
प्रदीप उपाध्याय |
मोहन वर्मा का पहला काव्य संग्रह ‘शिखर की ओर’ वर्ष 2007 में प्रकाशित होकर आया था। इसके उपरांत उनका लेखन तो सतत रूप से जारी रहा लेकिन दूसरा काव्य संग्रह ‘शब्द-शब्द उम्मीद’ लंबे अंतराल के बाद वर्ष 2021में प्रकाशित हुआ है। मोहन वर्मा ने पत्रकारिता की अपनी जमीनी हकीकत और अनुभवों को वैचारिक रूप देकर विविध विषयों पर कलम चलाई है जो विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित वैचारिक आलेखों के दस्तावेज के रूप में हाल ही में प्रकाशित आलेख संग्रह ‘समय के साथ’ बोधि प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है।
107 पृष्ठ की इस पुस्तक में कुल 43 आलेख हैं, जिन्हें तीन भागों में विभाजित किया गया है। पहला भाग सामाजिक सरोकार पर केंद्रित है तो दूसरा सदी के महत्वपूर्ण एवं मानवता पर महामारी के रूप में आए संकट कोरोना काल पर केंद्रित है। तीसरा और अंतिम भाग मेरे शहर के रंग पर लिखा गया है। निश्चित ही मोहन वर्मा के कृतित्व में उनकी सजगता और संवेदनशीलता स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आती है। उनकी चिंताएं सामाजिक सरोकारों, सामाजिक तानेबाने,व्यक्तिपरक, स्वार्थी प्रवृत्ति, सामाजिक अधोपतन, नैतिक मूल्यों में गिरावट तथा अधोगति की ओर जा रहे समाज को लेकर है जो उनके संग्रह के प्रथम भाग ‘सोशल मीडिया कितना सोशल-कितना अनसोशल’ में सम्मिलित आलेखों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती हैं। इन आलेखों में विशेषकर सामूहिक हिंसा की और बेखौफ बढ़ता देश, दोहरा चरित्र और बदलाव की उम्मीदें, पसीने की कमाई की कीमत कैसे समझेंगे काली कमाई वाले, क्या दबे कुचलों को दबाना और कुचलना ही विकास है, फैलाएं सच्ची समाज सेवा का उजास, संस्कारों को बचाकर ही बचाया जा सकता है, परिवारों को और समाज को निष्ठुर समय में दुर्दशा का शिकार असहाय बुजुर्ग उल्लेखनीय हैं जिनमें लेखक की चिंता स्पष्ट रूप से झलकती है। इसी तरह से ‘कोरोना काल’ और ‘मेरे शहर के रंग’ वाले भाग में समाहित आलेख जीवन के महत्वपूर्ण दृष्यों को उद्घाटित करते हैं। इन आलेखों में मोहन वर्मा एक जागरूक नागरिक,सजग पत्रकार के साथ संवेदनशील व्यक्ति के रूप में सामने आते हैं। निश्चित ही उनका वैचारिक आलेखों का संग्रह समय के साथ पाठकों का बेहतर प्रतिसाद पाएगा।
पुस्तक : समय के साथ, लेखक : मोहन वर्मा, प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर, मूल्य : 150/-


