Friday, May 31, 2024
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सौर ऊर्जा में भारत के बढ़ते कदम

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AMIT BAIJNATH GARGहाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुबई में आयोजित कॉप-28 सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन के साथ भारत के एनर्जी सेक्टर पर भी बात की। इसके बाद यह क्षेत्र एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया। गौरतलब है कि भारत ने साल 2030 तक एनर्जी सेक्टर में आत्मनिर्भर बनने के लिए हाल ही में अगले पांच साल के लिए नई योजना तैयार की है। इसी योजना के बलबूते आगे चलकर भारत 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली का लक्ष्य हासिल कर पाएगा। इसी क्रम में मोदी सरकार अगले पांच साल के लिए सालाना 50 गीगावाट अक्षय ऊर्जा क्षमता के लिए बोलियां आमंत्रित कर चुकी है। इतना ही नहीं, इंटर-स्टेट ट्रांसमिशन (आईएसटीएस) से जुड़ी अक्षय ऊर्जा क्षमता की इन सालाना बोलियों में प्रतिवर्ष कम से कम 10 गीगावाट की पवन ऊर्जा क्षमता की स्थापना भी शामिल होगी। गौरतलब है कि साल 2030 तक गैर-जीवाश्म र्इंधन स्रोतों से 500 गीगावाट स्थापित बिजली क्षमता प्राप्त करने के लिए कॉप-26 में प्रधानमंत्री की घोषणा के अनुसार बोलियां आमंत्रित की गई थी। सरकार की ओर से अल्पकालिक और दीर्घकालिक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता वृद्धि के लिहाज से एवं 2030 तक गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता के 500 गीगावाट के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में यह घोषणा महत्वपूर्ण मानी जा रही है। दुनिया में भारत एनर्जी ट्रांजिशन में ग्लोबल लीडर के रूप में उभर रहा है। यह उस विकास से स्पष्ट है, जो हमने अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में हासिल किया है। अक्षय ऊर्जा क्षेत्र यानी रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर रोजगार उत्पादन की दृष्टि से भी उम्मीदें बंधाता हुआ नजर आ रहा है। पूरी दुनिया जहां जलवायु परिवर्तन के खतरे को रोकने के लिए इस क्षेत्र को विकसित करने में जुटी है, वहीं भारत जैसे विकासशील देश ने इस स्रोत के विकास में अच्छी सफलता हासिल की है। पिछले दस सालों में देश ने अक्षय ऊर्जा उत्पादन की अपनी क्षमता में पांच गुना बढ़ोतरी की है। इसके साथ ही 2030 तक के लिए ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में नए लक्ष्यों को भी तय किया है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, नए लक्ष्यों को पूरा करने में यदि सफलता मिलती है तो 2030 तक इस क्षेत्र में करीब 15 लाख नौकरियां पैदा होंगी। रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में रोजगार पैदा करने के लिहाज से चीन, ब्राजील और अमेरिका के बाद भारत दुनिया में चौथे नंबर पर है। पूरे विश्व में रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में नियुक्त लोगों का 5.7 प्रतिशत भारत में है। इंटरनेशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी (इरेना) की रिपोर्ट के अनुसार, 2014 तक रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर ने भारत में चार लाख नौकरियां उत्पन्न की थीं। असल में भारत में एनर्जी सेक्टर में आगे काफी ग्रोथ की संभावनाएं हैं और इस सेक्टर में जाने के लिए छात्रों को कुछ खास कोर्स करने की जरूरत पड़ेगी। एनर्जी सेक्टर में बीटेक पावर, एमबीए आॅयल एंड गैस, एमए एनर्जी इकोनॉमिक्स, सोलर एनर्जी आदि से जुड़े कई कोर्स होते हैं, लेकिन आने वाले समय में सबसे ज्यादा संभावनाएं सोलर एनर्जी में है, इसलिए छात्रों को इसी कोर्स का चुनाव करना चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को पांच ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनाने के लिए एनर्जी सेक्टर को रिवाइव करना बहुत जरूरी होगा।

वहीं निवेश की बात करें तो भारत के एनर्जी सेक्टर में साल 2000 से 2019 के बीच 14.32 अरब डॉलर का विदेशी निवेश आया है। सरकार इस सेक्टर पर खासा ध्यान दे रही है, जिसके कारण आने वाले समय में इस सेक्टर में निवेश और बढ़ेगा। इससे नौकरी की संभावनाएं भी बढ़ेंगी। 2022 तक भारत सरकार नवीकरणीय ऊर्जा (सोलर ऊर्जा, पवन ऊर्जा आदि) की क्षमता को बढ़ाकर 175 गीगावाट कर चुकी है। इसमें 100 गीगावाट सोलर पावर और 60 गीगावाट पवन ऊर्जा शामिल है। वहीं भारत की कोल आधारित क्षमता 2040 तक 191 गीगावाट से बढ़कर 400 गीगावाट होने की संभावना है। हालांकि भारत लंबे समय से ऊर्जा उत्पादन के लिए सबसे ज्यादा भरोसा कोयले पर करता आया है, लेकिन पिछले दशक के मध्य से इसमें ग्रीन एनर्जी की भागीदारी महत्वपूर्ण रही है।

