Sunday, January 23, 2022
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सपा का शाहिद और रफीक पर फिर भरोसा

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  • मेरठ दक्षिण, हस्तिनापुर, सिवालखास और मेरठ कैंट के प्रत्याशियों को लेकर अभी सपा में सस्पेंस

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: सपा ने पुराने धुरंधरों पर ही भरोसा किया हैं। मेरठ शहर सीट पर सपा के सीटिंग एमएलए रफीक अंसारी पर फिर से भरोसा जताते हुए उन्हें ही चुनाव मैदान में उतारा हैं। रफीक अंसारी बिरादरी से हैं। यही वजह है कि शहर सीट पर सर्वाधिक वोटर अंसारी हैं, जिसके चलते रफीक अंसारी के नाम पर ही फिर से सपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने स्वीकृति की मुहर लगा दी।

इस तरह से रफक अंसारी फिर से चुनावी हुंकार भरेंगे। 2017 में रफीक अंसारी के सामने भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डा. लक्ष्मीकांत वाजपेयी चुनाव लड़े थे। डा. वाजपेयी चार बार विधायक रह चुके थे। लक्ष्मीकांत को उन्होंने बड़े अंतर से चुनाव हराया था। रफीक को 1 लाख 3 हजार 217 वोट मिले थे, जबकि डा. लक्ष्मीकांत वाजपेयी को 74 हजार 448 वोट मिले थे।

ये रहा शहर सीट का इतिहास

वर्ष 1989 के चुनाव में डा. लक्ष्मीकांत वाजपेयी पहली बार भाजपा के टिकट पर निर्वाचित हुए थे। वर्ष 1993 में जनता दल के टिकट पर हाजी अखलाक ने डा. लक्ष्मीकांत वाजपेयी को हराया था। 1996 और 2002 में डा. लक्ष्मीकांत वाजपेयी विजयी रहे थे, लेकिन 2007 में यूडीएफ के टिकट पर हाजी याकूब ने डा. वाजपेयी को हरा दिया था। 2012 में डा. लक्ष्मीकांत वाजपयेी चौथी बार विधानसभा में पहुंचे।

सपा को फिर शाहिद ‘मंजूर’, चुनावी रण में कई चुनौतियां

यूपी में चुनावी बिगुल बज चुका है। राजनीतिक दलों ने गोटियां बिछानी शुरू कर दी हैं। बसपा, कांग्रेस और भाजपा के बाद गुरुवार को सपा ने भी किठौर सीट से अपने पुराने चेहरे शाहिद मंजूर पर विश्वास जताते हुए उसे मैदान में उतार दिया है। हालांकि ऐसी संभावनाएं है कि भाजपा सीटिंग एमएलए सत्यवीर त्यागी को ही चुनाव मैदान में उतार रही है, लेकिन फिर भी चुनावी रण फतह करने के लिए शाहिद के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं।

किठौर विधानसभा सीट पर वैसे तो पहले से ही शाहिद मंजूर परिवार का दबदबा रहा है। यहां से शाहिद के पिता मंजूर अहमद 1967 में शारदा देवी को पराजित कर संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से पहली बार विधायक चुने गए थे। उसके बाद 1969 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से इसी सीट पर पुन: जीत दर्ज की। पिता के बाद 2002 में शाहिद ने भी सपा के टिकिट पर अपनी राजनीतिक पारी का आगाज यहीं से किया।

लगातार हैटिक लगाने के बाद 2017 में भाजपा के सत्यवीर त्यागी ने शाहिद को 10,822 वोटों से हराया था। मंजूर परिवार के अलावा यहां से लोकदल के परवेज हलीम भाजपा से रामकृष्ण वर्मा, बीकेडी से प्रभुदयाल, कांग्रेस से भीम सिंह भी विधायक रह चुके हैं। किठौर की रिवायत है कि यहां के आवाम ने कई दलों के प्रतिनिधियों को अपने प्रतिनिधित्व का मौका दिया है, लेकिन मौजूदा सूरते हाल पर गौर करें तो कृषि कानून वापस लेने के बाद भाजपा से किसानों की नाराजगी कम हो चली है।

इसलिए शाहिद मंजूर के समक्ष चुनावी रण में कई चुनौतियां हैं। सिसौली सहित पूरा ठाकुर बारहा भाजपा का गढ़ है तो गुर्जर और मुस्लिमों की भी यहां खासी तादाद है। 2017 की तर्ज पर गुर्जर कार्ड खेलते हुए बसपा ने केपी मावी को टिकिट देकर गुर्जर वोटों में सेंधमारी की है। इसके अलावा बसपा के पास दलित वोट बैंक और उसके रसूखदार मुस्लिम भी हैं।

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