Monday, May 27, 2024
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जन प्रतिनिधियों के भूमिका पर उठते सवाल

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Nazariya 22


MA KANWAL JAZARIसंसद में नकदी या उपहार लेकर सवाल पूछने के आरोप में तृणमूल कांग्रेस की तेज तर्रार नेता एवं सांसद महुआ मोइत्रा की सदस्यता समाप्त हो गई। संसदीय आचार समिति की सिफारिश पर यह कदम उठाया गया। 500 पृष्ठों की रिपोर्ट में समिति के अध्यक्ष विजय सोनकर ने महुआ की सदस्यता निलंबित कर कानूनी जांच की सिफारिश की है। संसदीय कार्रवाई के दौरान स्पीकर ओम बिरला ने बहस के लिए आधे घंटे का समय दिया। विपक्ष ने रिपोर्ट के अध्ययन एवं बहस के लिए तीन-चार दिन का समय मांगा। उन्होंने महुआ को संसद में अपना पक्ष रखने की अनुमति देने की मांग की, लेकिन इसे यह कहकर नामंजूर कर दिया कि उन्हें आचार समिति के समक्ष अपनी बात रखने का अवसर पहले ही मिल चुका है। संसद के पहले अध्यक्षों ने आरोपियों को सदन में बोलने की अनुमति नहीं दी। वह इन्हें कानून मानते हैं तथा नई परंपरा स्थापित नहीं करेंगे। संसदीय मामलों के मंत्री प्रहलाद जोशी ने महुआ मोइत्रा की सदस्यता समाप्त करने का प्रस्ताव पेश किया। अध्यक्ष ने महुआ मोइत्रा के आचरण को अमर्यादित और असंसदीय बताते हुए उनके सांसद बने रहने को अनुचित ठहराया। बर्खास्त करने का प्रस्ताव पारित होने के बाद मतदान हुआ। 21 जून, 2019 को संसद में नमो टीवी बंद की मांग करने वाली 49 वर्षीय महुआ मोइत्रा संसद में फासीवाद के विरुद्ध जबरदस्त भाषण देने के बाद सुर्खियों में आर्इं थीं। उन पर पैसा लेकर अडानी और उनके समूह की कंपनियों को निशाना बनाते हुए सदन में लगातार प्रश्न पूछने का आरोप है। महुआ मोइत्रा के पूर्व व्यवसायिक पार्टनर और सर्वोच्च न्यायालय के वकील जे अनंत देहा दुराई ने उन पर नकदी लेकर संसद में प्रश्न मालूम करने का आरोप लगाते हुए सीबीआई के महानिदेशक को कई सप्रमाण चिट्ठी लिखी थी। इसी शिकायत के आधार पर भाजपा सांसद निशीकांत दुबे ने 15 अक्तूबर को स्पीकर को पत्र लिखकर रियल एस्टेट समूह हीरानंदानी ग्रुप के अरबपति व्यावसायिक और सीईओ दर्शन हीरानंदानी से नकदी और कीमती उपहार लेकर संसद में सवाल पूछने, और उनके व्यावसायिक हितों को लाभ पहुंचाने की आपराधिक साजिश रचने का आरोप लगाया। ओम बिरला ने प्रकरण को संसदीय आचार समिति के पास भेज दिया, जिसने सदस्यता समाप्त करने की सिफारिश की। महुआ मोइत्रा ने आरापों को निराधार बताया और कहा कि धन या तोहफे लेने का कोई प्रमाण नहीं है। समिति ने प्रकरण की जांच की तह तक पहुंचे बिना सदस्यता समाप्त करने की सिफारिश की, जबकि उसे यह अधिकार है ही नहीं। सदस्यता निरस्त करने का दारोमदार उनके संसदीय पोर्टल लॉगइन शेयर करने पर है, जबकि लॉग इन शेयर को लेकर कोई कानून नहीं है।

संसदीय सदस्यता रद्द होने का यह पहला मामला नहीं है। करीब 72 वर्ष पहले 1951 में प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की प्रोविजिनल सरकार के कांग्रेसी नेता एचजी मुदगल पर बंबई की बुलियन ऐसोेसिएशन से 5,000 रुपये और उपहार लेकर सवाल पूछने का आरोप लगा था। आठ जून 1951 को टीटी कृष्णा मचारी के नेतृत्व में प्रो. केटी शाह, काशीनाथ राव वैद्य, जी दुर्गा बाई और सैयद नौशेर अली पर आधारित पांच सदस्यीय विशेष जांच समिति का गठन किया गया। समिति ने अगस्त 1951 में प्रस्तुत 387 पृष्ठों की रिपोर्ट में आरोपों को सही बताया। संसद में बहस के बाद मतदान हुआ, लेकिन एचजी मुदगल ने पहले ही त्यागपत्र दे दिया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यूपीए-1 सरकार में 12 सितंबर 2005 को स्टिंग आपरेशन में लोकसभा के 10 और राज्यसभा के एक सदस्य पर प्रश्न पूछने के लिए पैसे लेने का आरोप लगा। 24 दिसंबर 2005 को मतदान के द्वारा बीजेपी के वाई जी महाजन, छत्रपाल सिंह लोढा, अन्ना साहेब एमके पाटिल, चंद्र प्रताप सिंह, प्रदीप गांधी, सुरेश चंदेल, बसपा के नरेंद्र कुशवाहा, लालचंद कौल और राजा रामपाल सिंह, राजद के मनोज कार और कांग्रेस के राम सेवक सिंह की लोकसभा की सदस्यता समाप्त की गई। इनमें राज्यसभा सदस्य छत्रपाल सिंह लोढा भी थे। रिश्वत की रकम 15 हजार से 10.1 लाख रुपये के मध्य थी। स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने आरोपियों को संसद में अपना पक्ष रखने की अनुमति नहीं दी। बीजेपी ने मतदान का बहिष्कार किया। जनवरी 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने भी सांसदों की बर्खास्तगी को उचित ठहराया। संसद के विशेष सत्र में भाजपा के सांसद रमेश विधूड़ी की ओर से बसपा के सांसद दानिश अली पर सांप्रदायिक टिप्पणियों का मुद्दा अभी भी लंबित है। इस पर एथिक्स कमेटी के सदस्य दानिश अली ने कहा कि महुआ मोइत्रा को लेकर एथिक्स कमेटी बुलट टेन की रफ्तार से कार्य कर रही है, लेकिन इससे पहले के मामले पर गाड़ी आगे नहीं बढ़ रही है। आरोप लगाया कि शपथ पत्र देने वाले दर्शन हीरानंदानी से भी पूछताछ नहीं की गयी।

विकासशील से विकसित की ओर तेजी से बढ़ रहे देश के लिए यह कतई आवश्यक नहीं है कि 1951 का कानून 2023 में भी लागू किया जाए। कोई भी कानून आखिरी नहीं होता। उसमें बदलाव की गुंजाइश बनी रहती है। सदन से बर्खास्तगी को भी इसी नजरिये से देखा जा सकता है। यदि पहले के स्पीकरों ने भ्रष्टाचार के आरोपियों को सदन में अपना पक्ष रखने की अनुमति नहीं दी, तो इसे नजीर बनाकर प्रस्तुत करने की बजाय बहस के दौरान उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर देने से आचार समिति की सिफारिश, संसद के निर्णय और स्पीकर की घोषणा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।


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