तकनीकों में सुधार और सौर पैनलों की कीमतों में लगातार गिरावट के कारण लक्ष्यों को हासिल करने में मदद मिल रही है। देश में जहां 2010 में सौर ऊर्जा का टेंडर 12 रुपए प्रति किलोवाट था, वह साल 2020 में गिरकर दो रुपए प्रति किलोवाट पर आ गया। मौजूदा समय में यह बिजली उत्पादन का सबसे सस्ता तरीका है। यही वजह है कि न्यू पावर कैपेसिटी इंस्टॉल करने में सोलर एनर्जी को सबसे ज्यादा पसंद किया जा रहा है। साल 2022 में भारत में जोड़ी गई 92 फीसदी न्यू पावर अकेले सोलर और पवन आधारित थी। हरित ऊर्जा इस प्रकार देश में ऊर्जा का लगभग एकमात्र स्रोत बनता जा रहा है। भारत में बिजली की खपत बढ़ रही है और ग्रीन एनर्जी सबसे आकर्षक विकल्प है। निवेशक भी पैसा लगाने और रिटर्न पाने के लिए इस क्षेत्र की ओर देखने लगे हैं। मोदी सरकार का अनुमान है कि पिछले सात सालों में नवीकरणीय ऊर्जा में 70 बिलियन डॉलर (लगभग 5.6 लाख करोड़ रुपए) से अधिक का निवेश किया गया है। यह ऐसे समय में हुआ है, क्षेत्र अभी विस्तार की ओर बढ़ ही रहा है।

दुनिया भर के देशों का कोयला और अन्य जीवाश्म ईंधन को पीछे छोड़ ग्रीन एनर्जी की ओर आने और इसे समर्थन देने के लिए कई वजह हैं। भारत में सरकारों के मजबूत समर्थन की वजह से ग्रीन एनर्जी पसंदीदा विकल्प के रूप में उभर रहा है। देसी और विदेशी कंपनियों की तरफ से उपलब्ध फंडिंग को देखते हुए देश में ग्रीन एनर्जी क्षेत्र में निवेश की अपार संभावनाएं हैं। जिस तरह से एनर्जी ट्रांजिशन यानी ऊर्जा संक्रमण की गति बढ़ रही है, उसे देखते हुए आने वाले समय में पूंजी प्रवाह में वृद्धि नजर आएगी। भारतीय ग्रीन एनर्जी सेक्टर में विदेशी निवेश 2014 से लगातार 500 मिलियन डॉलर (4,100 करोड़ रुपए) से ऊपर रहा था, लेकिन 2017 के बाद हर साल एक बिलियन डॉलर (8,200 करोड़ रुपए) के आंकड़े को पार कर रहा है। वहीं दुनिया भर के पूंजी बाजार विनियामक कारणों के साथ-साथ लंबी अवधि के रिटर्न के चलते ज्यादा से ज्यादा ग्रीन टेक्नोलॉजी में फंडिंग की ओर अपने कदम बढ़ा रहे हैं। इसका अर्थ है कि उपलब्ध पूंजी को ग्रीन एनर्जी में निवेश करने के जोखिमों में कमी आई है।

एक पहलू यह भी है कि मौजूदा समय में भारत की ऊर्जा पर निर्भरता दूसरे देशों पर काफी ज्यादा है। देश को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई पहल की जा रही हैं। इसी क्रम में नवीकरणीय ऊर्जा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है, जिसके लिए सोलर एनर्जी के क्षेत्र में सरकार की ओर से काफी काम किया जा रहा है। 2040 तक भारत की ओर से 15,820 टेरावाट आवर बिजली का उत्पादन नवीकरणीय स्रोत से करने का भी लक्ष्य रखा गया है। देश के इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए विभिन्न कंपनियां सोलर एनर्जी की तरफ तेजी से काम कर रही हैं। इसकी वजह से इस सेक्टर की कंपनियों में अभी भी अच्छी ग्रोथ देखने को मिल रही है। आने वाले समय में इन कंपनियों की ग्रोथ और तेज होने के साथ भारत एनर्जी सेक्टर के सभी लक्ष्यों को सफलतापूर्वक हासिल कर लेगा।


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