Sunday, April 12, 2026
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सामयिक: राजीव गांधी का राष्ट्रवाद


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रामेश्वरम मिश्रा
लेखन कला में तारीख का अपना महत्वपूर्ण स्थान है। किसी तारीख का महत्व तब और अधिक बढ़ जाता है, जब वह किसी घटना या किसी महत्वपूर्ण व्यक्तित्व से जुड़ जाती है। 20 अगस्त 1944 की तारीख  का एक विशेष स्थान प्राप्त है, क्योंकि इसी दिन भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का जन्म हुआ था, जिन्हें स्वतंत्र भारत का सबसे युवा प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ नए भारत का निर्माता होने का गौरव प्राप्त है। उन्होंने राष्ट्र के विकास के लिए अनेक योजनाओं एवं नीतियों को कार्यान्वित किया जो उनके राष्ट्रवाद का प्रतिफल थीं। आज जब बदलते दौर में देश में राष्ट्रवाद जैसे गंभीर विषय पर बड़े जोर-शोर से चर्चा हो रही है। 50 वर्षों तक देश की सेवा करने वाली एवं स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष में प्रमुखता से योगदान देने वाली कांग्रेस पार्टी को देशद्रोही कहने में कोई संकोच नहीं किया जाता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि बतौर कांग्रेस पार्टी के सदस्य पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के राष्ट्रवाद के संबंध क्या विचार थे? इस समय राजीव गांधी के राष्ट्रवाद का अवलोकन विषय को इसलिए भी महत्वपूर्ण बनता है क्योंकि आज पूरा देश उनका 76 वां जन्मदिन मना रहा है। ऐसे समय में राजीव गांधी के विचारों की प्रासंगिकता महत्वपूर्ण जान पड़ती है।
राजीव गांधी के विचारों एवं कार्यों का मूल्यांकन करने से स्पष्ट होता है कि उन्होंने कभी राष्ट्रवाद को उग्र राष्ट्रवाद से नहीं जोड़ा। वे हमेशा से मानवीय सेवा, मानवीय मूल्यों से सिंचित विकास, देश सेवा, गरीबी उन्मूलन, आत्मनिर्भर राष्ट्र, बेरोजगारी उन्मूलन, शिक्षा से राष्ट्र की एकता को जोड़ने तथा महिला अधिकारों के हिमायती थे। उन्होंने हमेशा एक सशक्त एवं स्वस्थ्य राष्ट्र निर्माण की दिशा में कार्य किया। उन्होंने 1986 में संसद में में कहा कि धर्मनिरपेक्षता राष्ट्र को जोड़ने का कार्य करती है। इसी संकल्पना के साथ हमेशा देश की एकता और अखंडता के लिए कार्य किया। उनका राष्ट्रवाद हमेशा खुशहाल एवं समृद्ध भारत में निहित था। राजीव गांधी ने सशक्त राष्ट्र के लिए सर्वप्रथम गरीबी उन्मूलन के लिए कार्य किया। राजीव गांधी जानते थे कि भारत कृषि प्रधान देश है और अगर हमारे किसान उन्नत अवस्था में नही  होंगे तो आर्थिक विकास पूर्ण नहीं होगा।
देश के किसानों के विषय में उनका विचार था कि यदि किसान कमजोर हो जाते हैं तो राष्ट्र आत्मनिर्भरता खो देता है, अगर वे मजबूत हैं तो देश की स्वतंत्रता भी मजबूत हो जाती है। अगर हम कृषि की प्रगति को बरकरार नही रख पाए तो देश से गरीबी नहीं मिटा पाएंगे। अत: हमारा सबसे बड़ा कार्यक्रम गरीबी उन्मूलन होगा जो हमारे किसानों के जीवन स्तर में सुधर लाएगा। राजीव गांधी का गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम का मकसद किसानों का उत्थान करना था। उन्होंने इस संबंध में केवल विचार ही व्यक्त नहीं किए वरन किसानों की स्थिति में सुधार के लिए कई योजनाएं प्रारम्भ किए, जिसमे 1985-86  में ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई व्यवस्था के लिए दस लाख कुओं के निर्माण के लिए एमसीएस योजना प्रारम्भ की। 1988 में ही खाद्य प्रसंस्करण योजना प्रारम्भ की गई जिसका उद्देश्य कृषि क्षेत्र में रोजगार सृजित करना एवं खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा देना था।
