अपने बच्चों पर नजर रखने के लिए मां-बाप के पास ऐसे कई उपाय उपलब्ध हैं, जो बच्चों को परेशान करने वाले या अनुचित कंटेंट को ब्लॉक कर देते हैं। लेकिन, अध्ययन ये बताते हैं कि अक्सर अभिभावक इनका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर नहीं करते हैं।
आज बच्चे पहले के मुकाबले कम उम्र में इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं और दुनिया में हर आधे सेकेंड में एक बच्चा ऑनलाइन होता है। ऐसे में जानकार चेतावनी दे रहे हैं कि ऑनलाइन दुनिया तक बच्चों की बढ़ती पहुंच से उनके लिए गंभीर खतरे भी पैदा हो रहे हैं। वेस्टर्न सिडनी यूनिवर्सिटी के यंग एंड रेजिलिएंट सेंटर ने इस बारे में हाल ही में एक स्टडी की है। इससे पता चला है कि कम आमदनी वाले परिवारों के बच्चे तो खास तौर से अनजान लोगों से अनुचित या गैर-जरूरी रिक्वेस्ट ब्लॉक नहीं करते हैं। इस अध्ययन में पाया गया था कि ऐसे लोगों की शिकायत न करने या ब्लॉक नहीं करने की वजह से बच्चे भविष्य में खुद को अनचाहे संपर्क के कहीं ज्यादा बड़े जोखिम में डाल देते हैं।
आप ऑनलाइन दुनिया में अपने बच्चों को कैसे महफूज रख सकते हैं और बच्चों के लिए इंटरनेट की दुनिया ज्यादा सुरक्षित बनाने के लिए दुनिया भर की सरकारें और तकनीकी कंपनियां क्या कर रही हैं? आंकड़े दिखाते हैं कि दुनिया में कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने में कम उम्र वालों का सबसे ज्यादा योगदान है। 2023 में दुनिया भर में 15 से 24 साल के 79 प्रतिशत लोग आॅनलाइन हो रहे थे, जो बाकी आबादी से 65 प्रतिशत ज्यादा है। बच्चों के लिए संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ के एक अध्ययन के मुताबिक- 30 देशों में एक तिहाई से ज्यादा बच्चों को साइबर दुनिया में दादागीरी और धमकियों का सामना करना पड़ता है। इसकी वजह से लगभग 20 प्रतिशत बच्चे स्कूल जाना बंद कर देते हैं। हेट स्पीच, हिंसक कंटेंट और उग्रवादी संगठनों में भर्ती भी चिंता के विषय हैं। इसके साथ साथ गलत जानकारी या फिर साजिश की मनगढ़ंत कहानियां भी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बहुत चलती हैं। हालांकि, यूनिसेफ का कहना है, ऑनलाइन दुनिया में बच्चों को सबसे ज्यादा खतरा यौन शोषण और बुरे बर्ताव से है। आजकल बच्चों मे सेल्फी और सोशल मीडिया पर फोटो-वीडियो पोस्ट करने के क्रेज में बुरी तरह फंसते जा रहे हैं। यह सिर्फ एक शौक नहीं, बल्कि एक बीमारी का रूप ले रहा है।
बच्चे अपनी असल दुनिया के साथ-साथ एक वर्चुअल दुनिया में जी रहे हैं। उन्हें लगता है कि अगर वे भीड़ से अलग नहीं दिखेंगे, तो उनके दोस्त कम बनेंगे या लोग उनके बारे में बुरा सोचेंगे। इसी वजह से वे वास्तविक दुनिया से दूर होते जा रहे हैं। यह पीयर प्रेशर इतना बढ़ गया है कि अब रोजाना 4-5 ऐसे मामले सामने आ रहे हैं। इस बढ़ते चलन को समझना और बच्चों को इससे बाहर निकालना जरूरी है।
बच्चे सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेम्स की वर्चुअल दुनिया में इतनी तेजी से खो रहे हैं कि उनके लिए लाइक, कमेंट्स और वर्चुअल पहचान ही सब कुछ बन गई है। यह उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल रहा है। अगर आपका बच्चा भी इस समस्या से जूझ रहा है, तो उसे इस वर्चुअल दुनिया से बाहर निकालने के लिए कुछ प्रभावी तरीके अपनाए जा सकते हैं।
ल्ल अपने बच्चे के लिए स्क्रीन टाइम की सीमा निर्धारित करें। इसके लिए टाइमर या ऐप का उपयोग कर सकते हैं। घर में नो-स्क्रीन जोन जैसे बेडरूम, डाइनिंग टेबल आदि बनाए। यहां गैजेट्स की अनुमति न हो। डिनर या बातचीत के दौरान गैजेट्स को दूर रखकर पारिवारिक समय को प्राथमिकता दें।
ल्ल बच्चे बड़ों को देखकर सीखते हैं, इसलिए अपना स्क्रीन टाइम भी कम करें। गैजेट्स से दूर रहकर बच्चों के साथ बोर्ड गेम्स खेलें, किताबें पढ़ें, पार्क जाएं या कोई नई हॉबी सीखें।
ल्ल अपने बच्चे को पेंटिंग, म्यूजिक, डांस, खेल-कूद या गार्डनिंग जैसी नई हॉबीज में शामिल करें। उन्हें दोस्तों के साथ बाहर खेलने के लिए प्रोत्साहित करें और प्रकृति से जोड़ें। खासकर पार्क में खेलना सुनिश्चित करें।
ल्ल समझने की कोशिश करें कि बच्चे आॅनलाइन दुनिया में इतना समय क्यों बिता रहे हैं। उन्हें साइबरबुलिंग और आॅनलाइन खतरों के बारे में बताएं। नियमों को थोपने के बजाय, उन्हें
ल्ल अगर बच्चा किसी भी तरह से गैजेट्स से दूर नहीं रह पा रहा और स्थिति गंभीर लगती है तो किसी बाल मनोवैज्ञानिक या काउंसलर से मदद लेने पर विचार करें। वे सही दिशा-निर्देश दे सकते हैं।
ल्ल ब्रिटेन की बच्चों की कल्याणकारी संस्था एनएसपीसीसी के मुताबिक, बच्चों से आॅनलाइन सेफ्टी के बारे में बात करना और उनकी आॅनलाइन गतिविधियों में दिलचस्पी रखना भी काफी अहम है। ये संस्था मां-बाप को सुझाव देती है कि वो इन मुद्दों पर बातचीत को अपने बच्चों के साथ रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बनाएं। ठीक उसी तरह जैसे वो बच्चों से स्कूल में बिताए गए वक़्त के बारे में बातें करते हैं. इससे बच्चों के लिए अपनी चिंताएं, मां बाप से बता पाना और आसान हो जाएगा।
ल्ल अपने बच्चों पर नजर रखने के लिए मां-बाप के पास ऐसे कई उपाय उपलब्ध हैं, जो बच्चों को परेशान करने वाले या अनुचित कंटेंट को ब्लॉक कर देते हैं। लेकिन, अध्ययन ये बताते हैं कि अक्सर अभिभावक इनका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर नहीं करते हैं।

