हास्य अभिनेता राजपाल यादव इन दिनों उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले में खाक छान रहे हैं। 15 दिनों के अंतराल में दो बार वहां पहुंचे। उनके पहुंचने का कारण जिले में फिल्म सिटी की स्थापना करना बताते हैं। पर अंदर खाने उनका मकसद कुछ और ही है? दरअसल, वह अपने लिए पीलीभीत में फिल्म सिटी के बजाय सियासी जमीन की तलाश में हैं। ये बात वहां के स्थानीय लोग समझ नहीं पा रहे। राजपाल पीलीभीत जिले की पूरनपुर तहसील में घूम रहे हैं। वहां के स्थानीय भाजपा विधायक इसलिए खुश हैं उनको अभिनेता के साथ उठने-बैठने का मौका मिल रहा है। गांव, कस्बों और तहसीलों के लोगों का फिल्मी कलाकारों से मिलने का एक अलग ही नशा होता है, उनसे मिलकर बहुत खुश होते हैं। लेकिन फिल्मी लोग उन भोले-भाले लोगों की खुशी में अपने लिए क्या चुरा ले जाते हैं, वह नहीं समझ पाते।
पीलीभीत एक ऐसा जिला है, जिसे दशकों से स्थानीय सांसद नसीब नहीं हुआ। बाहरी लोगों का ही कब्जा रहा। संसद में पीलीभीत का स्थानीय जन प्रतिनिधि पहुंचे ये सपना ही बना हुआ है। पीलीभीत संसदीय क्षेत्र पर गांधी परिवार का दशकों से कब्जा है। लेकिन, बीते कुछ वर्षों से चुनावों में उन्हें मिलने वाले वोटों में कमी आई है। उसी कमी का फायदा राजपाल यादव उठाना चाहते हैं। राजपाल यादव को पता है फिल्म सिटी की स्थापना के लिए नोएडा में प्रस्तावित जेवर एयरपोर्ट के नजदीक हजार एकड़ जमीन को सरकार पहले ही अधिकृत कर चुकी है। बावजूद इसके वह जिले वासियों को फिल्म सिटी बनाने का लालच दे रहे हैं। जिले की भोगौलिक स्थिति का सही से आंकलन करें तो, वहां पहुंचने के अभी तक सुगम यातायात के साधन तक नहीं थे। गनीमत ये है इस वक्त ठीकठाक सड़कें बन चुकी हैं।
फिल्म सिटी की स्थापना के लिए दो चीजें मुख्य होती हैं। अव्वल, हजारों एकड़ जमीन और उनके अनुकूल वातावरण का होना। दूसरा, एयरपोर्ट की ट्रांसपोर्ट की कनेक्टिीविटी। पर वहां दोनों ही जरूरतें रिक्त हैं। राजपाल यादव जिले की पूरनपुर तहसील के गांव-खलिहानों का भ्रमण कर रहे हैं। कोई उनसे पूछे, क्या भला गांवों में भी फिल्म सिटी स्थापित हो सकती है। अगर हो भी सकती है तो वहां रत्ती भर जमीन खाली नहीं है। हवाई अड्डा तो दूर की बात है, कम से कम सड़कें ही फोर लेन की हो जाएं। हां ये तय है, पीलीभीत में दूसरे काम धंधों के क्षेत्रों को तलाशा जा सकता है। उसके लिए ये क्षेत्र उपयुक्त है क्योंकि पीलीभीत कई प्राकृतिक संपदाओं का मालिक है। तराई क्षेत्र होने के चलते आबादी पूर्णता खेती-बाड़ी पर निर्भर है। कल-कारखानों की गैर-मौजूदगी में भी लोग संपन्न और खुश हाल हैं। धान की खेती बड़े स्तर होने के चलते क्षेत्र को धान का कटोरा कहा जाता है।
टाइगर रिर्जव क्षेत्र भी इसी इलाके में है। इसके अलावा जिले का तकरीबन एक तिहाई भू भाग जंगल क्षेत्र से घिरा है। हर तरह के जंगली जानवरों की बहुतायत है। जिले की प्रकृतिक सुंदरता किसी के भी मन को मोहती है। हुकूमतों पर स्थानीय लोगों के आरोप कभी-कभार जायज भी लगते हैं, आरोप हैं कि पूर्ववर्ती राज्य सरकारों ने इस जिले के साथ सौतेला व्यवहार किया। रोजगार के धंधों जैसे कारखाने आदि को लगवाने के तरफ कभी अपना ध्यान आकर्षित नहीं किया। स्वास्थ्य की लोक सेवाओं का आज भी बुरा हाल है। गंभीर हारी बीमारी होने पर मरीज राम भरोसे ही रहते हंै। जिले में एकाध निजी अस्पतालों को छोड़कर कोई भी ठंग का अस्पताल नहीं है। गंभीर या बड़ी बीमारी होने पर लोग आज भी बरे+ली या दिल्ली का ही रूख करते हंै।
जिले पर हमेशा बाहरी लोगों की हुकूमत रही। पंजाब में जब आतंकवाद अपने चर्म पर था, तो वहां के ज्यादातर पंजाबियों ने तराई क्षेत्रों में डेरा डाला। बड़े स्तर पर उन्होंने खेती किसानी शुरू की। देखते ही देखते आज जिले में पंजाबियों की तादाद इतनी हो गई है जिससे इस क्षेत्र को मिनी पंजाब कहा जाने लगा है। स्थानीय लोग किसानी पर ही निर्भर हैं, लेकिन विगत कुछ वर्षों से उनके भूमिहीन होने का सिलसिला तेज गति से बढ़ा है। अन्य जिलों के लोग लगातार पीलीभीत में बसते जा रहे हैं। खेत-मकान खरीद रहे हैं। नेपालियों की भी घुसपैठ है। ‘नो मैंस लैंड’ का मसला भी इसी क्षेत्र में आता है।
गौरतलब है, अभिनेता राजपाल यादव भी इसी बहती गंगा में हाथ धोने की फिराक में हैं। राजपाल निश्चित रूप से छोटे कद के बड़े अभिनेता हैं। छोटे से गांव से निकलकर मायानगरी में पहुंचे, जहां अपनी पहचान अपने बूते बनाई। ये सच है, जब फिल्मी लोगों का करियर ढलान में पहुंचने लगता है तो राजनीतिक गलियारों का रुख करना शुरू कर देते हैं। राजनीति में आने के अपने मुफीद रास्तों को खोजना आरंभ कर देते हैं। सबसे पहले वह उन जगहों अपनी चहलकदमी शुरू कर देते हैं जहां से वह ताल्लुक रखते हैं। राजपाल पीलीभीत से सटे जिले शाहजहांपुर से ही आते हैं। पीलीभीत उनका पड़ोसी जिला है। बहरहाल, राजनीति में आना कोई बुरी बात नहीं, आना चाहिए।