Tuesday, March 17, 2026
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जुलूसों में नहीं जीवन में अवतरित होते राम: भारत भूषण

  • बेल्जियम के रामभक्त पादरी कामिल बुल्के बन गए दुनिया की अनूठी मिसाल

जनवाणी संवाददाता |

सहारनपुर: मोक्षायतन अंतर्राष्ट्रीय योगाश्रम में संपन्न हुए अनूठे राम नवमी समारोह में आज न कोई आरती थी और न कोई भजन, था तो केवल मनन! राष्ट्रवंदना मिशन के प्रमुख विद्यार्णव शर्मा ने राम के मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप को हर किसी के लिए स्वीकार्य बताते हुए कहा कि उनकी सार्व भौमिकता ने ही राम को भगवान व सबका ऐसा आराध्य बना दिया कि अन्य धर्मावलंबी भी पूरी तरह राम के रंग में रंग कर तर गए।

उन्होंने महान देशभक्त, रामभक्त , तुलसी दास भक्त , हिंदी ,संस्कृत भाषा के विद्वानों में अग्रणी फ़ादर कामिल बुल्के के जीवन की स्मृति सबके साथ साझा की, जिनका भारत भूमि, हिंदी, संस्कृत , भारत की संस्कृति से दूर दूर तक कोई नाता नहीं था और जो हिंदी संस्कृत का एक शब्द नहीं जानते थे l

बेल्जियम में ईसाई फादर ने जर्मन भाषा में गोस्वामी तुलसीदास की ये पंक्तियां पढ़ी, ‘ ” धन्य जनमु जगतीतल तासु,पितहि प्रमोद चरित सुनी जासु” अर्थात उस बेटे का जीवन धन्य है जिसका यश ,कीर्ति सुनकर पिता को आनन्द और गर्व हो l इन्हीं पंक्तियों ने कामिल बुल्के के दिल में तुलसीदास और भारतभूमि के प्रति श्रद्धा का बीजारोपण कर दिया और उन्होंने १९३५ में भारत को अपनी कर्मभूमि बना लिया l

हिंदी संस्कृत के प्रति उनके दिल मे अगाध श्रद्धा थी। भारत मे हिंदी की दुर्दशा एवं उपेक्षा देखकर वे बहुत आहत थे l गणित शिक्षक होते हुए भी उन्होंने विद्यार्थियों के साथ बैंच पर बैठकर हिंदी और संस्कृत का अध्ययन किया l रामचरित मानस,विनयपत्रिका , तुलसीसतसई, श्रीमदभगवतगीता , वैदिक साहित्य का गहन अध्ययन किया , तत्कालीन वरिष्ठसाहित्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल , महादेवी वर्मा आदि भी उनके हिंदी, संस्कृत प्रेम से बहुत प्रभावित थे l दो बार राष्ट्रपति पुरुस्कार पाने वाले पुलिस अधिकारी रहे राष्ट्रवंदना प्रमुख विद्यार्णव शर्मा ने बताया कि गोस्वामी तुलसीदास की तरह ही उन्होंने पूरा जीवन प्रभु श्रीराम के जीवन को जन जन तक पहुचाने में समाहित कर दियाl

कामिल बुल्के ने श्रीराम के जीवन पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अपना शोधग्रंथ” रामकथा उत्पत्ति और विकास” विषय पर शोध किया और इस अनूठे राम और भारत भक्त को भारत सरकार द्वारा पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया। उन्होंने 60 हजार शब्दों का हिंदी,इंग्लिश शब्दकोष भी तैयार किया 17 अगस्त 1982 को महान भारतभक्त ,रामभक्त, तुलसीदास भक्त हिंदी संस्कृत भक्त फ़ादर ( बाबा कामिल बुल्के ) दिल्ली में ब्रह्मलीन हो गये। बेल्जियम में जन्मे और भारत के लिए जिए इस राम भक्त ने अंत समय में यही इच्छा की कि यदि मेरा पुनर्जन्म हो तो भारत में हो, उस समय उनके तकिये के नीचे तुलसी कृत विनय पत्रिका रखी थी l

राम नवमी समागम के समापन संबोधन में योग गुरु पद्मश्री स्वामी भारत भूषण ने कहा कि हमे भगवान राम को जुलूसों में नहीं जीवन में अवतरित होते देखना होगा। योग से निर्मल हुए चित्त में ही राम ऐसे अवतरित होते हैं कि सब भेद भुला कर शबरी, केवट, हनुमान और कामिल बुल्के सरीखों को भी अपने अतिप्रिय के रूप में अपना लेते हैं। उन्होंने राम को पावक और भक्तवत्सल बताते हुए कहा कि राम की आवश्यकता राष्ट्र व समाज के हर क्षेत्र में है, “तहहीं अवध जहं राम निवासू” कहते हुए योग गुरु बोले कि जहां राम वहीं अयोध्या। राम संवाद कार्यक्रम में प्रदीप कंबोज, नंद किशोर शर्मा, पंडित सुनील शर्मा, ललित वर्मा इं अमरनाथ और इं आलोक श्रीवास्तव ने भी भागीदारी की। कार्यक्रम का संचालन कर रहीं वरिष्ठ साधिका मंजू गुप्ता और सुमन्यु सेठ ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया।

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