
देश की दूसरी महिला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का चुनाव कई तरह से चर्चा में बना हुआ है। पहले तो एनडीए ने उन्हें एक आदिवासी उम्मीदवार के रूप में बहु प्रचारित करने की रणनीति बनाई जबकि पूर्व में भी पीए संगमा और अल्फ्रेड स्वेल आदिवासी समाज से राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ चुके थे। सामान्यता राष्ट्रपति का पद उनके व्यक्तित्व, समाज में उनके योगदान और उनकी निर्विवाद सेवाओं को लेकर जाने जाते हैं। जाति के आधार पर कभी भी न तो राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों को प्रचारित किया गया न ही इस आधार पर उन्हें महिमामंडित करने की कोशिश की गई। वे देश के संविधान के सबसे बड़े रक्षक के रूप में ही चुने जाते हैं। देश तो हर जाति, हर धर्म और हर समाज का है, इसलिए वे भारत के हर नागरिक के पालक के रूप में ही जाने जाते हैं।
अगर कोई राजनीतिक दल ऐसे पदों को एक जाति की सीमाओं में बांधने की चेष्टा करते है, तो क्या इसे राष्ट्रपति पद की गरिमा को क्षति पहुंचाना नहीं माना जाना चाहिए? क्या हमने बाबू राजेंद्र प्रसाद को इसलिए राष्ट्रपति चुना कि वे कायस्थ थे या केआर नारायणन दलित, एपीजे अब्दुल कलाम अल्पसंख्यक या प्रणव मुखर्जी ब्राह्मण थे, शायद नहीं। यह सब अपने अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ व्यक्ति थे। देश के प्रति इनकी सेवाएं उत्कृष्ट थीं। इन्हीं उत्कृष्ट सेवाओं के लिए हमें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भी याद करना चाहिए ना कि उनके जाति वर्ग के कारण। वे अब एक वर्ग की नहीं बल्कि पूरे भारत का गौरव हैं।
देश में विभिन्न अवसरों पर हुए राष्ट्रपति पद के हर चुनाव किसी न किसी कारण से चर्चित रहे है। 1969 का चुनाव त्रिकोणी होने के कारण सबसे कम मतों से जीतने वाला चुनाव बना। इसमें इंदिरा गांधी द्वारा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में वीवी गिरी को 48 प्रतिशत वोट मिले थे और वह अपने निकटतम प्रतिद्वंदी नीलम संजीव रेड्डी से लगभग 90 हजार मतों से ही चुनाव जीत सके थे। यह पहला चुनाव था जब अंतरात्मा की आवाज पर वोट डालने का आव्हान किया गया था और एक श्रमिक नेता वीवी गिरी राष्ट्रपति चुने गए।
देश में सर्वाधिक मतों से चुनाव जीतने वाले राष्ट्रपति के रूप में केआर नारायणन का चुनाव सबसे चर्चित रहा है। इसमें नारायणन ने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी टीएन शेषन को लगभग 9 लाख 5 हजार मतों से परास्त किया था। मत प्रतिशत के हिसाब से बाबू राजेंद्र प्रसाद एक मात्र राष्ट्रपति रहे जिन्हें कुल मतों का 99 प्रतिशत मत प्राप्त हुए, दूसरे नंबर पर एस राधाकृष्णन जिन्हें 98 प्रतिशत, केआर नारायणन जिन्हें 95 प्रतिशत और एपीजे अब्दुल कलाम जिन्हें 90 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे। अगर भारतीय जनता पार्टी के द्वारा बनाए गए एनडीए उम्मीदवारों के मतों की तुलना करें तो श्रीमती द्रौपदी मुर्मू को अपने ही पार्टी के पूर्व राष्ट्रपति कोविंद के मुकाबले 2 प्रतिशत कम वोट प्राप्त हुए हैं। कोविंद को कुल मतों का 66 प्रतिशत जबकि श्रीमती द्रौपदी मुर्मू को 64 प्रतिशत मत प्राप्त हुए हैं। भारतीय जनता पार्टी ने इस चुनाव को एक और दृष्टि से चर्चित बनाने की चेष्टा की है वह है प्रतिपक्ष की क्रॉस वोटिंग को लेकर। जबकि राष्ट्रपति पद के कई चुनाव में क्रॉस वोटिंग होती रही है।
स्वयं भारतीय जनता पार्टी शिवसेना और अन्य दल भी समय-समय पर क्रॉस वोटिंग कर चुके हैं। श्रीमती पाटिल के चुनाव में शिवसेना ने गठबंधन की सीमाओं से बाहर आकर पाटिल के पक्ष में मतदान किया था। हालांकि इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता भैरोंसिंह शेखावत चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन इसके बावजूद गुजरात में 5 विधायकों ने प्रतिभा पाटिल के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की थी। इसी तरह 2012 में जब प्रणव मुखर्जी के विरुद्ध पीए संगमा एनडीए के उम्मीदवार थे, तब कर्नाटक में 14 विधायकों ने मुखर्जी के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की थी। इसी तरह 2017 में मीरा कुमार ने श्री कोविद के विरुद्ध प्रतिपक्ष यूपीए के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था।
इस चुनाव में भी एनडीए के उम्मीदवार कोविंद के विरुद्ध गुजरात के एक, गोवा के 3 और राजस्थान के 6 विधायकों ने मीरा कुमार के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की थी। इसी तरह 2002 में एपीजे अब्दुल कलाम सर्व सम्मत उम्मीदवार के रूप में सामने आए थे, किंतु वामपंथी पार्टियों ने क्रांतिकारी और आजाद हिंद फौज की महिला कमांडर लक्ष्मी सहगल को उनके विरुद्ध उतार दिया था। इस चुनाव में मध्य प्रदेश के 11 मत रद्द हुए थे और दो मत क्रॉस वोट हुए थे। चूंकि राष्ट्रपति पद का चुनाव गुप्त मतदान के माध्यम से किया जाता है एवं इस चुनाव में कोई भी दल व्हिप जारी नहीं करता है, इसलिए क्रॉस वोटिंग का मामला पार्टी अनुशासन के दायरे में नहीं आता है। ऐसा इसलिए भी सोचा गया होगा ताकि राष्ट्रपति पद का चुनाव निर्विवाद रहे और उसे पार्टी की सीमाओं में ना बांधा जाए।
1977 का राष्ट्रपति पद का चुनाव भी कम चर्चित नहीं रहा। यह चुनाव तत्कालीन राष्ट्रपति जाकिर हुसैन की मृत्यू के कारण बचे हुए कार्यकाल के लिए हुआ था। हालांकि यह पूर्णकालिक चुनाव तो नहीं था, किंतु इस चुनाव में 37 उम्मीदवारों ने अपने पर्चे दाखिल किए थे और 36 उम्मीदवारों के नामांकन रद्द हो जाने के कारण नीलम संजीव रेड्डी निर्विरोध राष्ट्रपति के रूप में चुने गए। वे देश के ऐसे एकमात्र राष्ट्रपति थे। इसी तरह बाबू राजेंद्र प्रसाद दो बार राष्ट्रपति पद को सुशोभित करने करने वाले एकमात्र राष्ट्रपति रहे।
महामहिम द्रोपदी मुर्मू अब देश की शोभा हैं, उनके संघर्ष और जिजीविषा को याद रखने का यह समय है न कि उनकी जाति को। उम्मीद की जानी चाहिए कि द्रौपदी मुर्मू किसी दल विशेष की विचारधारा की न होकर पूरे देश की राष्ट्रपति सिद्ध होंगी।


