Sunday, March 29, 2026
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मन की शुद्धता

Amritvani 21


एक स्वामी जी भिक्षा मांगते हुए एक घर के सामने खड़े हुए और उन्होंने आवाज लगाई, भीक्षा दे दो माते!! घर से महिला बाहर आई। उसने उनकी झोली मे भिक्षा डाली और कहा, महात्माजी, कोई उपदेश दीजिए! स्वामीजी बोले, आज नहीं, कल दूंगा। महिला मन में बुरा विचार आया की महात्मा जी को धर्म शास्त्रों का ज्ञान ही नही है तभी उपदेश कल देने का बहाना बना रहे हैं। दूसरे दिन स्वामीजी ने पुन: उस घर के सामने आवाज दी, भीक्षा दे दो माते!! उस घर की स्त्री ने उस दिन खीर बनाई थी, जिसमे बादाम- पिस्ते भी डाले थे, वह खीर का कटोरा लेकर बाहर आई। स्वामी जी ने अपना कमंडल आगे कर दिया। वह स्त्री जब खीर डालने लगी, तो उसने देखा कि कमंडल में कूड़ा भरा पड़ा है। उसके हाथ ठिठक गए।

वह बोली, महाराज! यह कमंडल तो गंदा है। स्वामीजी बोले, हां गंदा तो है, किंतु खीर इसमें ही डाल दो। स्त्री बोली, नहीं महाराज, तब तो खीर खराब हो जाएगी। दीजिये कमंडल, मैं इसे शुद्ध कर लाती हूं। स्वामीजी बोले, मतलब जब यह कमंडल साफ हो जाएगा, तभी खीर डालोगी? स्त्री ने कहा : जी महाराज! स्वामीजी बोले, माते…मेरा उपदेश भी यही है। मन में जब तक निम्न विचारों का समावेश रहे या बुरे संस्कार रूपी कूड़े से भरा रहे, तब तक अमृत रूपी उपदेश का कोई लाभ नहीं होता। अत: माते यदि अमृत उपदेश पान करना है, तो प्रथम अपने मन को शुद्ध करना चाहिए, कुसंस्कारों का त्याग करना चाहिए, तभी सच्चे सुख और आनन्द की प्राप्ति होगी।
 -प्रस्तुति : राजेंद्र कुमार शर्मा


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