Friday, January 28, 2022
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Homeसंवादरविवाणीसांवले कृष्ण पर फिदा थीं इस्मत चुगताई

सांवले कृष्ण पर फिदा थीं इस्मत चुगताई

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नाजिश अंसारी

इस्मत की ज्यादातर कहानियां मध्य-निम्न वर्गीय औरतों को केंद्र में रखकर बुनी गई हैं। यह आजादी से पहले और बाद का दौर है, जब मीना कुमारी का ट्रैजिक अपरोच अपीलिंग था। लेकिन उनकी नायिकाएं मीना कुमारी नहीं हैं। वे सड़क पे कुलांचे मारती, दूधवाले-सब्जीवाले को गरियाती रखैले हैं। बलत्कृत किशोरियां हैं। सास को चकमा दे मियां से लप-झप करती होशियार बहुएं हैं। और कभी पति की मार से तंग आकर पलटवार करती बीवियां हैं। कोई औरत मार खाकर आती तो वे कहती, मियां से तलाक लो या पलट के तुम भी मार दो। फिजूल रो धो के मेरा मूड ना खराब करो।  हमदर्दियों से चिढ़न खाए बैठी इस्मत की भाषा में फिजूल फलसफे का दखल नहीं, फिर भी संजीदा है। जबान दाल चावल जैसी सादी लेकिन बीच बीच में आम के अचार का चटखारापन है।
उर्दू मॉडर्न कहानी के चार स्तंभ रहे। तीन का भार मर्दों के कंधों पर था। कृश्नचंदर, राजिंदर सिंह बेदी और साअदत हसन मंटो। चौथा कंधा जनाना था। इस अकेले स्तंभ में इतनी ताकत रही कि इन्हें मदर आॅफ मॉडर्न स्टोरी कहा गया। वह चंगेज खां के खानदान से आती हैं। ननिहाल उस्मान गनी (रजि.) से मिलता है। 10 भाई-बहनों में 9वें नंबर पे थीं। तीन बड़ी ब्याही बहनों के बाद वह भाइयों के साथ बड़ी हुर्इं। उन्हें गुड़िया नहीं खेलनी थी। क्रिकेट, गिल्ली-डंडा खेलना था। सीना-पिरोना, बुनाई-कढ़ाई से चिढ़ खाई बैठी उन्हें पेड़ों पर चढ़ना था। हर वक़्त पीठ पे धौल जमाने वाले भाइयों को पलट कर न मार सकने की कसमसाहट थी। उन्हें रोना नहीं था। कहीं से कमजोर भी नहीं दिखना था।
कुछ बड़े भाई अजीम बेग की शह रही। कहते, खेल में हार जाती हो तो उनको पढ़ाई में हरा दो। तीन दर्जे आगे शमीम भाई हर क्लास में फेल होते रहे। हत्ता यह दिन भी आया कि होमवर्क में उनकी मदद करने लगीं। और इस तरह एक दिन वह अचानक शमीम भाई से बड़ी हो गर्इं।
वह इस्मत चुगताई हैं।
जिददी हैं। अड़ियल हैं। खरखरी। जबान दराज। बेहद सवाल पूछ्ने वाली। खार खाए बैठी अम्मा जवाब के बजाय जूतियां फेंक मारती। निशाना हर बार चूकता। अम्मा निशानचीं नहीं थीं। वह भी हस्सास ना हुर्इं। बेशर्मी से हंस के भाग जातीं।
यही बेशर्मी उनके लिए संजीवनी बूटी बनी। ‘लिहाफ’ (समलैंगिक रिश्तों पर उर्दू की पहली कहानी) छपने के बाद गाली भरे खतों का सिलसिला शुरू हुआ। तब तक शाहिद लतीफ (फिल्म डायरेक्टर) ‘मजाजी खुदा’ बन चुके थे।
लिहाफ पर अखबारों में मजमून निकलने लगे। महफिल की बहसों में लिहाफ छा गया। लाहौर कोर्ट ने लिहाफ को फुहश (अश्लील) करार देते हुए उन्हें सम्मन भेजा। शाहिद मुकद्दमों की जिल्लत और बदनामी से खाएफ थे। ससुर साहब के दर्द, बल्कि गुजारिश भरे खत में इस्मत के लिए ताकीद थी, ‘दुल्हन को समझाओ। कुछ अल्लाह-रसूल की बातें लिखें कि आकबत दरुस्त हो। मुकद्द्मा और वह भी फुहाशी पर। हम लोग बहोत परेशान हैं।’
परेशान तो वह भी थीं। कि इस एक कहानी से उनसे जुड़े सब लोग परेशान थे और यह भी कि उसी एक लिहाफ की तहों के नीचे उनकी तमाम कहानियां दब जातीं हैं।
चूंकि वह कहीं, कभी, किसी से नहीं हारीं। मुकदमा भी जीत गर्इं।
जिंदगी में बजाहिर उतार-चढ़ाव कम रहे। या शायद हर बात पर तवज्जोह की जरूरत नहीं समझी। एएमयू में पढ़ने की जिद की। कहा, ना पढ़ाया तो घर से भाग कर ईसाई हो जाऊंगी। एक आध दिन रूठी हुई हड़ताल पे रहीं। अब्बा मान गए।
