-डॉ.वीरेन्द्र आज़म
‘‘आज तुम्हारे सपन न अपने, जीवन तुमसे रुठ गया है/हृदय रक्त से सिंचित सपना, मोहपाश से छूट गया है’’। साल 1952 में लिखे अपने इस गीत की पंक्तियों को चरितार्थ करते हुए यात्री जी जीवन के मोहपाश से छूटकर अपनी अनंत यात्रा पर चले गए। वह पिछले काफी समय से रुग्ण थे। अपनी सृजन यात्रा से उन्होंने करीब पांच बरस पहले ही विश्राम ले लिया था।
रुग्णावस्था के चलते काया भले ही अशक्त हो गयी हो लेकिन रोग शैय्या पर भी वे निरंतर चिंतनशील व चैतन्य रहे और डायरी लिखते रहे। पर अब उनके लेखन के पात्र समाज की घटनाएं और लोग नहीं वे स्वयं थे। ढाई बरस पहले उन्होंने मुझसे कहा भी था, ‘‘जब मैं किसी घटना का पात्र स्वयं होता हूं तो संवेदनाएं जागृत होती है और तब मैं कहानी नहीं संस्मरण या डायरी लिखता हूं।’’

से रा यात्री ने छह दशक से अधिक हिन्दी साहित्य की सेवा की। बीस वर्ष की आयु से उन्होंने लिखना शुरु कर दिया था। प्रारंभ के दस-पंद्रह बरस उन्होंने केवल गीत और कविताएं, विशेषतः रूमानी गीत लिखे। लेकिन उन्होंने अनेक ऐसी कविताएं भी लिखी जिनमें वह जीवन दर्शन के दृष्टा और बोधक के रुप में दिखायी देते हैं। साल 1954 में लिखी उनकी कविता ‘‘स्व का विसर्जन’’ की यह पंक्तियां इसकी बानगी हैं-‘‘सागर-सा फैला सुख, सागर-सा गहरा सुख/सागर-सा उच्छल सुख, मन में समाता नहीं। पृथ्वी सा व्यापक दुःख, जीवन का मापक दुःख/इतना हृद दावक दुःख, झेला भी जाता नहीं’’।
इसके अलावा छठे दशक में रचित उनकी कविताएं ‘नादान मन’, ‘प्रतिदान’, ‘चेतना के ज्वर का अभिशाप’, ‘प्राणी: मन, वचन और कर्म से’ तथा ‘खोज की छुद्रता’ आदि ऐसी कविताएं है जो यह बताने और जताने के लिए काफी हैं कि वे जीवन के एक ऐसे अध्येता रहे जिन्होंने जीवन को बहुत करीब से देखा भी, जिया भी और लिखा भी। उनका मानना था-‘जीवन जीते चले जाने की चीज है……जीवन सार्थकता को तलाश करते हुए जिया जाना चाहिए, दूसरे शब्दों में यही रचनात्मकता है’….। बाद में वह भले ही कथा साहित्य की ओर मुड़ गए हों लेकिन कविता और कवित्त उनमें अंत तक जीते जागते रहे।
यात्री जी साहित्य सरिता में काव्य की सृजन नाव खेते हुए कथासागर तक पहुंचे हैं। कविता को छोड़कर कहानी की ओर वह इसलिए मुडे़ कि आम आदमी की उस व्यथा को वे कविता के माध्यम से व्यक्त नहीं कर पा रहे थे जो वह व्यक्त करना चाहते थे।

से रा यात्री सामाजिक सरोकार और आम आदमी की जिजीविषा के चितेरे कथाकार थे। उन्होंने शहरी मध्यम वर्गीय व्यक्ति के अंतर्द्वंद्व, आम आदमी की पीड़ा और अपनी जीवन यात्रा में देखे और भोगे यथार्थ को केंद्र में रखकर कहानियां बुनी। उन्होंने सामाजिक, आर्थिक मुद्दों को बडे़ सधे हुए ढंग से उठाया है। उनकी कहानियों और उपन्यासों को पढ़कर कहा जा सकता है कि यात्री जी विषय के प्रति ही नहीं शिल्प के प्रति भी गंभीर रहे हैं। उनकी भाषा प्रांजल और कहानियों की बुनावट बहुत सरल है। उसमें कहीं बिखराव नहीं है। वह मर्म को छूकर गुजरती है। उनकी आधारभूत विशेषता उनका यथार्थपरक दृष्टिकोण है। कहा जा सकता है कि यात्री जी कथा निकष पर शत प्रतिशत खरे उतरे हैं। जहां उन्होंने अपने अनुभवों और आसपास के पात्रों को कहानियों में रखा वहीं उपन्यासों में कल्पना की उड़ान भी भरी, लेकिन यह उड़ान यथार्थ से ज्यादा दूर नहीं रही। उनकी कहानियों और उपन्यासों की एक विशेषता यह भी रही कि उन्होंने अपनी लेखनी को कभी प्रयोगवादी, प्रगतिवादी या जनवादी दायरे में कैद नहीं होने दिया।
