Sunday, May 31, 2026
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सुख और दुख मनुष्य की मानसिक अवस्थाएं

सुख और दुख दोनों ही मनुष्य की मानसिक अवस्थाएं हैं। जिस अवस्था में एक मनुष्य को दुख का अनुभव होता है, वहीं पर दूसरे मनुष्य को सुख की अनभूति होती है। यह दशार्ता है कि मनुष्य में कितनी गहराई है अथवा वह कितना उथला है। जो धीर-गम्भीर होगा, उसे प्रभु की कृपा से कष्ट कम होता है या न के बराबर होता है। इसके विपरीत दूसरा व्यक्ति हाय-तौबा करता रहता है। न वह स्वयं चैन से रहता है और न दूसरों को रहने देता है। मनुष्य को ईश्वर पर पूर्ण विश्वास होना चाहिए। उसे अपने सभी कर्म उस मालिक के सुपुर्द कर देने चाहिए। जब उसमें कर्तापन का भाव ही नहीं रहेगा, तो सफलता या असफलता की स्थिति में उसे दुख नहीं होगा।


सुखी रहना या खुश रहना हर मनुष्य चाहता है। कोई भी इन्सान दुखों और परेशानियों में घिरकर अपना जीवन बर्बाद नहीं करना चाहता। खुश रहने का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि दुखों के बोझ की गठरी को जितनी जल्दी हो सके उतारकर फेंक दे। जितना अधिक समय तक मनुष्य उस बोझ को उठाए रखेगा उतना ही ज्यादा दुखी और निराश रहेगा। मनुष्य को चाहिए कि वह इस गठरी को ज्यादा दूर तक न लेकर जाए।

अब यह मनुष्य विशेष पर निर्भर करता है कि वह दुखों के उस बोझ को कुछ मिनटों तक उठाए रखना चाहता है या फिर जिन्दगी भर उसे समेटकर अपने पास सम्हालकर रखना चाहता है। यदि मनुष्य सदा प्रसन्न रहना चाहता है तो दुख रूपी गठरी को उसे अपने सिर से उतारकर जल्दी से जल्दी नीचे रखना सीख लेना चाहिए। यदि सम्भव हो सके तो उसे उठाना ही नहीं चाहिए। इससे वह दुखों से मुक्त हो सकता है।

कुछ लोगों को हर समय दुख का प्रदर्शन करने की आदत होती है। वे दूसरों के समक्ष हमेशा रोनी सूरत बनाकर जाते हैं। ताकि लोगों को यह पता चल सके कि वह व्यक्ति कितना अभागा है, दुखों का मारा हुआ है और परेशानियों से घिरा हुआ है। उससे बढकर दुखी और कोई व्यक्ति इस संसार में नहीं है। केवल वही सभी दुखों की खान है। वह चाहता है कि सभी लोग उससे सहानुभूति रखें, उसे सान्त्वना देते रहें और सहारा दें।

वास्तव में ऐसा हो नहीं पाता। लोग ऐसे व्यक्ति की शक्ल देखना पसन्द नहीं करते। वे लोकलाज के कारण प्रत्यक्ष रूप से उसके मुँह पर कुछ कहते नहीं, पर मन ही मन सोचते हैं कि कहाँ से यह मनहूस आ गया है। बस अब वह अपना ही रोना रोएगा। उनका सारा दिन खराब हो जाएगा। इस प्रकार पीठ पीछे उसकी बुराई करते हैं। उसका उपहास करते हैं। वह उन्हें अपना परम हितैषी मानता है और वे उसे अपना दुश्मन समझते हैं।

दुख और सुख जीवन का अभिन्न अंग हैं। ये दोनों ही मनुष्य के पास उसके कमार्नुसार आते रहते हैं। पूर्वजन्म कृत कर्मों के इस भोग को मनुष्य भोगकर ही मिटा सकता है। इसके बिना और उसके पास और कोई रास्ता नहीं है। कोई भी दूसरी गति नहीं है। मनुष्य सुख का समय आने पर प्रसन्न होता है, आनन्द मनाता है। परन्तु दुखों को सहन करना उसकी सीमा से परे होता है। असह्य दुख उसके कष्ट का कारण बनते हैं।

सुख की चाह करने वाले को यह विश्वास रखना चाहिए कि अंधेरा कितना भी गहरा जाए, उसके बाद प्रात: होनी निश्चित है। कितने भी काले घने बादल आकाश पर छा जाएँ, उनके बरसने के बाद प्रकाश अवश्य होगा। यह प्रकृति का अटूट नियम हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य को आशा का दामन कसकर थाम लेना चाहिए। तभी उसे दुखों के बीच सुख की किरण दिखाई देती है, और वह दुखों को झेल जाता है।

वास्तव में सुख और दुख दोनों ही मनुष्य की मानसिक अवस्थाएं हैं। जिस अवस्था में एक मनुष्य को दुख का अनुभव होता है, वहीं पर दूसरे मनुष्य को सुख की अनभूति होती है। यह दशार्ता है कि मनुष्य में कितनी गहराई है अथवा वह कितना उथला है। जो धीर-गम्भीर होगा, उसे प्रभु की कृपा से कष्ट कम होता है या न के बराबर होता है। इसके विपरीत दूसरा व्यक्ति हाय-तौबा करता रहता है। न वह स्वयं चैन से रहता है और न दूसरों को रहने देता है।

मनुष्य को ईश्वर पर पूर्ण विश्वास होना चाहिए। उसे अपने सभी कर्म उस मालिक के सुपुर्द कर देने चाहिए। जब उसमें कर्तापन का भाव ही नहीं रहेगा, तो सफलता या असफलता की स्थिति में उसे दुख नहीं होगा। तब वह सब कुछ ईश्वर पर छोडकर मस्त हो जाएगा, तो फिर दुख का कोई कारण ही नहीं बचा रहेगा। तब उसे अपने चारों ओर सुख ही सुख दिखाई देगा। दुख का उसके पास कोई नामोनिशान ही नहीं रहेगा। भगवान पर पूरा भरोसा रखना चाहिए। भगवान जो करते हैं, अच्छा करते हैं, इस पर विश्वास होना चाहिए।

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