शौकत खानम (कैफी आजमी की बीवी) ने भी पसंद की शादी का इजहार किया था। वहां भी अब्बा मान गए। ऐसे वालिदैन ही उनकी शख्सियत की नींव बनते हैं। तब जा के इस्मत देश की पहली मुस्लिम बीए, बीएड करने वाली मुस्लिम महिला बन पाती हैं।
खुद-मुख्तारियत की ख्वाहिश थी। बरेली में प्रिंसिपल की पोस्ट पर लगी। अम्मा से मिलने आर्इं।
मुल्क के बंटवारे में आधा खानदान पाकिस्तान जा चुका था। 10 बच्चों को जनने वाली अम्मा तन्हा थीं। हवेली पर फौज का कब्जा था। अम्मा उसी हवेली के सामने एक छोटे से कमरे में शाहजहां की तरह अपने ताजमहल को निहारा करतीं।
बेटी को देखा तो लिपट कर जार ओ कतार रो पड़ीं। अम्मा के थप्पड़ों, घूंसों की आदी इस्मत यूं उनका रोना देख कर सिहर गर्इं। उनके आखिरी दिनों में इस्मत ही उनका सहारा बनीं।
रिश्तेदार जी का जंजाल थे लेकिन मुसंन्निफों (लेखकों) से रिश्तेदारी कमाल कर गई। हार्डी, ब्रांटी, चार्ल्स डिकेंस, ओलिवर ट्विस्ट, चेखव, टालस्टाय, दास्तायेव्स्की और बर्नार्ड शा को तो जैसे घोलकर पी गई हों।
जितना उन्होंने पढ़ा, उससे ज्यादा बतियाया। दुकानदारों, टैक्सी वालों यहां तक की भिखारियों से भी। जचगी के बाद अस्पताल में बाइयों से की गई बतकही ही तो है ‘मुट्ठी मालिश’।
इस्मत चुन्नी के रूप में एक क्यूरियस बच्चा हैं। वह अपने कोचवान से शबरी के झूठे बेरों का किस्सा पूछती हैं। शेखानी बुआ से पूछती हैं, अली असगर को हलक में तीर क्यों मारा? वह सांवले श्रीकृष्ण पर मोहित हैं। पड़ोसी के घर जन्माष्टमी पर विराजे भगवान को लेकर उनमें हीन भावना है। सोचती हैं, उनके भगवान क्या मजे से आते जाते हैं। एक हमारे अल्लाह मियां हैं, ना जाने कहां छिपकर बैठे हैं।
इस्मत की ज्यादातर कहानियां मध्य-निम्न वर्गीय औरतों को केंद्र में रखकर बुनी गई हैं। यह आजादी से पहले और बाद का दौर है, जब मीना कुमारी का ट्रैजिक अपरोच अपीलिंग था। लेकिन उनकी नायिकाएं मीना कुमारी नहीं हैं। वे सड़क पे कुलांचे मारती, दूधवाले-सब्जीवाले को गरियाती रखैले हैं। बलत्कृत किशोरियां हैं। सास को चकमा दे मियां से लप-झप करती होशियार बहुएं हैं। और कभी पति की मार से तंग आकर पलटवार करती बीवियां हैं।
कोई औरत मार खाकर आती तो वे कहती मियां से तलाक लो या पलट के तुम भी मार दो। फिजूल रो धो के मेरा मूड ना खराब करो।
हमदर्दियों से चिढ़न खाए बैठी इस्मत की भाषा में फिजूल फलसफे का दखल नहीं, फिर भी संजीदा है। जबान दाल चावल जैसी सादी लेकिन बीच बीच में आम के अचार का चटखारापन है।
बकौल जावेद अखतर, उनकी कहानियों को पढ़ो तो लगता है इस्मत आपा बात कर रही हैं। इस्मत आपा को सुनो तो लगता है उनके किरदार बोल रहे हैं।
वे औरत को अपने पैरों पे खड़ा और खुद अपनी हिफाजत करते हुए देखना चाहती थीं। शायद इसीलिए कुर्रतुल ऐन हैदर ने उन्हें ‘लेडी चंगेज खां’ कहा।
उन्हों ने फेमिनिस्म की शुरुआत उस वक़्त की थी, जब लोग इसका एफ भी नहीं जानते थे।
दफनाने से खौफजदा इस्मत ने मरने के बाद जिस्म को जलवाने की ख्वाहिश का इजहार किया। उनकी ख्वाहिश का एहतराम हुआ। हालांकि रिश्तेदारों ने काफी विरोध किया।
अपनी आत्मकथा ‘कागजी है पैरहन’ में बचपन से लेकर एएमयू में एडमिशन, आगे की जारी तालीम और नौकरी का जिक्र किया है। आलोचक मानते हैं, ये ईमानदार आत्मकथा नहीं है।
हां,काफी हद तक… या शायद जिंदगी के इतने ही हिस्से में वह असल इस्मत रहीं हों। कौन जानता है!
वे बौद्ध धर्म से प्रभावित थीं। अलमारी में कृष्ण की मूर्ति (गिफ्टेड) भी थी। मैं समझती हूं कृष्ण से की उनकी गुफ्तगू को साहिब ए मसनद को सुनवाया जाना चाहिए। और पूछना चाहिए जिस भारतीय संस्कृति/सभ्यता की ट्रम्प द्वारा सराहना सुनते हुए वे गौरान्वित महसूस करते हैं, उसमें मुसल्मान इस्मत आपाओं का क्या कोई रोल नहीं?

