
आए दिन किसी न किसी की आहत भावनाओं की-फिर चाहे किसी फेसबुक पोस्ट से उपजा बवाल हो या किसी का वक्तव्य हो या किसी रचना में खास समुदाय विशेष को लेकर की गई कुछ बातें हों-बात होती रहती है और गोया उसकी स्वाभाविक प्रतिकिया के तौर पर उत्पाती समूहों द्वारा इसका बदला लेने के लिए की गई हिंसात्मक कार्रवाइयों की खबर आती रहती है, जिनमें अक्सर कानून के रखवाले कहने वाले लोगों के निर्विकार मौन या तटस्थता की खबरें भी सुर्खियां बनती हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से इसी से जुड़ा एक सवाल अधिक मौजूं होता दिख रहा है और जो कहीं-कहीं दबी जुबान से ही सही उठ रहा है, सुदूर कराची से होते हुए पटियाला तक या उत्तराखंड के गांव से होता हुआ यह सवाल बांग्लादेश में पहुंचता दिखा है। सवाल यही है कि आखिर किसकी भावनाएं आहत होती हैं?