो उन्हें वोट बैंक (40 प्लस 20 फीसदी वाले समीकरण) के तौर पर ही देख रहे हैं।
प्रशांत किशोर का एक जवाब यह हो सकता है कि जैसे बिहार के सभी लोगों का विकास करेंगे, वैसे ही मुसलमानों का भी विकास करेंगे। अच्छी बात है। यह बात तो भाजपा भी कहती है कि सबका साथ, सबका विकास। फिर, अगर एक फॉर्मूले से ही सबका विकास हो जाता तो संविधान में आरक्षण की व्यवस्था ही क्यों करने पड़ती? अन्य कमजोर वर्गों के लिए विशेष प्रावधान क्यों करने पड़ते? यह तो संविधान में साफ-साफ लिखा है कि विकास की दौड़ में जो वर्ग पीछे रह गए, उन्हें आगे लाने के लिए विशेष उपाय किए जाए, विशेष सुविधाएं दी जाए। आरक्षण लगभग इसी तर्ज पर काम करता है। और जब प्रशांत किशोर खुद यह मानते है कि दलितों के बाद सबसे बदतर स्थिति (शैक्षणिक-आर्थिक) मुसलमानों की है, तो फिर आप उनके लिए क्या विशेष उपाय करेंगे? उन्हें क्या विशेष सुविधाएं देंगे? आप इस पर बात नहीं करते। आप सिर्फ 40 प्लस 20 फीसदी का समीकरण बनाने के लोभ में हैं। ऐसे में बिहार का मुसलमान, आखिर आप पर क्यों भरोसा करें?