 

‘मैं मुसलमान हूं। बुत परस्ती शिर्क है। मगर देवमाला (पुराण) मेरे वतन का विरसा(धरोहर) है। इसमें सदियों का कल्चर और फलसफा समोया हुआ है। ईमान अलहदा है। वतन की तहजीब अलहदा है। इसमें मेरा बराबर का हिस्सा है। जैसे उसकी मिट्टी, धूप और पानी में मेरा हिस्सा है। मैं होली पर रंग खेलूं, दिवाली पर दीए जलाऊं तो क्या मेरा इमान मुतजलजल हो जाएगा। मेरा यकीन और शऊर क्या इतना बोदा है, इतना अधूरा है कि रैजा रैजा हो जाएगा?’

 

मैं मुसलमान हूं। बुत परस्ती शिर्क है। मगर देवमाला (पुराण) मेरे वतन का विरसा(धरोहर) है। इसमें सदियों का कल्चर और फलसफा समोया हुआ है। ईमान अलहदा है। वतन की तहजीब अलहदा है। इसमें मेरा बराबर का हिस्सा है। जैसे उसकी मिट्टी, धूप और पानी में मेरा हिस्सा है। मैं होली पर रंग खेलूं, दिवाली पर दीए जलाऊं तो क्या मेरा इमान मुतजलजल हो जाएगा। मेरा यकीन और शऊर क्या इतना बोदा है, इतना अधूरा है कि रैजा रैजा हो जाएगा?’
और मैंने पर परस्तिश की हदें पार कर लीं। तब अलमारी में रखे हुए बाल कृष्ण से पूछा, क्या तुम वाकई किसी मनचले शायर का ख्वाब हो? क्या तुमने मेरी जन्मभूमि पर जन्म नहीं लिया? बस एक वहम, एक आरजू से ज्यादा तुम्हारी हकीकत नहीं। किसी मजबूर और बंधनों में जकड़ी हुई अबला के तखययुल की परवाज हो कि तुम्हें रचने के बाद उसने जिंदगी का जहर हंस-हंस के पी लिया?
क्या तुम धरती के हलक में अटका हुआ तीर नहीं निकाल सकते?
मगर पीतल का भगवान मेरी हिमाकत पर हंस भी नहीं सकता कि वह धात के खोल मुंजमिद (अचल) हो चुका है। सियासत के मैदान में एक-दूसरे की नाअहली साबित करने के लिए इंसानों को कुत्तों की तरह लड़ाया जाता है।
क्या एक दिन पीतल का यह खोल तोड़कर खुदा बाहर निकल आएगा?
इसका जवाब ना इस्मत आपा को मालूम था ना मुझे।
बहरखैर, सवाल पूछने की हिम्मत रखने वाली इस्मत आपा को हमारा सलाम!!

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