मानवतावाद उनके केंद्र में रहा। यही वजह है कि वे कथा साहित्य में मानवीय संवेदनाओं के संवाहक रहे हैं।
यात्री जी ने अपनी सृजन यात्रा में विपुल साहित्य रचा। 32 उपन्यास, 40 से अधिक कहानी संग्रह, तीन सौ से अधिक कहानियों के अलावा व्यंग्य, संस्मरण और साक्षात्कार की अनेक कृतियां उनके साहित्य भंडार में है। देशभर के अनेेक विश्वविद्यालयों में उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर पचास से अधिक शोध हो चुके है और हो रहे है। अकेले मराठवाड़ा यूनिवर्सिटी में ही उनके व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक दर्जन से ज्यादा शोध हो चुके है।
से रा यात्री बहुत उदार, शिष्ट, संवेदनशील, मृदुभाषी, भावप्रवण और सीधे सच्चे कथाकार रहे। उन्हें सुविधाभोगी दूसरे साहित्यकारों से न तो कभी कोई ईर्ष्या हुई और न कोई दुर्भाव या द्रोह। उनमें न तो धनोपार्जन की कोई एषणा जगी और न ही किसी अन्य भौतिक सुख की तृष्णा। अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कमलेश भट्ट कमल से कहा था-‘‘सुविधाएं और ऐय्याशियां रचनात्मकता का हिस्सा नहीं हैं। ये किसी के पास भी हो सकती हैं। यह उनकी व्यक्तिगत स्थितियां हैं। मुझे ये स्थितियां इसलिए आकृष्ट नहीं करती कि मेरे भीतर एक निष्ठापूर्ण साहित्यकार का एकात्म जिज्ञासाभाव है। मैं सुख-सुविधाओं को पाने के लिए हाथ-पैर नहीं मार सकता। मेरी यह एषणा नहीं है कि मेरे बच्चे लाखों-करोड़ों में खेलें। मेरी न कोई लोकेषणा है, न ही यशेषणा।’’ यहीं वजह है कि वे कभी किसी पुरस्कार के पीछे नहीं भागे। सच कहूं तो यात्री साहित्य में संत थे। उनका जाना साहित्य के एक संत का जाना है। उनका जीवन जीने का अंदाज भी संतों वाला ही रहा। एकदम अलमस्त। प्रख्यात ग़जलकार डॉ.अश्वघोष ने भी उन्हें संत की ही संज्ञा दी है।
यात्री जी का परिवार तो मुजफ्फरनगर का रहा है, लेकिन से रा यात्री का जन्म 10 जुलाई 1932 को सहारनपुर के जड़ौदा पांडा में अपने फूफा के घर हुआ था। यह रहस्योद्घाटन स्वयं यात्री जी ने साल 2007 में सहारनपुर में आयोजित उस समारोह में किया था जिसमें साहित्यिक संस्था ‘समन्वय’ द्वारा उन्हें ‘‘सारस्वत सम्मान’’ से समादृत किया गया था। इस तरह वे सहारनपुर के भी रहे, मुजफ्फरनगर के भी व गाजियाबाद के भी और अपने साहित्य के साथ पूरे देश के रहे हैं और रहेंगे।
एक बार बहुत बीमार होने पर उन्होंने अपने साहित्य मित्र ओमप्रकाश चतुर्वेदी पराग से कहा था-‘‘पराग भाई, जिन्दगी अगर मुझे बहुत सतायेगी तो लात मारकर चल दूंगा। मैं कोई ज़िन्दगी का गुलाम हूं कि उसकी हर मार सहता जाऊं ?’’ और अंततः यही हुआ भी। पिछले डेढ़ बरस में उन्होंने अपनी दो बेटियों को काल कवलित होते देखा और कुछ दिन पहले उनकी वामांगिनी उषा जी भी उन्हें छोड़कर परलोक सिधार गयी। उनके जाने के बाद से उन्हंे जिंदगी बेमानी लगने लगी थी। अंततः उन्होंने भी ज़िदगी को अलविदा कहने का निश्चय किया। उनके बडे़ पुत्र आलोक यात्री बताते है कि अनंतयात्रा पर जाने से दो दिन पूर्व उन्होंने अन्न-जल का त्याग कर दिया था। 17 नवम्बर 2023 को 91 वर्ष की आयु में अपने गाजियाबाद के कविनगर स्थित आवास पर अंतिम सांस लेते हुए परलोक गमन कर गए।
दैहिक रुप में वे भले बीच न रहे हों लेकिन अपनी कहानियों, उपन्यासों और संस्मरणों के साथ वह हमेशा हमारे बीच रहेंगे, कहीं हमारे आस-पास। हिंदी साहित्य के उस अक्लांत पथिक को हमारा शत-शत नमन!
-डॉ.वीरेन्द्र आज़म, 2सी/755 पत्रकार लेन, प्रद्युमन नगर, मल्हीपुर रोड, सहारनपुर। मो.9412131404