आज के हालात में बढ़ते मतभेदों के चलते हो रहे आपसी संघर्षों के विषय में राजीव गांधी के विचार ज्यादा प्रासंगिक जान पड़ते हैं। उन्होंने हमेशा देशवासियों से यह अपील की कि हमें यह समझना चाहिए कि जहां कहीं भी आंतरिक झगड़े और देश में आपसी संघर्ष हुआ है, वह देश कमजोर हो गया है और देश को ऐसी कमजोरी के कारण भारी कीमत चुकानी पड़ती है। उनके विचार आज के बदलते दौर में अति प्रेरणादायक हैं। इन्ही विचारों को आत्मसात करते हुए उन्होंने हमेशा राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता पर कार्य किया, जिसके लिए उन्होंने शिक्षा को राष्ट्रीय एकता से जोड़ने का माध्यम चुना।
सन 1986  में नई शिक्षा नीति के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में आवासीय विद्यालयों की स्थापना की, जिन्हें जवाहर नवोदय विद्यालय कहा जाता है। इस शिक्षा प्रणाली का लक्ष्य ग्रामीण प्रतिभाओं को आगे लाना एवं राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना था। ये नवोदय विद्यालय प्रवास योजना के माध्यम से राष्ट्रीय एकीकरण के मूल्यों को विकसित करने का लक्ष्य रखते हैं। प्रवासन हिंदी भाषी और गैर हिंदी भाषी जिलों के बीच छात्रों का एक अंतर-क्षेत्रीय शैक्षणिक, भाषायी और सांस्कृतिक आदान-प्रदान है जो विविधता में एकता की भावना को विकसित करने का माध्यम है।
राष्ट्र की एकता को जोड़ने का एक माध्यम राजीव गांधी महिलाओं को मानते थे। महिलाओं के संदर्भ में उनका विचार था कि महिलाएं सामाजिक चेतना होती हैं। वे हमारे समाज को एक साथ जोड़कर रखती हैं। उन्होंने महिलाओं के विकास के लिए पंचायतों और स्थानीय निकायों में 33 प्रतिशत का आरक्षण सुनिश्चित किया, जिसका परिणाम यह हुआ कि महिलाओं की दयनीय स्थिति और महिलाओं के प्रति समाज की नकारात्मक सोच पर विराम लगाया जा सका।
राजीव गांधी का राष्ट्रवाद देश सेवा और मानव सेवा से सिंचित था, उनका विचार था कि कारखानों, सड़कों एवं बांधों को विकास नहीं कहते हैं। विकास तो लोगों के बारे में है, जिसका लक्ष्य लोगों के सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक पूर्ति करना है। विकास में मानवीय मूल्यों को प्रथम वरीयता देनी चाहिए। अपने इन्हीं विचारों की पूर्ति के लिए 1985-86 में मुक्त कराए गए बंधुआ मजदूरों तथा अनुसूचित-जाति, अनुसूचित-जनजाति के लोगों के लिए नि:शुल्क मकान के लिए इंदिरा आवास योजना की शुरुआत की। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों के लिए कपार्ट योजना की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य गरीबी रेखा से नीचे वाले लोगों, अनुसूचित-जाति, अनुसूचित-जनजाति के लोगों, बंधुआ मजदूरों, दिव्यांगों, बच्चों एवं स्त्रियों की समस्याओं को प्रमुख स्थान देना था। इसके साथ-साथ राजीव गांधी अपने राष्ट्रवाद में युवाओं की सघन भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु युवाओं की मतदान की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी तथा राष्ट्र के विकास को ऊंचाई पर ले जाने और शहरों एवं गांवों के बीच संवाद स्थापित करने के लिए संचार एवं प्रोद्योगिकी में क्रांतिकारी विकास किया। राजीव गांधी के विचारों एवं कार्यों में निहित राष्ट्रवाद में न तो हिंदू था न मुस्लिम था, न मंदिर थी न मस्जिद थी, न जाति थी न धर्म थी, अपितु उनका राष्ट्रवाद लोगों को प्रसन्नता देने वाला था। मूल उद्देश्य मानवीय मूल्यपरक था। उनका राष्ट्रवाद एक कुशल राष्ट्रनिर्माता के राष्ट्रीय भावनाओं का प्रतीक है, जिनके त्याग और बलिदान से भारत 21 वीं सदी के श्रेष्ठ देशों की श्रेणी में खड़ा हुआ।
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