Sunday, January 23, 2022
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अमरता का पात्र

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एक बार धर्मशास्त्रों की शिक्षा देने वाला एक विद्वान ईसा मसीह के पास आया। उसने ईसा मसीह से पूछा, ‘मेरी इच्छा है कि मैं अमर हो जाऊं। अमरता प्राप्त करने के लिए मुझे क्या करना होगा?’ ईसा मसीह ने जवाब दिया, ‘इस पर धर्मशास्त्र क्या कहते हैं?’ व्यक्ति ने जवाब दिया, ‘वे कहते हैं कि हमें ईश्वर को संपूर्ण हृदय से प्रेम करना चाहिए। अपने पड़ोसी और इष्ट मित्रों को भी ईश्वर से जोड़ देना चाहिए।’ ईसा ने कहा, ‘बिल्कुल ठीक। तुम इसी पर अमल करते रहो।’ विद्वान ने तब जिज्ञासा व्यक्त की, ‘किंतु मेरा पड़ोसी कौन है?’ ईसा मसीह बोले, ‘सुनो, यरुशलम का एक व्यक्ति कहीं दूर यात्रा पर जा रहा था। रास्ते में उसे कुछ चोर मिल गए। उन्होंने उसे मारा पीटा और अधमरा करके चले गए। संयोगवश उधर से एक पादरी आया। उसने उस व्यक्ति को वहां पड़े देखा पर चला गया। फिर एक छोटा पादरी आया और वह भी उसे देखकर चलता बना। कुछ देर बाद एक यात्री वहां से निकला। उसने घायल की मरहमपट्टी की। उसे कंधे पर उठाकर एक धर्मशाला पहुंचाया और उसकी सेवा की। दूसरे दिन जब वह जाने लगा, तो धर्मशाला वालों से उस व्यक्ति का समुचित ध्यान रखने और उसके उपचार का व्यय स्वयं वहन करने की बात कहकर चला गया। अब कहों इन तीनों में से उस घायल का सच्चा पड़ोसी कौन हुआ?’ विद्वान बोला, ‘वह अपरिचित यात्री, जिसने उस पर दया दिखाई।’ तब ईसा ने कहा, ‘तो बस तुम भी ऐसा ही आचरण करो, वैसे ही बनो। सभी के प्रति प्रेम, दया व सहयोग भाव रखना मानवता की पहचान है और ऐसा करने वाला सच्चे अर्थों में अमरता का पात्र बनता है।’ हमारे सभी धार्मिक ग्रंथ मानव से ही नहीं, पूरी सृष्टि से प्रेम करना सिखाते हैं। दुख की बात है कि हम दूसरे धर्म के लोगों के प्रति तो क्या, अपने ही लोगों के प्रति दया नहीं दिखाते।


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